कागज के पन्नों को तुलसी तुलसीदल जैसा बन गया‘।
भूमिका: लगभग पाँच सौ वर्षों की कालधारा जिस कवि की कृति को धूमिल न कर पाई, वह कवि हैं गोस्वामी तुलसीदास। तुलसीदास का आविभांव उस समय हुआ, जिस समय हिन्दू-जाति विधर्मियों के अत्याचार से त्राहि-त्राहि कर रही थी। निराशा के इस काल में उन्होंने कण्ठितों के बीच आशा का संचार किया और भक्ति का दीप जलाकर पथ उजागर किया।
तुलसीदास का जीवन वृत्त: तुलसी का जन्म सम्वत् 1554 में उत्तर प्रदेश के राजापुर नामक गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम आत्माराम दुबे एवं माता का नाम हुलसी था। कहा जाता है कि मूल नक्षत्र में जन्म लेने के कारण माता-पिता ने उनका त्याग कर दिया। फलतः इनका बाल्यकाल अत्यंत दुःखमय रहा। गुरु नरहरि दास की कृपा ने इन्हें रामबोला से तुलसीदास बना दिया। शेष सनातन जी से शिक्षा ग्रहण करने के बाद तुलसीदास की रत्नावाली से शादी हुई। पत्नी पर मुग्ध तुलसी एक बार बिन बुलाए ससुराल पहुँच गाए। रत्नावली ने लोकलाजवश इन्हें कड़ी झिड़की दी। बस, इस झिड़की से आसक्ति भक्ति में बदल गई। विरक्त हो, तुलसी ने मानसरोवर से सेतुबन्ध तक की यात्रा की तथा अपने जीवन को राममय बना लिया।
रचनाएँ एवं महत्त्व : राम के रंग में रंग कर तुलसी ने अनेक ग्रंथों की रचना की, यथा-कवितावली, दोहावली, गीतावली, रामलला नहछू, वैराग्य संदीपनी, जानकी-मंगल, पार्वती-मंगल, विनय पत्रिका और रामचरितमानस । तुलसी का व्यक्तित्व अनोखा है। इनके समक्ष कबीर, जायसी एवं सूरदास सबके सब फीके पड़ गये क्योंकि कबीर ने सधुक्कड़ी भाषा में, जायसी ने अवधी में और सूरदास ने ब्रजभाषा में रचनाएँ की किंतु तुलसी ने दोनों भाषाओं में अपनी रचना कर सबों को पीछे छोड़ दिया। इनकी रचनाओं में रस, अलंकार एवं छन्द स्वतः आ गये हैं, इसीलिए तो हरिऔध जी ने कहा है
“कविता पा तुलसी न लसे, कविता लसी पा तुलसी की कला।”
उपसंहार : तुलसी परिस्थिति-विशेष की ऊपज थे। इस समय हिन्दू-जाति भयंकर यंत्रणा से गुजर रही थी। इन्होंने अपने विशेष महाकाव्य ‘रामचरितमानस’ एवं ‘विनयपत्रिका’ की रचना कर, भक्ति की गंगा बहाकर सबको मुग्ध किया एवं बिखरी हिन्दू-जाति को एकता का पाठ पढ़ाया तथा सारे सम्प्रदायवादी विचारों का अन्त कर एक नयी दिशा दी।