“देव-पद के अभिलाषी सरस्वती का आवाहन करते हैं।” – ऋग्वेद
विषय-प्रवेश : ज्ञान और संगीत मानव विकास के मूल हैं। अपने देश में अनादि काल से ज्ञान और संगीत की देवी के रूप में सरस्वती की पूजा माघ शुक्ल पंचमी को होती रही है। चूँकि इसी दिन वसंत का आवाहन होता है, इसलिए इसे ‘बसंत पंचमी’ भी कहते हैं।
सरस्वती का रूप और अर्थ : ज्ञान-विज्ञान की देवी : सरस्वती की कल्पना सफेद वस्त्र धारण किए, हाथ में वीणा, पुस्तक तथा कमल लिए, हंस पर सवार देवी के रूप में की गई है। इसी कल्पना के अनुरूप सरस्वती की मूर्ति बनाई जाती है। सफेद वस्त्र स्वच्छता, सादगी तथा सदाचार का प्रतीक है, पुस्तक ज्ञान-विज्ञान का, वीणा संगीत का, कमल का फूल सृष्टि के आरंभका और हंस नीर-क्षीर विवेक का अर्थात् सरस्वती की आराधाना से पूरी सादगी, स्वच्छता और सदाचारी जीवन की प्रेरणा के साथ विज्ञान और संगीत की शिक्षा मिलती है।
पूजा-विधि : बसंत पंचमी के दिन विधिपूर्वक सरस्वती की पूजा कर शिक्षार्थी श्रद्धापूर्वक ज्ञान का वर माँगते हैं। पूजा के बाद प्रसाद वितरण होता है और शैक्षिक तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं-कहीं कवि सम्मेलन तो कहीं मुशायरा तो कहीं नृत्य और नाटक। पूजा के दूसरे दिन प्रतिमा का विसर्जन गाजे-बाजे के साथ नदी या तालाब में करते हैं।
पूजा का महत्त्व : सरस्वती पूजा का हमारे जीवन में बहुत महत्त्व है। वस्तुतः ज्ञान ही सब-कुछ है। ज्ञान के बिना आदमी आँख रहते हुए अंधा, पाँव रहते हुए भी पंगु और जिह्वा रहते हुए भी गूंगा है। विद्या से नम्रता आती है और नम्रता से पात्रता और फलस्वरूप सुख-समृद्धि।
उपसंहार: कुछ लोग सरस्वती पूजा के दिन जुलूस में उच्छृङ्खलता पर उतारू हो जाते हैं। यह पूजा-भावना के विपरीत है। हमें यह पूजा पूरी शालीनता से करते हुए प्रार्थना करनी चाहिए-
वीणावादिनी वर दे।
प्रिय स्वतंत्र रव, अमृत मंत्र नव, भारत में भर दे।