भूमिका : लोकतंत्र अपने-आप में एक ऐसा प्रणाली है जो ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ है। अब्राहम लिंकन की वह उक्ति कि “लोकतंत्र लोगों के ऊपर लोगों का लोगों द्वारा शासन है।” इससे स्पष्ट होता है कि इस शासन प्रणाली में चयनित जनप्रतिनिधि शासन करते हैं। अर्थात् सारी जनता की सहभागिता ऐसी शासन प्रणाली में हो जाती है।
निर्वाचन एक प्रधान साधन: लोकतांत्मक प्रणाली को पूर्णरूपेण सफल बनाने हेतु स्वच्छ निष्पक्ष शांतिपूर्ण एवं कदाचारमुक्त आम चुनाव का होना अनिवार्य है। इस चुनाव में वैसे सभी वयस्क नागरिक जो 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुके हैं और मानसिक रूप से स्वस्थ हैं; वे अपने मत देने का अधि कार प्राप्त कर लेते हैं। 26 नवम्बर, 1949 को भारतीय संविधान परिषद् ने भारतीय संविधान को स्वीकृति प्रदान की और इस पद्धति से निर्वाचन शुरू हो गया।
नागरिक अधिकार : भारतवर्ष के प्रत्येक नागरिक को यह अधिकार प्राप्त है जिनकी आयु 18 वर्ष पूर्ण हो गई है। निर्वाचन नामावली में उनका नाम जुड़ चुका है; चाहे वे किसी भी जाति, धर्म, वर्ग, वर्ण अथवा लिंग के हों। संविधान में उन्हें यह मौलिक अधिकार के रूप में दिया गया है जिसकी रक्षा की जिम्मेवारी एक प्रतिष्ठित एवं शक्तिशाली संस्था को दी गई है, जो ‘चुनाव आयोग’ कहलाता है।
एक दलीय शासन का अंत: लोकतंत्र की सफलता के लिए यह एक अत्यन्त अहम बिन्दु है कि इस चुनाव प्रणाली में सबको समान रूप से शासन चलाने का मौका दिया जाता है। विपक्ष में रहने वाले लोग भी कभी सत्ता पर आसीन हो सकते हैं क्योंकि जहाँ एकदलीय प्रणाली होगी, वहाँ जनता के हित की अनदेखी निश्चित होती है। अतः जनता अपन सरकार चुन लेती है।
उपसंहार : लोकतंत्र में चुनाव प्रणाली सबसे सफल प्रणाली है। इस प्रणाली में जनता को अधिक से अधिक लाभ होता है। यही कारण है कि आज सम्पूर्ण विश्व में भारतीय लोकतंत्र एवं इसके चुनाव प्रणाली की सराहना की जा रही है।