भूमिका : बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने अपने चुनाव अभियान में शराबबंदी लागू करने का वादा किया था और इस मुद्दे पर उन्हें काफी जन-समर्थन, खासकर महिला वोटरों के बीच मिला था। सरकार बनाने के बाद अब नीतिश कुमार ने अपना वादा पूरी तरह निभा दिया है। एक अप्रैल से बिहार में देशी शराब की बिक्री बंद कर दी गई और योजना के मुताबिक छह महीने बाद पूर्ण शराबबंदी लागू की जानी थी, लेकिन देशी शराब पर पाबंदी के नतीजों से उत्साहित होकर मुख्यमंत्री ने चार दिन बाद ही अंग्रेजी शराब की बिक्री पर भी पाबंदी लगा दी। अब बिहार में बार और होटलों समेत कहीं भी शराब नहीं मिल पाएगी। भारत में राज्यों के पास राजस्व के जो गिने-चुने स्रोत हैं, उनमें से एक शराब पर लगने वाला आबकारी कर भी है, बल्कि शराब से होने वाली कमाई राज्यों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। बिहार में ही सरकार को शराब से 3,300 करोड़ रुपये का राजस्व मिलता है, अब सरकार की यह कमाई बंद हो जाएगी।
मद्यपान के प्रभाव: सैद्धांतिक रूप से देखें, तो शराबबंदी से समाज को कई फायदे होते हैं। शराब के खिलाफ तम्बाकू जैसा कोई विश्वव्यापी अभियान अभी नहीं है। तम्बाकू से कैंसर का इतना सीधा रिश्ता साबित हुआ है कि उसकी वजह से उसके खिलाफ पूरी दुनिया में माहौल बन गया लेकिन कुछ अध्ययनों में नशे के व्यापक नुकसान का आकलन किया गया और उनमें शराब को दुनिया का सबसे नुकसानदेह नशा पाया गया। शराब के सामाजिक असर सबसे ज्यादा नुकसानदेह होते हैं। घर-परिवारों में कलह, टूटन और अपराधों से शराब का सीधा रिश्ता है। सड़क दुर्घटनाओं का एक महत्वपूर्ण कारण शराब है। शराब की वजह से नागरिकों की उत्पादकता व आय में भारी कमी आती है, जो समाज में गरीबी और बदहाली का एक प्रमुख कारण है। शराब ज्यादातर पुरुष पीते हैं और उनका नुकसान महिलाएँ और बच्चे सबसे ज्यादा उठाते हैं। इसी वजह से जब भी शराबबंदी हुई है, उसके पीछे महिलाओं का आग्रह सबसे ज्यादा प्रबल था। जहाँ शराबबंदी नहीं है, वहाँ भी अक्सर महिलाओं ने शराब के खिलाफ आन्दोलन किए हैं।
उपसंहार: 21 जनवरी 2017 को बिहार में मानव श्रृंखला बनी जिसमें 4 करोड़ लोगों ने भाग लिया। यह इस बात का गवाह है कि हमारी बिहार की जनता मद्यपान को अच्छे निगाह से नहीं देखती। अतः हम सभी का पुनीत कर्त्तव्य है कि हम मद्यपान से दूर रह कर इसके घातक प्रभावों के बारे में समाज को जागरूक करें।