गुप्त साम्राज्य

गुप्त साम्राज्य (240 ई.-550 ई.)

मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद लम्बे समय (काल) तक भारत एक शासन सूत्र के अन्तर्गत नहीं आ सका। इस राजनीतिक विघटन का सामना करने के लिए मुख्य रूप से तीसरी शताब्दी में भारत के तीन कोनों से तीन नये राजवंशों का उदय हुआ। मध्यप्रदेश के पश्चिमी भाग में नाग शक्ति, दक्कन में वाकाटक तथा पूर्वी भारत में गुप्तवंश के शासक उदित हुए।

भारतीय इतिहास में आर्यावर्त वर्तमान में मध्यप्रदेश का पूर्वोत्तर तथा उत्तर प्रदेश का दक्षिणी-पूर्वी भाग है। यह गुप्त वंश के अधीन था जो वनों की अधिकता के कारण अटवी (वन साम्राज्य) कहलाता था।

गुप्त वंश (साम्राज्य) का उदय तीसरी शताब्दी के अन्त में प्रयाग के निकट कौशाम्बी में हुआ। गुप्त वंश का आरम्भिक राज्य उत्तर प्रदेश और बिहार में था क्योंकि आरम्भिक गुप्त मुद्राएँ और अभिलेख मुख्यतः उत्तर प्रदेश में पाये गये हैं।

सम्भवतः गुप्त लोग कुषाणों के सामन्त थे। कुषाणों के पतन के बाद से लेकर गुप्तों के उदय के पहले का काल राजनैतिक दृष्टि से विकेन्द्रीकरण तथा विभाजन का काल माना जाता है। गुप्त वंश का संस्थापक श्रीगुप्त (240 ई.-280 ई.) था। इसने महाराज की उपाधि धारण की, क्योंकि महाराज उस समय सामन्तों की उपाधि थी।

चीनी यात्री इत्सिंग के अनुसार श्रीगुप्त ने पाटलिपुत्र में मन्दिर का निर्माण करवाया।

श्रीगुप्त का उत्तराधिकारी घटोत्कच (280 ई.-319 ई.) था।

चन्द्रगुप्त प्रथम (319 ई.-335 ई.)

गुप्त वंश का वास्तविक संस्थापक चन्द्रगुप्त प्रथम को माना जाता है। इसने ‘महाराजाधिराज’ की उपाधि धारण की। इसने लिच्छवि राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह किया। इतिहास में एक नये संवत् 319-320 ई. में “गुप्त संवत्” चलाने का श्रेय भी दिया जाता है। इसने सर्वप्रथम चाँदी की मुद्राएँ तथा राजा-रानी प्रकार के सिक्के, विवाह प्रकार के सिक्के, श्री सिक्के चलाए।

समुद्रगुप्त (335 ई.-375 ई.)

चन्द्रगुप्त प्रथम के बाद उसका पुत्र समुद्रगुप्त शासक बना। समुद्रगुप्त 335 ई. में राजगद्दी पर बैठा तथा इस वंश का सबसे महान शासक था। समुद्रगुप्त साम्राज्यवादी व आक्रमणकारी शासक था।

इसने उत्तर भारत (आर्यावर्त) के नौ शासकों को पराजित किया, दक्षिणापथ के भी बारह (12) शासकों को पराजित किया लेकिन समुद्रगुप्त ने उनका विलेय गुप्त साम्राज्य में नहीं किया तथा विदेशी शक्तियों को पराजित कर उनसे भी कर वसूला। इसने लगभग संपूर्ण भारत को विजित किया तथा इन्हीं विजयों के कारण इतिहासकार विन्सेंट स्मिथ ने इसे “भारत का नेपोलियन” कहा।

समुद्रगुप्त विजेता के साथ-साथ कवि, संगीतज्ञ और विद्या का संरक्षक था। उसके सिक्कों पर वीणा बजाते हुए चित्र अंकित है तथा उसे कविराज की उपाधि प्रदान की गई। समुद्रगुप्त विष्णु का उपासक था।

हरिषेण समुद्रगुप्त का दरबारी विद्वान था तथा हरिषेण ने ही इलाहाबाद में स्थित प्रयाग प्रशस्ति की रचना की थी। इसकी भाषा संस्कृत थी।

समुद्रगुप्त ने महान बौद्ध भिक्षु वसुबन्धु को संरक्षण दिया था।

रामगुप्त के समय शक शासक रूद्रसिंह तृतीय ने आक्रमण किया एवं उसकी पत्नी ध्रुवदेवी को अपने शिविर में भेजने की माँग की। इसकी सूचना चन्द्रगुप्त द्वितीय को मिलने पर उसने एक षड्यंत्र रचा और स्वयं ध्रुवदेवी के वेश में रूद्रसिंह तृतीय के शिविर में जाकर उसकी हत्या की तथा ध्रुवदेवी से विवाह किया। बाद में रामगुप्त की भी हत्या कर दी और राजगद्दी पर बैठ गया। इसकी जानकारी विशाखदत्त की “देवीचन्द्रगुप्तम्” से मिलती है।

चन्द्रगुप्त द्वितीय (380 ई.-413 ई.)

चन्द्रगुप्त द्वितीय समुद्रगुप्त का उत्तराधिकारी हुआ, जो 380 ई. में राजगद्दी पर बैठा।

शकों को पराजित करने के बाद चन्द्रगुप्त द्वितीय ने विशेष प्रकार के चाँदी के सिक्के जारी किये तथा ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि धारण की।

इसने अपनी पुत्री प्रभावती गुप्त का विवाह वाकाटक नरेश रूद्रसेन से किया।

कालिदास को भारत का शेक्सपियर कहा जाता है। कालिदास ने मेघदूत, रघुवंश, कुमारसम्भव, विक्रमोर्वशीयम्, मालविकाग्निमित्रम् एवं अभिज्ञानशाकुन्तलम् की रचना की।

अभिज्ञानशाकुन्तलम् में राजा दुष्यन्त एवं शकुन्तला की प्रेम-विरह कथा है। यह दूसरी भारतीय पुस्तक है जिसका 40 विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ है।

पंचतंत्र का संकलन गुप्तकाल में हुआ। इसके लेखक पं. विष्णु शर्मा माने जाते हैं।

गुप्तकाल के महान ज्योतिष एवं खगोलशास्त्री वराहमिहिर थे।

गुप्तकाल में सोने के सिक्के को दीनार कहा जाता था।

चन्द्रगुप्त द्वितीय ने महरौली (दिल्ली) में लौह स्तम्भ का निर्माण कराया, जो गुप्तकालीन धातु-विज्ञान का सर्वश्रेष्ठ नमूना है। चन्द्रगुप्त द्वितीय के अन्य नाम देवगुप्त, देवराज, देवत्री तथा उपाधियाँ विक्रमांक और परमभागवत थीं। उसके शासनकाल में चीनी यात्री फाह्यान भारत आया।

फाह्यान भारत स्थल मार्ग से आया और जलमार्ग से वापस गया।

अनुश्रुतियों के अनुसार उसके दरबार में नौ विद्वान थे, जिन्हें ‘नवरत्न’ कहा गया है।

चन्द्रगुप्त के ‘नवरत्न’

  1. कालिदास

  2. अमरसिंह

  3. घटकर्पर

  4. धन्वंतरि

  5. वराहमिहिर

  6. वररुचि

  7. वेताल भट्ट

  8. शंकु

  9. क्षपणक

चन्द्रगुप्त द्वितीय का सन्धि-विग्रहिक वीरसेन शैव था।

चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय पाटलिपुत्र एवं उज्जैयिनी विद्या के प्रमुख केन्द्र थे।

नोट: चन्द्रगुप्त द्वितीय ने उज्जैयिनी को दूसरी राजधानी बनाया।

कुमारगुप्त महेन्द्रादित्य (415 ई.-454 ई.)

चन्द्रगुप्त द्वितीय के बाद कुमारगुप्त महेन्द्रादित्य (415 ई.-454 ई.) राजगद्दी पर बैठा। विलसड़ अभिलेख से कुमारगुप्त के शासन की प्रथम तिथि (415 ई.) ज्ञात होती है। गुप्त शासकों में सर्वाधिक अभिलेख कुमारगुप्त के मिलते हैं। कुमारगुप्त की मुद्रा शैली विशेष थी तथा 623 मुद्राएँ बयाना मुद्राभण्डार से मिली हैं। उसके सिक्कों से ज्ञात होता है कि उसने अश्वमेध यज्ञ किया था। नालन्दा विश्वविद्यालय की स्थापना कुमारगुप्त ने की। इस विश्वविद्यालय को महायान बौद्ध धर्म का ऑक्सफोर्ड कहा जाता है। कुमारगुप्त ने महेन्द्रादित्य, श्री महेन्द्र तथा अश्वमेध महेन्द्र आदि उपाधियाँ धारण कीं।

नोट: स्कन्दगुप्त के भीतरी लेख से जानकारी मिलती है कि कुमारगुप्त के समय पुष्यमित्रों का आक्रमण हुआ, जिनसे निपटने के लिए कुमारगुप्त ने अपने पुत्र स्कन्दगुप्त को भेजा और पुष्यमित्रों को पराजय का सामना करना पड़ा।

स्कन्दगुप्त (455 ई.-467 ई.)

कुमारगुप्त की मृत्यु के बाद स्कन्दगुप्त राजगद्दी पर बैठा। स्कन्दगुप्त को गद्दी पर बैठते ही हूणों के आक्रमण का सामना करना पड़ा। इसकी जानकारी जूनागढ़ अभिलेख से मिलती है, जिसमें हूणों को ‘म्लेच्छ’ कहा गया है। गिरनार पर्वत पर स्थित सुदर्शन झील का पुनर्निर्माण स्कन्दगुप्त ने करवाया। इस कार्य की जिम्मेदारी उसने गर्वनर पर्णदत्त के पुत्र चक्रपालित को सौंपी। चक्रपालित ने सुदर्शन झील के किनारे विष्णु मंदिर का निर्माण भी करवाया। स्कन्दगुप्त के कहौम अभिलेख में उसकी उपाधि शक्रादित्य थी।

हूणों का आक्रमण (458 ई.) स्कन्दगुप्त के शासनकाल में प्रारम्भ हुआ।

तोरमाण हूणों का महत्त्वपूर्ण शासक था।

गुप्तवंश का अंतिम शासक विष्णुगुप्त था।

चीनी यात्री शुंग युन छठी शताब्दी (518 ई.) में भारत आया था।

प्राचीन समय में शतरंज खेल बहुत लोकप्रिय था।

गुप्त शासकों की प्रमुख उपाधियाँ

शासक का नाम धारण की गई उपाधियाँ विशेष महत्व
श्रीगुप्त महाराज, आदिराज गुप्त वंश का संस्थापक।
घटोत्कच महाराज श्रीगुप्त का पुत्र।
चन्द्रगुप्त प्रथम महाराजाधिराज गुप्त वंश का पहला ‘स्वतंत्र’ और शक्तिशाली शासक।
समुद्रगुप्त पराक्रमांक, कविराज, अश्वमेध-पराक्रम इन्हें ‘भारत का नेपोलियन’ भी कहा जाता है।
चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य, विक्रमांक, शकारि, परम भागवत शकों पर विजय के उपलक्ष्य में ‘शकारि’ की उपाधि ली।
कुमारगुप्त प्रथम महेन्द्रादित्य, शक्रादित्य इनके समय में ही नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना हुई।
स्कन्दगुप्त क्रमादित्य, देवराज, शक्रोपम हूणों को पराजित करने के कारण प्रसिद्ध।

गुप्तकालीन प्रशासनिक विभाजन एवं अधिकारी

प्रशासनिक इकाई आधुनिक समकक्ष मुख्य अधिकारी (पदनाम)
देश / राष्ट्र संपूर्ण साम्राज्य गोप्ता (राजा द्वारा नियुक्त)
भुक्ति प्रांत / राज्य उपरिक (अक्सर राजपरिवार से)
विषय जिला / संभाग विषयपति
वीथि तहसील / उप-जिला आयुहतक / विथी-महत्तर
पेठ ग्राम समूह पेठ-पति
ग्राम गाँव (सबसे छोटी इकाई) ग्रामिक / महत्तर

पदाधिकारियों के सर्वश्रेष्ठ वर्ग को कुमारामात्य कहा जाता है।

गुप्त काल में कुमारगुप्त के दामोदरपुर ताम्रपत्र में भूमि बिक्री सम्बन्धी अधिकारियों के क्रियाकलापों का वर्णन है।

गुप्तकाल में भूमि सम्बन्धी करों की संख्या बढ़ गई, लेकिन वाणिज्य-करों की संख्या घटी।

गुप्तकाल में भू-राजस्व 1/4 से 1/6 भाग लिया जाता था।

करों की अदायगी दोनों ही रूपों — हिरण्य (नकद) और मेय (अन्न) में की जाती थी।

कुछ प्रमुख करों के नाम निम्न हैं:

  1. भाग — भूमि उपज का लगभग 1/6 भाग।

  2. उदंग — एक प्रकार का भूमिकर।

  3. भोग — राजा को प्रतिदिन दी जाने वाली फल-फूल आदि की भेंट।

  4. उपरिकर — एक प्रकार का भूमिकर।

  5. भूतावात प्रत्याय — विदेशी वस्तुओं के आयात पर लगने वाला कर।

  6. शुल्क — सीमा एवं बिक्री की वस्तुओं आदि पर लगने वाला कर।

  7. हलिवकर / हलकर / हलदण्ड — हल रखने वाले प्रत्येक कृषक द्वारा दिया जाने वाला कर।

मंदसौर अभिलेख से रेशम बुनकरों की श्रेणी द्वारा विशाल सूर्यमंदिर के निर्माण का उल्लेख मिलता है।

सभी व्यापारिक मार्ग उज्जैन में आकर मिलते थे।

गुप्तकाल में वस्त्र उद्योग सबसे महत्त्वपूर्ण था। गुप्तकाल में आय-व्यय तथा लेखन कार्य करने वालों को कायस्थ कहा गया। जिसका सर्वप्रथम उल्लेख ‘याज्ञवलक्य’ ने किया है। गुप्त शासकों ने सर्वाधिक स्वर्ण मुद्राएँ जारी कीं, जिन्हें ‘दीनार’ कहा जाता था।

चाँदी के सिक्कों का प्रयोग स्थानीय लेन-देन में किया जाता था। चाँदी के सिक्के चन्द्रगुप्त द्वितीय की शकों के विरुद्ध विजय के बाद आरम्भ हुए।

गुप्त साम्राज्य को भारतीय सभ्यता / हिंदुत्व का स्वर्णयुग माना जाता है।

विंध्य जंगल में शवर जाति के लोग अपने देवताओं को मनुष्य का मांस चढ़ाते थे।

प्रथम सती होने के प्रमाण (साक्ष्य) 510 ई. के भानुगुप्त के एरण अभिलेख से मिलता है, जिसमें गोपराज नामक सेनापति की पत्नी के सती होने का उल्लेख है।

गुप्तकाल में वेश्यावृत्ति करने वाली महिलाओं को ‘गणिका’ कहा जाता था तथा वृद्ध वेश्याओं को ‘कुट्टनी’ कहा जाता था।

गुप्त शासकों का व्यक्तिगत धर्म वैष्णव धर्म था। वैष्णव धर्म को राजधर्म बनाया गया तथा गुप्त वंश का राजकीय चिन्ह ‘गरुड़’ था। चन्द्रगुप्त द्वितीय ने विष्णुपद पर्वत पर विष्णुध्वज की स्थापना की। वैष्णव धर्म का प्रधान अंग ‘अवतारवाद’ था।

गुप्तकालीन मन्दिर कला का सर्वोत्तम उदाहरण देवगढ़ का दशावतार मंदिर है, जिसमें सर्वप्रथम शिखर का प्रयोग किया गया।

गुप्तकालीन मंदिर — पार्वती मंदिर (नचना कुठार, मध्यप्रदेश), शिव मंदिर (भूमरा, खोह, नागौदा, मध्यप्रदेश), विष्णु मंदिर (तिगवा, जबलपुर, मध्यप्रदेश), ईंटों द्वारा निर्मित दशावतार मंदिर (देवगढ़, ललितपुर, उत्तरप्रदेश) तथा लक्ष्मण मंदिर (भीतरगांव, कानपुर, उत्तरप्रदेश) आदि।

रूपभित्ति चित्रकारी (Fresco Painting) का प्रयोग सर्वप्रथम अजन्ता-एलोरा की गुफाओं में किया गया। इसमें सर्वाधिक नीले रंग का प्रयोग हुआ है। अजन्ता एवं एलोरा में चित्रित दृश्य जातक कथाओं पर आधारित हैं।

अजन्ता की गुफाएँ महाराष्ट्र में स्थित हैं। इनकी संख्या 29 है, जिनमें से वर्तमान में केवल 6 ही सुरक्षित हैं। गुफा संख्या 16, 17 एवं 19 गुप्तकालीन मानी जाती हैं। गुफा 16 में मरणासन्न राजकुमारी का चित्र है।

गुफा संख्या 17 को ‘चित्रशाला’ कहा जाता है। इसमें बुद्ध के जन्म, जीवन, महाभिनिष्क्रमण एवं महापरिनिर्वाण से संबंधित चित्र अंकित हैं।

गुप्तकालीन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

विद्वान प्रमुख रचनाएँ (पुस्तकें) मुख्य योगदान / क्षेत्र
आर्यभट्ट आर्यभट्टीय, सूर्य सिद्धान्त शून्य का प्रयोग, पृथ्वी की परिधि की गणना, यह बताना कि पृथ्वी गोल है और अपनी धुरी पर घूमती है।
वराहमिहिर पंच सिद्धान्तिका, वृहत्संहिता, लघुजातक खगोल शास्त्र, फलित ज्योतिष और वनस्पति विज्ञान के प्रकांड विद्वान।
भास्कराचार्य प्रथम महाभास्कर्य, लघु भास्कर्य, भाष्य आर्यभट्ट के सिद्धांतों की व्याख्या की और खगोल विज्ञान को आगे बढ़ाया।
ब्रह्मगुप्त ब्रह्मस्फुट सिद्धान्त, खण्डखाद्यक गुरुत्वाकर्षण (Gravity) के सिद्धांत का पूर्वाभास दिया और चक्रीय चतुर्भुज के नियम बताए।
भास्कराचार्य द्वितीय सिद्धान्त शिरोमणी, लीलावती महान गणितज्ञ (लीलावती उनकी पुत्री का नाम था, जिस पर उन्होंने गणित की पुस्तक लिखी)।
वागभट्ट अष्टांग हृदय, अष्टांग संग्रह आयुर्वेद के प्रसिद्ध विद्वान; चरक और सुश्रुत के बाद ‘वृद्धत्रयी’ के तीसरे स्तंभ।
पालकाप्य (पलकाण्व) हस्त्यायुर्वेद हाथियों की चिकित्सा और उनकी बीमारियों के उपचार पर आधारित ग्रंथ।

नवनीतकम् की रचना गुप्तकाल में हुई तथा इसमें सूत्र, नुस्खे और उपचार-विधियाँ दी गई हैं।

नोट:

  1. आर्यभट्ट गुप्तकाल के सबसे बड़े गणितज्ञ थे। उन्होंने पृथ्वी की त्रिज्या का मान बताया तथा गणित और खगोलशास्त्र को अलग किया।

  2. वराहमिहिर ने फलित ज्योतिष (कुण्डली) पर बल दिया।

गुप्तकालीन साहित्य

कला और साहित्य के विकास की दृष्टि से गुप्तकाल को भारतीय इतिहास का ‘क्लासिकी युग अथवा स्वर्णयुग’ कहा गया है।

नोट: धार्मिक साहित्य रामायण व महाभारत के अंतिम रूप का सम्पादन भी गुप्तकाल में ही हुआ था।

गुप्तकालीन साहित्य एवं रचनाकार

साहित्य (रचना) लेखक (रचनाकार) श्रेणी / विषय
ऋतुसंहार, मेघदूत कालिदास गीतिकाव्य / खंडकाव्य
कुमारसंभव, रघुवंश कालिदास महाकाव्य
मालविकाग्निमित्रम्, विक्रमोर्वशीयम्, अभिज्ञानशाकुंतलम् कालिदास नाटक
नागानन्द, रत्नावली, प्रियदर्शिका हर्षवर्धन संस्कृत नाटक
देवीचन्द्रगुप्तम्, मुद्राराक्षस विशाखदत्त ऐतिहासिक नाटक
पंचतंत्र विष्णु शर्मा नीतिपरक कहानियाँ
स्वप्नवासवदत्ता, चारुदत्त, उरुभंग महाकवि भास नाटक
अमरकोष अमरसिंह शब्दावली / शब्दकोश
चन्द्रव्याकरण चन्द्रगोमी व्याकरण
नीतिसार कामन्दक राजनीति / अर्थशास्त्र
कामसूत्र वात्स्यायन सामाजिक जीवन / कामशास्त्र
किरातार्जुनियम भारवि महाकाव्य
योगाचार असंग व वसुबन्धु बौद्ध दर्शन
चरक संहिता चरक आयुर्वेद / चिकित्सा
न्यायवतार सिद्धसेन जैन न्याय दर्शन
दशकुमारचरित दण्डिन गद्य काव्य
रावण वध (भट्टिकाव्य) वत्सभट्टि महाकाव्य / व्याकरण

 

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