भूमिका: भ्रष्टाचार का शाब्दिक अर्थ है- भ्रष्ट आचरण। भ्रष्टाचारी व्यक्ति परिवार, समाज के लिए कलंक होता है। आज के समय में भ्रष्टाचार ‘वैश्विक समस्या’ बन गया है।
भ्रष्टाचार के कारण : हमारी भोग लिप्सा और ज्यादा से ज्यादा अर्थ संग्रह भ्रष्टाचार का मूल कारण है। ज्यादा से ज्यादा सुख-संपत्ति की भूख सभी अनैतिक कार्य करने को मजबूर करती है। शिक्षा, व्यापार, राजनीति, खेल-कूद,
शासन-व्यवस्था एवं शिक्षा कुछ भी अछूता नहीं रहा।
भ्रष्टाचार का स्वरूप : विद्यार्थी परीक्षा में नकल करते हैं, कार्यालय के बाबू घूस लेते हैं, आला अधिकारी गलत काम करते हैं। भ्रष्टाचार ही वर्त्तमानसभा में शिष्टाचार बन गया है।
भ्रष्टाचार के निवारण के उपाय : भ्रष्टाचार से बचने के लिए नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देना होगा। स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज, देश और विश्वकी चिन्ता करनी होगी। भौतिक ऐश्वर्य और भोगवाद से हटकर समाज-सेवा और मानव-कल्याण की भावना जाग्रत करनी होगी। भ्रष्टाचार का आधार स्वार्थ और धनलिप्सा होता है हमें राष्ट्र के प्रति अपनी जवाबदेही पैदा करनी होगी। जब तक हमारे भीतर राष्ट्रप्रेम और मानव-कल्याण का भाव नहीं पैदा होगा, जबतक भ्रष्टाचार नहीं मिटेगा। धर्म में आस्था रखते हुए ईश्वर के प्रति जवाबदेही समझनी होगी। पाप-पुण्य में अन्तर करना होगा।
निष्कर्ष : इस प्रकार समाज के लिए भ्रष्टाचार कलंक है। इस कलंक की मुक्ति के लिए आत्मानुशासन, जिम्मेदारी और वफादारी का भाव रखना होगा। यह लड़ाई घर से शुरू करनी पड़ेगी और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर जारी रखनी होगी। भ्रष्टाचार से मुक्ति हमारा राष्ट्रीय संकल्प बनकर उभरे, यही हमारी मंगल कामना है।