सिकन्दर

सिकन्दर महान का जन्म 356 ईसा पूर्व में मकदूनिया (यूनान) में हुआ था। उसके पिता Philip II मकदूनिया के शक्तिशाली राजा थे और उसकी माता ओलम्पियास थी। सिकन्दर बचपन से ही साहसी, बुद्धिमान और महत्वाकांक्षी था। उसके गुरु प्रसिद्ध यूनानी दार्शनिक Arastu थे, जिन्होंने उसे दर्शन, राजनीति, विज्ञान और साहित्य की शिक्षा दी। अरस्तू की शिक्षा का प्रभाव उसके व्यक्तित्व और शासन नीति में स्पष्ट दिखाई देता है।

336 ईसा पूर्व में पिता की मृत्यु के बाद सिकन्दर मकदूनिया का राजा बना। राजा बनते ही उसने विद्रोहों को दबाया और यूनान के विभिन्न राज्यों को अपने अधीन कर लिया। इसके बाद उसने विश्व-विजय का अभियान आरम्भ किया। उसका लक्ष्य फारसी साम्राज्य को पराजित कर विश्व का सबसे बड़ा साम्राज्य स्थापित करना था।

334 ईसा पूर्व में उसने एशिया माइनर पर आक्रमण किया और ग्रेनिकस के युद्ध में फारसी सेना को पराजित किया। इसके बाद 333 ईसा पूर्व में इस्सुस के युद्ध में फारस के सम्राट डेरियस तृतीय को हराया। 331 ईसा पूर्व में गॉगामेला के युद्ध में निर्णायक विजय प्राप्त कर उसने फारसी साम्राज्य पर अधिकार कर लिया। इस विजय के बाद वह मिस्र पहुँचा, जहाँ उसका स्वागत एक मुक्तिदाता के रूप में किया गया। मिस्र में उसने अलेक्जेंड्रिया नामक नगर बसाया, जो बाद में शिक्षा और संस्कृति का महान केंद्र बना।

सिकन्दर ने इसके बाद मध्य एशिया और अफगानिस्तान के क्षेत्रों को जीतते हुए भारत की ओर प्रस्थान किया। 326 ईसा पूर्व में उसने भारत के उत्तर-पश्चिमी भाग पर आक्रमण किया। झेलम नदी के तट पर उसका सामना राजा पोरस से हुआ। यह युद्ध इतिहास में हाइडेस्पीस (झेलम) के युद्ध के नाम से प्रसिद्ध है। पोरस ने वीरतापूर्वक संघर्ष किया, परन्तु अंततः पराजित हुआ। सिकन्दर पोरस की वीरता से प्रभावित हुआ और उसे पुनः उसका राज्य लौटा दिया।

सिकन्दर की सेना लगातार युद्धों से थक चुकी थी। जब वह व्यास नदी तक पहुँचा तो उसके सैनिक आगे बढ़ने को तैयार नहीं हुए। मजबूर होकर सिकन्दर को लौटना पड़ा। वापसी के दौरान उसे कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। 323 ईसा पूर्व में बाबुल में मात्र 32 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु का कारण आज भी विवाद का विषय है; कुछ इतिहासकार इसे बीमारी मानते हैं, जबकि कुछ विष दिए जाने की संभावना व्यक्त करते हैं।

सिकन्दर केवल एक विजेता ही नहीं था, बल्कि वह एक कुशल प्रशासक भी था। उसने जीते हुए प्रदेशों में यूनानी संस्कृति का प्रसार किया। उसके अभियानों के परिणामस्वरूप पूर्व और पश्चिम के बीच सांस्कृतिक संपर्क बढ़ा। इस सांस्कृतिक मिश्रण को हेलेनिस्टिक संस्कृति कहा जाता है। कला, वास्तुकला, भाषा और व्यापार के क्षेत्र में इसका गहरा प्रभाव पड़ा।

सिकन्दर की सबसे बड़ी विशेषता उसकी साहसिक नेतृत्व क्षमता थी। वह अपने सैनिकों के साथ युद्धभूमि में स्वयं उतरता था और कठिन परिस्थितियों में भी उनका मनोबल बनाए रखता था। उसकी रणनीति, युद्ध कौशल और तीव्र निर्णय क्षमता ने उसे विश्व इतिहास का महानतम सेनानायक बना दिया।

हालाँकि उसका साम्राज्य उसकी मृत्यु के बाद अधिक समय तक एकजुट नहीं रह सका और उसके सेनापतियों में बँट गया, फिर भी उसका प्रभाव लंबे समय तक बना रहा। उसने विश्व इतिहास की दिशा बदल दी और विभिन्न सभ्यताओं को आपस में जोड़ने का कार्य किया।

इस प्रकार, सिकन्दर महान एक अद्भुत व्यक्तित्व था, जिसने कम आयु में ही विशाल साम्राज्य स्थापित किया। उसकी वीरता, महत्वाकांक्षा और नेतृत्व क्षमता के कारण उसे इतिहास में सदैव याद किया जाता है।

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