विषय-प्रवेश : आजादी के बाद जिन चीजों में बेतहाशा वृद्धि हुई है, वे हैं- नेता, बेकारी और महँगाई। अगर कल तेल का मिजाज ऊँचा हुआ तो आज दाल गुल खिला रही है। कभी चावल और प्याज ने आँख मारी तो कभी चीनी सताने लगी। तात्पर्य यह है कि महँगाई सर्वव्यापी हो गई है।
महँगाई का स्वरूप : यह महँगाई महारानी की कृपा है कि आज कारखाने में हड़ताल है तो कल विद्यालय में, परसों विश्वविद्यालय इसकी चपेट में है तो तरसों सचिवालय और अस्पताल में काम बन्द। सर्वत्र यही सुनाई पड़ता है-इंक्लाब जिन्दाबाद, हमारी माँगें पूरी हों- चाहे जो मजबूरी हो। श्री जगदीश गुप्त ने ठीक ही कहा है
कौन खाई है
कि जिसको पाटती है कीमतें,
उम्र को तेजाब बनकर,
आदमी को
चाटती हैं कीमतें,
पेट का चूहा बनाकर रात-दिन
नोचती हैं, कोचती हैं,
काटती हैं कीमतें।
कारण : अब प्रश्न उठता है कि इस महँगाई का कारण है क्या? उसमें कौन-सी ऐसी गैस है जिसके आगे सारे प्रयत्न विफल हो रहे हैं? वस्तुतः इसका कारण है आबादी में बेतहाशा वृद्धि, अपेक्षित विकास की कमी, उत्पादन में कमी या अभाव, लूट-खसोट, सुचारु यातायात व्यवस्था का अभाव, मजदूर-संकट और श्रमिक आन्दोलन का दिशाहीन होना। नतीजा है कि मुद्रा-प्रसार, कागजी मुद्रा का प्रचलन। इनके अलावा व्यापारियों की दूषित प्रवृत्ति और कालाबाजारी, जमाखोरी महँगाई के प्रमुख कारण हैं वितरण-प्रणाली अत्यन्त दोषपूर्ण है और इसका सबसे बड़ा कारण है भ्रष्टाचार के भैंसे का समाज में बेलगाम घूमते रहना।
निदान : महँगाई एक भीषण अभिशाप है। आजादी का फल हर आदमी तक पहुँचाने के लिए इस पर काबू करना अत्यावश्यक है। इसके लिए आवश्यक है कि सर्वप्रथम आबादी की वृद्धि पर अंकुश लगाया जाए और साथ ही उत्पादन में वृद्धि की जाए। उत्पादन वृद्धि का हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए। वितरण-प्रणाली को पुनर्गठित करके ऐसा प्रबंध करना चाहिए कि व्यापारी कालाबाजारी और नेता या प्रशासक घोटाला न कर सके। इसके लिए सख्त दण्ड देने का प्रावधान होना चाहिए। केवल घोषणा करने से कुछ होनेवाला नहीं।
उपसंहार : लेकिन इतना ही सब कुछ नहीं है। सबसे पहले हमें मुनाफाखोरी की प्रवृत्ति पर भी प्रतिबंध लगाना चाहिए। इसके लिए जवाबदेह व्यापारिक संघ, श्रमिक संघ को प्रोत्साहन देना चाहिए ताकि न तो उत्पादन रुके और न मजदूरों का ही शोषण हो। आत्मसंयम भी इस दिशा में कारगर होगा। अगर सभी देशवासी महँगाई रोकने के लिए कमर कस लें तो कोई कारण नहीं कि महँगाई न रुके।