‘स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ आत्मा निवास करती है – सुक्ति
भूमिका : स्वच्छता से तात्पर्य साफ सफाई से है। सफाई हम अपने शरीर की करें। अपने परिवेश की करें। अपने मन एवं आत्मा की करें।
महत्त्व : साफ-सफाई से स्वच्छता मिलती है। स्वच्छ वातावरण हमें तंदुरूस्त बनाता है। शरीर की स्वच्छता हमारे स्वास्थ्य को बरकरार रखती है। स्वच्छ पर्यावरण हमें निरोगी एवं दीर्घजीवी बनाता है। अतः जीवन के हर पहलू में स्वच्छता महत्त्वपूर्ण है।
स्वच्छता परिवार से समाज तक : जीवन में पारिवारिक स्वच्छता का महत्त्वपूर्ण स्थान है। परिवार स्वच्छ रहेगा तो पर्यावरण स्वच्छ रहेगा। समाज तो परिवारों का ही सम्मिलित रूप है। अतः स्वच्छ परिवार ही स्वच्छ समाज को स्थापित करते हैं। स्वच्छ समाज में हीं संस्कृतियाँ पल्लवित, पुष्पित एवं दीर्घित हुई हैं। स्वच्छ समाज ने ही में तुलसी, रहीम, प्रेमचंद, इन्दिरा गाँधी, महात्मा गाँधी सदृश्य विभूतियाँ पैदा की हैं। इन्हीं के दृष्टिकोणों से हमारी सभ्यता संस्कृति आज अविरल प्रवाहित हो रही है।
उपसंहार : अतः स्वच्छता हम सभी के लिए अनिवार्य है। स्वच्छता हेतु हमें घर, पास, पड़ोस, विद्यालंय की सफाई करनी जरूरी है। शरीर की सफाई में नित्य प्रति शौच जाना, मुँह-हाथ धोना, स्नान, आदि कर्म करने जरूरी हैं। उपर्युक्त क्रियाकलापों से संचालन से ही हम स्वस्थ रह सकते हैं।
पर्यावरण सुरक्षा के लिए भी स्वच्छता के नियम का कड़ाई से पालन करना चाहिए। यदि पर्यावरण दूषित हो जाएगा तो हम पर्यावरण भी असमय काल कवलित हो जाएगा। धरती पर सर्वनाश हो जाएगा।