सिन्धु घाटी सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है। साधारणतः इसे “सिन्धु घाटी की सभ्यता” और “हड़प्पा सभ्यता” के नाम से जाना जाता है। यह विश्व की सबसे बड़ी सभ्यताओं में से एक थी। सिन्धु सभ्यता को आद्य-ऐतिहासिक तथा हड़प्पा सभ्यता की कांस्य युगीन सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है।
यह सभ्यता मुख्यतः सिंधु नदी घाटी में फैली होने के कारण इसका नाम सिंधु सभ्यता पड़ा। लगभग 2500 वर्ष पहले ईरानी लोगों ने इसे “हेन्दु (हिन्दोस)”, यूनानी (ग्रीक) लोगों ने “इंडोस” और रोमन लोगों ने “इंडस” कहा था।
मेसोपोटामिया की सभ्यता, सिंधु सभ्यता की समकालीन थी। यह दजला और फरात (टिगरिस और यूफ्रेटीस) नदियों के किनारे बसी थी। वहाँ अकाड़ियन, एमोराइट, एलामाइट और मेसोपोटामियन भाषाएँ प्रचलित थीं। वहाँ के लोग सिंधु घाटी सभ्यता को “मेलुहा” कहते थे। सारगोन अभिलेख में सिंधु सभ्यता को ‘मेलूहा’ कहा गया है। मेलूहा को नाविकों का देश कहा जाता था तथा यह हाजा पक्षी के लिए प्रसिद्ध था।
इसका काल निर्धारण “रेडियोकार्बन” जैसी नवीन विश्लेषण पद्धति के अनुसार किया गया है। इस पद्धति के आधार पर सिन्धु सभ्यता की सर्वमान्य तिथि 2350 ईसा पूर्व से 1750 ईसा पूर्व मानी गई है।
नोट: तिथि निर्धारण की कार्बन-14 (C-14) पद्धति की खोज अमेरिका के प्रसिद्ध रसायनशास्त्री वी. एफ. लिब्बी ने 1946 ई. में की थी। इस पद्धति में जिस पदार्थ में कार्बन-14 की मात्रा जितनी कम होती है, वह उतना ही प्राचीन माना जाता है।
2600–1900 ई.पू. — नई NCERT के अनुसार
3250–2750 ई.पू. — सारगोन अभिलेख के अनुसार (मध्य एशिया)
2350–1750 ई.पू. — पुरानी NCERT के अनुसार
सिन्धु सभ्यता का विस्तार त्रिभुजाकार था। इसका क्षेत्रफल लगभग 13 लाख वर्ग किलोमीटर था।
इसका विस्तार—
उत्तर में मांडा (जम्मू-कश्मीर),
पश्चिम में सुत्कगेंदोर (बलूचिस्तान),
पूर्व में आलमगीरपुर (उत्तर प्रदेश) — हिण्डन नदी के किनारे,
दक्षिण में दैमाबाद (महाराष्ट्र) — प्रवरा नदी के किनारे तक था।
सिन्धु सभ्यता भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में फैली हुई थी। नवीनतम आँकड़ों के अनुसार यह सभ्यता लगभग 400–500 वर्षों तक विद्यमान रही तथा 2200 ई.पू. से 2000 ई.पू. के मध्य अपनी परिपक्व अवस्था में पहुँची।
इस सभ्यता के परिपक्व अवस्था के छह प्रमुख नगर थे— मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, गणवारीवाला, धौलावीरा, राखीगढ़ी और कालीबंगा।
अफगानिस्तान में स्थित शोर्तुघई और मुंडीगाक भी हड़प्पा सभ्यता के प्रमुख पुरातात्विक स्थल हैं। शोर्तुघई उत्तरी अफगानिस्तान में कोकचा और ऑक्सस नदी के संगम पर स्थित है।
इस सभ्यता के अब तक 350 से अधिक स्थल प्रकाश में आ चुके हैं, जिनमें से लगभग 200 स्थल गुजरात में हैं।
सिन्धु सभ्यता में हड़प्पा का सर्वप्रथम उत्खनन 1921 ई. में हुआ, इसलिए इसे हड़प्पा सभ्यता भी कहा जाता है।
हड़प्पा के टीलों की सर्वप्रथम जानकारी 1826 ई. में चार्ल्स मेसन ने दी थी। हड़प्पा से दो टीले प्राप्त हुए— पूर्वी टीला (आवासीय क्षेत्र) और पश्चिमी टीला (दुर्गीकृत क्षेत्र), जो ऊँचे स्थान पर स्थित था।
हड़प्पा से स्वास्तिक का चिन्ह प्राप्त हुआ है। इस काल में देवताओं की मूर्तियाँ मिली हैं, परन्तु मंदिरों के निर्माण के प्रमाण नहीं मिलते।
यहाँ 6-6 की दो पंक्तियों में कुल 12 अन्नागार मिले हैं, जिनका कुल क्षेत्रफल लगभग 2745 वर्ग मीटर से अधिक था।
यहाँ से स्त्री के गर्भ से निकलते हुए पौधे की आकृति वाली एक आयताकार मुहर मिली है, जिसे उर्वरता की देवी माना जाता है।
सिन्धु घाटी सभ्यता का सबसे बड़ा स्थल मोहनजोदड़ो है, जबकि भारत में इसका सबसे बड़ा स्थल राखीगढ़ी है।
मोहनजोदड़ो का शाब्दिक अर्थ “मृतकों का टीला” है। इसका उत्खनन सर्वप्रथम 1922 ई. में राखलदास बनर्जी ने किया था। इसे “सिन्ध का बाग” या “नखलिस्तान” भी कहा जाता है। यहाँ वृषभ (सांड) युक्त मुद्रा प्राप्त हुई है।
मोहनजोदड़ो की सबसे महत्वपूर्ण खोज विशाल स्नानागार है, जो एक आयताकार जलाशय है। इसकी लंबाई 11.88 मीटर, चौड़ाई 7.01 मीटर तथा गहराई 2.43 मीटर है।
स्नानागार के निर्माण में जिप्सम (गिरी पुष्पक) का प्रयोग किया गया था। इसे प्राकृतिक चारकोल की परत चढ़ाकर जलरोधी बनाया गया था। यह विशाल स्नानागार धर्मानुष्ठान संबंधी स्नान के लिए प्रयुक्त होता था। मार्शल ने इसे तत्कालीन विश्व का एक आश्चर्यजनक निर्माण कहा। इसके उत्तर व दक्षिण में पकी हुई पतली ईंटों से बनी सीढ़ियाँ थीं तथा उत्तर दिशा में कपड़े बदलने के 6 कक्ष बने हुए थे।
मोहनजोदड़ो की सबसे बड़ी इमारत ग्रेट ग्रैनरी (विशाल अन्नागार) थी। यह पूर्व से पश्चिम 45.72 मीटर लंबा तथा उत्तर से दक्षिण 22.86 मीटर चौड़ा था। यहाँ से एसेम्बली हॉल (सभा भवन) और आयताकार भवन (पुरोहित आवास) के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं।
एक नर्तकी की मूर्ति मिली है, जो कांस्य धातु की बनी हुई है। वह नग्न अवस्था में है और उसके एक हाथ में चूड़ियाँ हैं।
मोहनजोदड़ो से एक मुहर मिली है, जिस पर ‘आद्य शिव’ (तीन मुख वाले देवता) का चित्र अंकित है। सर जॉन मार्शल ने इन्हें ‘पशुपति नाथ’ कहा।
इतिहासकार पिग्गट ने हड़प्पा और मोहनजोदड़ो को सिन्धु घाटी सभ्यता की जुड़वा राजधानी कहा है।
सिन्धु घाटी में घरों के दरवाजे मुख्य मार्ग पर न खुलकर पिछवाड़े की ओर खुलते थे। केवल लोथल नगर के घरों के दरवाजे मुख्य सड़क की ओर खुलते थे। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो तथा अन्य प्रमुख नगर पूर्णतः पक्की ईंटों से बने थे, जबकि कालीबंगा और रंगपुर कच्ची ईंटों से बने थे। ईंटों का आकार 4×2×1 होता था।
लोथल नगर के उत्खननकर्ता एस. आर. राव (रंगनाथ राव) थे। यह एक व्यापारिक नगर था। 1957 ई. में यहाँ से गोदीवाड़ा (Dockyard) प्राप्त हुआ, जो सिंधु घाटी सभ्यता की सबसे बड़ी कृति मानी जाती है। सागर तट पर स्थित लोथल पश्चिमी एशिया (मेसोपोटामिया) से व्यापार का प्रमुख बंदरगाह था। चावल की भूसी के साक्ष्य रंगपुर और लोथल से मिले हैं।
चन्हूदड़ो का उत्खनन 1935 ई. में मैके ने किया तथा इसकी सर्वप्रथम खोज 1931 ई. में एम. जी. मजूमदार ने की। यह एक औद्योगिक नगरी थी। यहाँ से मनके, सीप, अस्थि तथा मुद्रा निर्माण के प्रमाण मिले हैं।
यहाँ से कुत्ते के बिल्ली का पीछा करते हुए पदचिह्न मिले। नारी सौंदर्य प्रसाधन में लिपिस्टिक तथा अलंकृत हाथी भी मिला। यहाँ से ‘झुकर-झांगर’ सांस्कृतिक अवशेष प्राप्त हुए हैं।
कालीबंगा एक परिपक्व हड़प्पा स्थल है। कालीबंगा का अर्थ है “काली चूड़ियाँ”। यहाँ से जुते हुए खेत के प्रमाण मिले हैं। कालीबंगा में शवों के अंत्येष्टि संस्कार हेतु तीन विधियों— पूर्ण समाधिकरण, आंशिक समाधिकरण तथा दाह संस्कार— के प्रमाण मिले हैं।
कालीबंगा से एक खोपड़ी मिली है जिसमें 6 छेद किए गए थे, जिससे ज्ञात होता है कि उन्हें शल्य चिकित्सा का ज्ञान था। यहाँ से अलंकृत ईंटों, कपास की खेती, ऊँट की अस्थियों, भूकंप के प्रमाण, वर्ष में दो फसल उगाने तथा जुते हुए खेतों के साक्ष्य मिले हैं।
धौलावीरा गुजरात के कच्छ जिले के भचाऊ तालुका में स्थित है। यह सिन्धु सभ्यता का एक प्राचीन और विशाल नगर था।
धौलावीरा को तीन भागों— दुर्ग, मध्यम नगर और निचला नगर— में विभाजित किया गया था। प्रत्येक भाग विशाल पत्थर की दीवारों से घिरा था। अपनी विशिष्ट जल प्रबंधन व्यवस्था के कारण यह नगर अत्यंत प्रसिद्ध था।
नोट: धौलावीरा को वर्ष 2019–20 में विश्व धरोहर स्थल में शामिल किया गया। 27 जुलाई 2021 को यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज कमेटी ने यह निर्णय लिया।
हड़प्पा सभ्यता की पहली खगोलीय वेधशाला धौलावीरा में पाई गई थी।
यहाँ से स्टेडियम के साक्ष्य मिले हैं तथा 16 कृत्रिम जलाशय और एक पॉलिशयुक्त सूचना पट्ट (Notice Board) भी प्राप्त हुआ है।
सुरकोटदा (गुजरात) से घोड़े की अस्थियाँ मिली हैं, किन्तु सामान्यतः माना जाता है कि सिंधु सभ्यता के लोगों को घोड़े का विशेष ज्ञान नहीं था।
रंगपुर, जो गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र में स्थित है, वहाँ से चावल के दाने के साक्ष्य मिले हैं।
सिंधु सभ्यता के लोगों को लिपि का ज्ञान था। उनकी लिपि चित्रात्मक (भावचित्रात्मक) थी और दाएँ से बाएँ लिखी जाती थी। इसे “गौमूत्राक्षर लिपि” भी कहा जाता है। इसमें लगभग 375 से 400 चिह्न हैं और यह अब तक अपठित है।
सिन्धु घाटी सभ्यता विश्व की प्रथम नगरीय सभ्यता थी, जिसके नगर ग्रिड प्रणाली पर बसे थे तथा सड़कें एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं।
सिन्धु सभ्यता के लोग यातायात के लिए दो पहियों और चार पहियों वाली बैलगाड़ी का उपयोग करते थे।
सिन्धु सभ्यता में समाज संभवतः चार वर्गों में विभाजित था—
(i) पुरोहित वर्ग
(ii) व्यापारी वर्ग
(iii) किसान वर्ग
(iv) श्रमिक वर्ग।
सिंधु सभ्यता में शांतिप्रिय लोग रहते थे, क्योंकि यहाँ अत्यंत कम मात्रा में हथियार मिले हैं। वे तलवार से परिचित नहीं थे तथा लोहे का ज्ञान नहीं था। वे कांस्य (ताँबा + टिन) का प्रयोग करते थे।
इस सभ्यता में सोने और चाँदी का प्रयोग होता था। पुरुष और महिलाएँ आभूषण पहनते थे तथा श्रृंगार करते थे।
मनोरंजन के लिए मुर्गों और अन्य पशु-पक्षियों की लड़ाई कराना, शतरंज खेलना, शिकार करना और मछली पकड़ना उनके प्रिय कार्य थे।
सिंधु घाटी सभ्यता के घर एक या दो मंजिला होते थे। घर के आंगन के चारों ओर कमरे बनाए जाते थे। अधिकांश घरों में अलग स्नानागार होता था तथा कुछ घरों में निजी कुएँ भी थे।
सिंधु सभ्यता के लोग लाल मिट्टी के बर्तनों पर काले रंग से डिजाइन बनाते थे।
सिन्धु सभ्यता के लोग वृक्ष पूजा, जल पूजा, लिंग पूजा, योनि पूजा तथा मातृदेवी की उपासना में विश्वास रखते थे। उन्हें ध्यान और योग का भी ज्ञान था।
सिंधु सभ्यता में मातृसत्तात्मक संयुक्त परिवार प्रचलित थे, क्योंकि बड़ी संख्या में मातृदेवियों की मूर्तियाँ मिली हैं।
यहाँ से अधिकतर मुहरें शैलखड़ी (स्टियाटाइट) की बनी तथा आयताकार आकार की मिली हैं।
(i) मुहरों पर एक-श्रृंगी (यूनिकॉर्न) आकृति सबसे अधिक मिलती है।
(ii) पशुओं में कूबड़ वाला साँड अधिक पूजनीय था।
मिट्टी की मूर्तियाँ आग में पकाकर बनाई जाती थीं, जिसे ‘टेराकोटा पद्धति’ कहा जाता है।
सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था कृषि आधारित थी। यहाँ गेहूँ, सरसों, चना, मटर और रागी प्रमुख फसलें थीं। लोथल और रंगपुर से चावल तथा चावल की भूसी के प्रमाण मिले हैं। पशुपालन भी प्रचलित था। सैंधववासी सूती और ऊनी वस्त्र पहनते थे, क्योंकि यहाँ कपास की खेती होती थी। मुद्रा प्रचलन में नहीं थी, इसलिए व्यापार वस्तु-विनिमय प्रणाली से होता था।
सिंधु के पूर्व क्षेत्र के लिए छठी-पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व में ‘हिन्दु’ शब्द का प्रयोग होता था। सबसे पहले ईरानियों ने सिंधु नदी के पूर्व में रहने वालों को ‘हिन्दु’ कहा।
विदेशी व्यापार
| आयातित वस्तु | प्रमुख आयात क्षेत्र |
| टिन | अफगानिस्तान, ईरान |
| ताँबा | खेतड़ी (राजस्थान), बलूचिस्तान, ओमान |
| चाँदी | अफगानिस्तान, ईरान |
| सोना | कर्नाटक (कोलार खान), अफगानिस्तान, ईरान |
| सीसा | ईरान, राजस्थान |
| गोमेद | सौराष्ट्र (गुजरात) |
| लाजवर्त मणि | बदख्शां (अफगानिस्तान) |
सिंधु घाटी सभ्यता के पतन के कारण (इतिहासकारों के अनुसार)
| इतिहासकार | पतन का प्रस्तावित कारण |
| गार्डन चाइल्ड व मॉर्टिमर व्हीलर | आर्यों का आक्रमण |
| एस. आर. राव, सर जॉन मार्शल व मैके | बाढ़ (नदियों का उफान) |
| सर जॉन मार्शल | प्रशासनिक शिथिलता |
| अमलानंद घोष | जलवायु परिवर्तन |
| यू. आर. केनेडी | प्राकृतिक आपदा (महामारी/मलेरिया) |
| माधोस्वरूप वत्स | नदियों के मार्ग में परिवर्तन |
सिंधु घाटी सभ्यता की प्रारंभिक जानकारी
1826 ई. — चार्ल्स मेसन ने सर्वप्रथम प्रकाश डाला।
1853 ई. — अलेक्जेंडर कनिंघम ने हड़प्पा का सर्वे किया।
1856 ई. — जॉन और विलियम बर्टन ने रेलवे निर्माण में हड़प्पा की ईंटों का उपयोग किया।
1856 ई. — अलेक्जेंडर कनिंघम ने पुनः सर्वे किया।
1861 ई. — भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की स्थापना हुई।
लॉर्ड केनिंग के समय अलेक्जेंडर कनिंघम को ASI का जनक कहा गया।
1921 ई. — सर जॉन मार्शल ने दयाराम साहनी को हड़प्पा उत्खनन हेतु नियुक्त किया।
1922 ई. — राखलदास बनर्जी ने मोहनजोदड़ो का उत्खनन किया।
1924 ई. — सर जॉन मार्शल ने सिन्धु घाटी सभ्यता / हड़प्पा सभ्यता का नामकरण किया।
| क्र.सं. | प्रमुख स्थल | स्थिति | नदी | उत्खननकर्ता एवं वर्ष |
| 1. | हड़प्पा | साहीवाल जिला, पंजाब (पाकिस्तान) | रावी | दयाराम साहनी (1921), माधोस्वरूप वत्स (1926), व्हीलर (1946) |
| 2. | मोहनजोदड़ो | लरकाना जिला, सिंध (पाकिस्तान) | सिन्धु | राखलदास बनर्जी (1922), मैके (1927), व्हीलर (1930) |
| 3. | लोथल | अहमदाबाद जिला, गुजरात (भारत) | भोगवा | एस.आर. राव (1953-54) |
| 4. | धौलावीरा | कच्छ जिला, गुजरात (भारत) | लूनी | जे.पी. जोशी (1967-68), रवीन्द्र सिंह विष्ट (1990-91) |
| 5. | चन्हुदड़ो | नवाब शाह जिला, सिंध (पाकिस्तान) | सिन्धु | मैके (1925), एन.जी. मजुमदार (1931) |
| 6. | सुरकोटड़ा | कच्छ जिला, गुजरात | – | जगपति जोशी (1972-75) |
| 7. | रंगपुर | काठियावाड़ जिला, गुजरात | मादर | रंगनाथ राव (1953-54) |
| 8. | कालीबंगा | हनुमानगढ़ जिला, राजस्थान | घग्घर | अमलानन्द घोष (1951), बी.वी. लाल एवं बी.के. थापर (1961) |
| 9. | कोटदीजी | खैरपुर, सिंध प्रांत (पाकिस्तान) | सिन्धु | फजल अहमद (1953) |
| 10. | आलमगीरपुर | मेरठ, उत्तर प्रदेश | हिण्डन | यज्ञदत्त शर्मा (1953-56) |
| 11. | दायमाबाद | अहमदनगर, महाराष्ट्र | प्रवर | देशपांडे (1958-59), एस.आर. राव, एम.ए. साली |
| 12. | सुत्कागेंडोर | मकरान तट, बलूचिस्तान (पाक) | दाश्क | ऑरेल स्टाइन (1927) |
| 13. | रोपड़ | रोपड़ जिला, पंजाब (भारत) | सतलज | यज्ञदत्त शर्मा (1953-56) |
| 14. | बनवाली | हिसार जिला, हरियाणा | रंगोई | रवीन्द्र सिंह विष्ट (1974) |
| 15. | सोतकाकोह | दक्षिण बलूचिस्तान | शादीकौर | जॉर्ज डेल्स (1962) |
| 16. | राखीगढ़ी | हिसार जिला, हरियाणा | घग्घर | रफीक मुगल, अमरेन्द्र नाथ (1997-99) |
| 17. | देसलपुर | कच्छ, गुजरात | – | पी.पी. पाण्ड्या, एम.के. ढाके (1963-64) |
| 18. | कुनाल | फतेहाबाद (हरियाणा) | सरस्वती | जे.एस. खत्री व एम. आचार्य |
| 19. | रोजदी | सौराष्ट्र, गुजरात | भादर | (7 बार उत्खनन 1982-95) |
| 20. | मीताथल | भिवानी, हरियाणा | चौटांग/यमुना | सूरजभान (1968) |
| 21. | मांडा | जम्मू-कश्मीर | चिनाब | जे.पी. जोशी (1976-77) |
| 22. | बालाकोट | खैबर पख्तुनख्वा (पाकिस्तान) | कुनहार | जॉर्ज एफ. डेल्स (1963-70) |
सिंधु घाटी सभ्यता : प्राप्त वस्तुएँ एवं खोज
- हड़प्पा – आर-37 कब्रिस्तान, विदेशी की कब्र, इक्का गाड़ी, श्रृंगार पेटिका, पुजारी की प्रतिमा (स्टैच्यू ऑफ प्रीस्ट)।
- मोहनजोदड़ो – जलापूर्ति के लिए कुएँ, सूती कपड़े (कपास) के साक्ष्य, महान स्नानागार (ग्रेट बाथ)।
- लोथल – हाथी दाँत का पैमाना, घोड़े की मृण मूर्तियाँ, फारस की मुहर, शतरंज के साक्ष्य, पत्तन (बंदरगाह), अग्निवेदिकाएँ।
- धोलावीरा – नगर तीन भागों में विभाजित था – (i) पूर्व भाग, (ii) मध्य भाग, (iii) पश्चिम भाग।
- चन्हुदड़ो – अलंकृत हाथी, खिलौने, लिपिस्टिक, वक्राकार ईंटें।
- सूरकोटदा – घोड़े की हड्डियाँ।
- रंगपुर – धान (चावल) की भूसी के ढेर, कच्ची ईंटों के दुर्ग, मृदभांड।
- कालीबंगा – बेलनाकार मुहरें, हल के निशान (जुते हुए खेत के साक्ष्य), अलंकृत ईंटों का प्रयोग, युगल समाधियाँ, अग्निवेदिकाएँ।
- कोटदीजी – वाणाग्र, काँस्य की चूड़ियाँ, धातु के उपकरण।
- आलमगीरपुर – सिरेमिक उत्पाद, मृदभांड की मूर्तियाँ।
- दैमाबाद – धातु का रथ।
- सूत्कागेंडोर – ताँबे की कुल्हाड़ी, मनुष्य की अस्थि-राख से भरा बर्तन।
- रोपड़ – कृषि के साक्ष्य, गेहूँ एवं चावल के प्रमाण।
- बनवाली – तिल एवं सरसों का ढेर, उत्तम किस्म का जौ, सड़क एवं नालियों के अवशेष, सेलखड़ी व पकाई मिट्टी की मुहरें, टेराकोटा का हल।
- सोत्काह – परिपक्व बस्ती एवं विलासिता के सामान का व्यापार।
- राखीगढ़ी – चबूतरे पर बनी अग्निवेदिका, मिट्टी के मनके।
- देसलपुर – विशाल दीवारों वाला भवन, छज्जेदार कमरे।
- कुनाल – चाँदी के दो मुकुट।
- रोजड़ी – मुकुट, गेहूँ के साक्ष्य।
- मीताथल – चाँदी के आभूषण व बर्तन, लंबी सुराहियाँ।
- बनवाली – जौ एवं मिट्टी के हल की आकृति के साक्ष्य।