वसंत ऋतु (The Spring Season)

                                                   “मन्द-मन्द हवा चली,

                                                 विहुँस उठी कली-कली 

                                              भौरे बोराए, ऋतुराज आए।”

 

विषय-प्रवेश : ऋतुएँ तो अनेक हैं लेकिन वसंत की सज-धज निराली है। इसीलिए वह ऋतुओं का राजा, शायरों-कवियों का लाला, धरती का घन है। वस्तुतः इस ऋतु में प्रकृति पूरे निखार पर होती है।

वसंत की शोभा : वसंत ऋतु का प्रारंभ वंसत पंचमी से ही मान लिया गया है, लेकिन चैत और बैशाख ही वसंत ऋतु के महीने हैं। वसंत ऋतु का समय समशीतोष्ण जलवायु का होता है। चिल्ला जाड़ा और शरीर को झुलसाने वाली गर्मी के बीच वसंत का समय होता है।

वसंत का आगमन : वसंत के आगमन के साथ ही प्रकृति अपना श्रृंगार करने लगती है। लताएँ मचलने लगती हैं और वृक्ष फूलों-फलों से लद जाते हैं। दक्षिण दिशा से आती मदमाती बयार बहने लगती है। आम की मँजरियों की सुगन्ध वायुमंडल को सुगन्धित कर देती है। मस्त कोयल बागों में कूकने लगती है। सरसों के पीले फूल खिल उठते हैं और उनकी भीनी-भीनी तैलाक्त गन्ध सर्वत्र छा जाती है। तन-मन में मस्ती भर जाती है। हिन्दी, संस्कृत तथा अंग्रेज कवियों ने वसंत का मनोरम वर्णन किया है। कालिदास, वर्ड्सवर्थ, पंत, दिनकर का वसंत-वर्णन पढ़कर किसका मन आनांदित नहीं होता?

स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण :स्वास्थ्य की दृष्टि से भी वसंत ऋतु का महत्त्व बहुत अधिक है। न अधिक जाड़ा पड़ता है, न गर्मी। गुलाबी जाड़ा, गुलाबी धूप। जो मनुष्य आहार-विहार को संयमित रखता है, उसे वर्ष-भर किसी प्रकार का रोग नहीं होता है। इस ऋतु में शरीर में नये खून का संचार होता है। वात और पित्त का प्रकोप भी शांत हो जाता है। इस प्रकार, इस ऋतु में स्वास्थ्य और शारीरिक सौंदर्य की भी वृद्धि होती हैं।

उपसंहार : वसंत उमंग, आनन्द, काव्य, संगीत और सौंदर्य की ऋतु है। यह स्नेह और सौंदर्य का पाठ पढ़ाता है। यही कारण है कि सारी दुनिया में वसंत की व्याकुलता से प्रतीक्षा होती है।

 

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