भूमिका: वर्षा ऋतु ही धरती का धन धन और प्राणियों का जीवन है, यही कारण है कि लोगों ने यदि वसन्त को ऋतुओं को राजा कहा है, तो वर्षा ऋतुओं की रानी कहलाती है। दिनकर के शब्दों में-राजा बसन्त, वर्षा ऋतुओं की रानी।
ऋतुओं की रानी : जेठ के उत्ताप से धरती झुलसने लगती है, कुएँ सूख जाते हैं, घर तवा-सा जलने लगता है, दिन तो दिन, रात को भी लू चलने लगती है। ऐसी दुःखदायी स्थिति में वर्षा अपनी ठंडी फुहारें और हरियाली लेकर आती है। आषाढ़ के आते ही फुहारें पड़नी शुरू हो जाती हैं और लोग आनन्दित हो उठते हैं। किसान हल-बैल लेकर अपने-अपने खेत की ओर चल पड़ते हैं। कृषि-कार्यों का शुभारम्भ हो जाता है। खेत जोते और बोये जाने लगते हैं।
कृषि में महत्त्व : आषाढ़ के बाद आता है मतवाला सावन। बूँदों की झड़ी लग जाती है। ताल तलैया भर जाते हैं, धरती की प्यास बुझ जाती है। खेतों में हरियाली का वितान तन जाता है। जिधर देखो उधर ही हरियाली। पेड़ों में झूले पड़ जाते हैं और कजरी की धुन हवा में तिरने लगती है- सावन आयो री सखि !
लाभ : इसके बाद आता है भादो। आकाश में काले-काले बादल और मूसलाधार वर्षा। भादो की रात बड़ी भयानक और डरावनी होती है। हाथ से हाथ नहीं सूझता। चोर चाँदी काटते हैं इन्हीं रातों में। इसके बाद आता है क्वार, फिर वर्षा रानी की विदाई।
हानि : लेकिन कभी-कभी वर्षा मौत का पैगाम लेकर आती है। यदि अधिक वर्षा हो गयी तो खेती गयी और बाढ़ आयी। बाढ़ आती है तो गाँव-शहर तबाह हो जाते हैं। धन और जन की ही नहीं, मवेशियों की भी हानि होती हैं। मकान गिर जाते हैं, फसलें नष्ट हो जाती हैं। यह ठीक है कि वर्षा कभी-कभी मारक बन जाती है किन्तु इसमें जो जीवनदायिनी शक्ति है, उसकी कदापि उपेक्षा नहीं की जा सकती है- यही धरती का श्रृंगार है।
उपसंहार : वर्षा को मानव जीवन का आधार कहा जाता है, क्योंकि जल ही जीवन है। जल न हो तो जीवन न हो, वर्षा न हो तो फसल न हो। दुर्दिन आ जाए। यही कारण है कि वर्षा का सर्वत्र हार्दिक स्वागत होता है।