विषय प्रवेश ‘रामचरितमानस’ गोस्वामी तुलसीदास की अनुपम कृति है। इस महाकाव्य में अयोध्या के राजा दशरथ के नंदन, पुरुषोत्तम, राम की कथा है।
“रामकथा: राम अनुज लक्ष्मण के साथ विश्वामित्र के आश्रम में पढ़नेजाते हैं और अल्पकाल में ही सारी विद्याएँ प्राप्त करते हैं तथा वे ताड़का आदि राक्षसों का भी नाश करते हैं। फिर उनका विवाह राजा जनक की पुत्री सीता से होता है। दशरथ राम को गद्दी देने की तैयारी करते हैं। लेकिन रानी कैकेयी को यह बात अच्छी नहीं लगती। वे राजा को पहले दिए गए उनके वचन का स्मरण दिला राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास और अपने पुत्र भरत के लिए राजगद्दी माँग लेती हैं। राम अपने अनुज लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ वन जाते हैं। वियोग में राजा चल बसते हैं। भरत गद्दी पर नहीं बैठते, वे राम की खड़ाऊँ गद्दी पर रखकर राज-काज चलाते हैं। उधर लंका का राजा रावण एक दिन सीता का हरण कर लेता है। हनुमान सीता को खोज निकालते हैं और लंका में आग लगा देते हैं। फिर बन्दर-भालुओं की सेना लेकर राम लंका पर चढ़ाई करते और आततायी रावण का नाश करते हैं। अंत में अयोध्यापति राम आदर्श रूप में अपनी प्रजा का पालन करते हैं।
समाज और जीवन : संत तुलसीदास ने इस कथा को बालकांड, अयोध्या कांड, अरण्य कांड, किष्किंधा कांड, सुन्दरकांड, लंकाकांड और उत्तरकांड में बाँट कर, दोहा-चौपाई के माध्यम से बड़े ही भावपूर्ण और मनोरंजक ढंग से प्रस्तुत करते हुए हिन्दू धर्म का सच्चा स्वरूप राम के माध्यम से उपस्थित किया है। धर्म और समाज, राजा-प्रजा, ऊँच-नीच, द्विज-शूद्र एवं पुत्र के साथ माता-पिता का, भाई-बहन, गुरु-शिष्य आदि का सामाजिक और धार्मिक संबंध कैसा होना चाहिए यह सब इस ग्रंथ में संगुंफित है। जहाँ इसमें रावण जैसा अत्याचारी है, वहाँ लक्ष्मण और भरत जैसे भाई भी हैं, कौशल्या जैसी माता हैं तो अनन्य सेवक हनुमान हैं, सीता जैसी आदर्श पत्नी है, तो शूर्पणखा जैसी उच्छृंखल युवती भी है, और वशिष्ठ एवं विश्वामित्र जैसे आदर्श गुरु भी हैं।
काव्य-कला: इस ग्रंथ में सभी रसों का परिपाक हुआ है। बालकांड में वात्सल्य और श्रृंगार रस है तो अयोध्या कांड में करुण रस। इसी प्रकार, सुन्दरकांड में शान्त रस तो लंकाकांड में रौद्र, वीर और वीभत्स रस। छन्दों और अलंकारों की छटा तो देखते ही बनती है। सगुण, निर्गुण, शैव-वैष्णव, भक्ति और ज्ञान के साथ लोक और शास्त्र का अद्भुत संगम है यह ग्रंथ-
‘ जासु राज़ प्रिया दुखारी, सो नृप अवसु नरक अधिकारी।’‘
महत्वं एवं उपसंहार : कदम-कदम पर सूक्तियाँ मिलती हैं
यथा-जहाँ सुमति तहँ सम्पत्ति नाना,
जहाँ कुमति तहँ विपत्ति निदाना।
‘रामचरितमानस’ ग्रंथ नहीं, तत्कालीन समाज का सच्चा दर्पण है। यही कारण है कि ‘रामचरितमानस’ मेरी सबसे प्रिय पुस्तक है।