होली ( Holi)

प्रारम्भ : रंग और उल्लास का पर्व होली मनाने की तैयारी वसंत पंचमी से ही शुरू हो जाती है। भारतवर्ष के कोने-कोने में यह उत्सव पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। वसंत ऋतु की प्राकृतिक सुंदरता के बीच होली का त्योहार और भी उल्लासपूर्ण हो जाता है। आम्रमंजरियों, सुगंधित फूलों, मोर, कोयल की कूहू-कूहू आदि से इस त्योहार का आकर्षण और बढ़ जाता है। पूर्णिमा की शाम को मुहूर्त के अनुसार होलिका दहन किया जाता है। कुछ लोग होलिका-कुंड का विधिवत् पूजन भी करते हैं।

पौराणिकता : होली भारतवासियों का एक सांस्कृतिक त्योहार है। यह पर्व एक साथ ही मौज-मस्ती, रवानी-जवानी, रंगीली अलमस्ती की याद दिलाती है। सच पूछा जाय तो होलिकोत्सव केवल होलिका का दहन, प्रह्लाद की रक्षा या हिरण्यकशिपु वध की स्मृति पर्व नहीं, वरन् नास्तिकता पर आस्तिकता का, बुराई पर भलाई का, पाप पर पुण्य का तथा दानवता पर देवत्व का विजय का प्रतीक है।

उल्लास की अभिव्यक्ति: हर्षोल्लास का यह पर्व होली प्रीति का प्रेय है। यह पर्व हमें वैमनस्य, ईर्ष्या, द्वेष को भूलने तथा परस्पर प्रेम, स्नेह एवं एकता की भावना के साथ रहने का संदेश देता है।

  किन्तु कुछ अबोध जन इस दिन दूसरों पर सड़ा कीचड़ उछालते हैं, पत्थर फेंकते हैं, ताड़ी और दारू पीकर शर्मनाक गाने और गाली-गलौज करते हैं। कुछ इस अवसर पर पुरानी अदावत का बदला लेना चाहते हैं; वर्गगत, जातिगत तथा संप्रदायगत विद्वेष का विष फैलाना चाहते हैं। वे भूल जाते हैं कि होली शत्रुता के विरुद्ध मित्रता, गंदगी के विरुद्ध स्वच्छता एवं अनेकता के विरुद्ध एकता का अभियान है।

साहित्य में वर्णन: यह पर्व भारतीय संस्कृति की एक पौराणिक कथा से जुड़ा हुआ है। हिरण्यकशिपु नामक एक महाबली दानवराज था, जो अपने को सृष्टिकर्ता ईश्वर से भी श्रेष्ठ मानता था। उसका पुत्र प्रह्लाद ईश्वर-भक्त था। उसकी बहन होलिका को अग्निदेव नहीं जला सकते थे, ऐसा उसको वरदान था। हिरण्यकशिपु ने होलिका की गोद में प्रह्लाद को बैठाकर जिन्दा जलाने का प्रयास किया। ईश्वर की महिमा अपरम्पार है। होलिका वरदान रहते हुए भी जल गई, परन्तु ईश्वर-भक्त प्रह्लाद को बाल-बाँका नहीं हो सका।

  इस प्रकार, नास्तिकता पर आस्तिकता की, बुराई पर भलाई की विजय हुई। बाद में ईश्वर ने नृसिंहावतार धारण कर हिरण्यकशिपु का नाश किया। दूसरी कथा के अनुसार जब श्रीकृष्ण ने दुष्टों का दमन कर गोप बालाओं के साथ रासलीला रचाया, तब होली पर्व का प्रचलन हुआ। इस त्योहार के पीछे जो भी अंतरकथा हो, इतना निश्चित है कि हर्षोल्लास का यह पर्व दुराग्रह पर, सत्याग्रह की विजय का प्रतीक है। यह आनंद एवं उत्साह का महोत्सव है।

उपसंहार : होली एक सामाजिक पर्व है। होली भारत की सांस्कृतिक परम्परा का प्रतीक है और यह हमें प्रेम, स्नेह, भ्रातृत्व तथा एकता का पाठ पढ़ाता है। अतः हमें असामाजिक प्रवृत्तियों तथा शर्मनाक आचरण से दूर रहना चाहिए।

 

Leave a Comment