गुप्त वंश के पतन के पश्चात् पुष्यभूति ने हरियाणा के अम्बाला जिले के थानेश्वर में एक नवीन राजवंश की स्थापना की, जिसे पुष्यभूति वंश कहा गया।
पुष्यभूति वंश के प्रमुख शासक
- प्रभाकर वर्द्धन (580–605 ई.)
- राज्यवर्द्धन (605 ई.)
- हर्षवर्द्धन (606–647 ई.)
- राज्यश्री — विवाह कन्नौज के शासक गृहवर्मा से
प्रभाकर वर्द्धन इस वंश को स्वतंत्रता दिलाने वाला तथा प्रथम प्रभावशाली शासक था। उसकी पत्नी यशोमती थी, जिससे दो पुत्र — राज्यवर्द्धन और हर्षवर्द्धन — तथा एक पुत्री राज्यश्री उत्पन्न हुई। राज्यश्री का विवाह मौखरी वंश के गृहवर्मा से हुआ। प्रभाकर की मृत्यु के बाद यशोमती ने आत्मदाह कर लिया।
मालवा के शासक देव ने गौड़ (बंगाल) के शासक शशांक की सहायता से गृहवर्मा की हत्या कर दी। शशांक ने राज्यवर्द्धन की भी हत्या कर दी। शशांक शैव धर्म का अनुयायी था; उसने बौद्ध धर्म के प्रति शत्रुता दिखाई और बोधिवृक्ष को कटवा दिया।
हर्षवर्द्धन 16 वर्ष की अवस्था में 606 ई. में राजगद्दी पर बैठा। उसने कन्नौज और थानेश्वर पर अधिकार कर कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया। शशांक को पराजित कर कन्नौज पर अधिकार किया। हर्ष ने सम्पूर्ण उत्तर भारत पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया तथा सम्भवतः शशांक की मृत्यु के बाद बंगाल पर भी अधिकार कर लिया।
दक्षिण भारत अभियान के दौरान चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय से नर्मदा नदी के तट पर युद्ध हुआ, जिसमें हर्ष पराजित हुआ। यह जानकारी रविकीर्ति के ऐहोल अभिलेख से मिलती है।
हर्ष के समय मथुरा सूती वस्त्रों के निर्माण के लिए प्रसिद्ध था।
हर्ष के शासनकाल में चीनी यात्री ह्वेनसांग बौद्ध ग्रंथों की खोज में भारत आया। 643 ई. और 645 ई. में दो चीनी दूत हर्ष के दरबार में आए। ह्वेनसांग स्थल मार्ग से आया और स्थल मार्ग से ही वापस गया। वह बौद्ध धर्म की शिक्षा प्राप्त करने भारत आया था।
हर्ष के पूर्वज शिव और सूर्य के उपासक थे, परन्तु ह्वेनसांग से प्रभावित होकर हर्ष ने बौद्ध धर्म की महायान शाखा को संरक्षण दिया और स्वयं बौद्ध धर्म अपनाया। ह्वेनसांग ने नालंदा विश्वविद्यालय में अध्ययन व अध्यापन किया तथा दक्षिण भारत की यात्रा की। उसने पुलकेशिन द्वितीय और नरसिंहवर्मन प्रथम का भी उल्लेख किया।
ह्वेनसांग की यात्रा-वृत्तांत ‘सी-यू-की’ कहलाती है। व्ही-ली ने उसकी जीवनी लिखी।
हर्षवर्द्धन स्वयं भी विद्वान था। उसने ‘नागानंद’, ‘रत्नावली’ और ‘प्रियदर्शिका’ नामक संस्कृत नाटकों की रचना की। बाणभट्ट हर्ष के दरबारी कवि थे; उन्होंने ‘हर्षचरित’ और ‘कादम्बरी’ की रचना की।
हर्ष प्रत्येक पाँच वर्ष बाद प्रयाग में महामोक्ष परिषद् का आयोजन करता था। छठी महामोक्ष परिषद् में ह्वेनसांग ने भाग लिया। हर्ष ने कन्नौज में सर्वधर्म सम्मेलन का आयोजन किया, जिसकी अध्यक्षता ह्वेनसांग ने की।
हर्ष के युद्ध एवं शान्ति मंत्री अवन्ति थे। महासेनापति सिंहनाद था। उसके शासन में भूमिकर (उपज का 1/6 भाग) लिया जाता था। हर्षकालीन ताम्रपत्रों में तीन करों का उल्लेख है — भाग (भूमिकर), बलि और हिरण्य। ‘हर्षचरित’ में सिंचाई के साधन के रूप में तुलायंत्र (जलयंत्र) का वर्णन है। सेना का सर्वोच्च अधिकारी महाबलाधिकृत था।
हर्षकालीन प्रमुख अधिकारी
- उपरिक — भुक्ति (प्रान्त) का प्रशासक
- सिंहनाद — मुख्य सेनापति
- स्कंदगुप्त — राजसेना का मुख्य अधिकारी
- अवन्ति — शान्ति एवं युद्ध का मंत्री
- वृहदेश्वर — अश्वसेना का मुख्य अधिकारी
- अमात्य — मंत्रिपरिषद् के सदस्य
- बलाधिकृत — पैदल सेना का अधिकारी
- कुंतल — अश्वसेना का प्रधान अधिकारी
- दण्डपाशिक — पुलिस अधिकारी