मौर्य साम्राज्य (322 ई.पू.–185 ई.पू.)
मौर्य राजवंश की साहित्यिक स्रोतों से जानकारी—
(1) ब्राह्मण साहित्य के अनुसार — शूद्र
(2) जैन व बौद्ध साहित्य के अनुसार — क्षत्रिय
(3) ‘मुद्राराक्षस’ के अनुसार — वृषल (निम्न ग्रेड)
(4) रोमिला थापर के अनुसार — वैश्य
(5) सर्वाधिक मान्य मत — क्षत्रिय
चन्द्रगुप्त मौर्य (322 ई.पू.–298 ई.पू.) का जन्म 340 ई.पू. में बिहार में हुआ। चन्द्रगुप्त ने नंद वंश के अंतिम शासक घनानंद को हराकर 322 ई.पू. में मौर्य वंश की स्थापना की। धनानंद को पराजित करने में चाणक्य (विष्णुगुप्त शर्मा) ने चन्द्रगुप्त की सहायता की तथा उसे 1000 कार्षापण में खरीदा। चन्द्रगुप्त ने तक्षशिला में शिक्षा प्राप्त की थी। 322 ई.पू. में वह मगध की राजगद्दी पर बैठा और मौर्य साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक बना।
यूनानी इतिहासकार जस्टिन ने चन्द्रगुप्त मौर्य को ‘सेण्ड्रोकोट्स’ एवं ‘एण्ड्रोकोट्स’ कहा है। विलियम जोन्स ने सिद्ध किया कि सेण्ड्रोकोट्स ही चन्द्रगुप्त मौर्य है। 305 ई.पू. में चन्द्रगुप्त ने सिकंदर के सेनापति सेल्यूकस निकेटर को पराजित किया।
युद्ध की संधि के परिणामस्वरूप सेल्यूकस निकेटर ने अपनी पुत्री ‘हेलेना’ का विवाह चन्द्रगुप्त से किया, जिसे भारत का पहला अंतर्राष्ट्रीय विवाह माना जाता है। संधि के अनुसार निकेटर ने आरिया, अराचोसिया, गेडोसिया तथा पारोपामिसाडे के क्षेत्र चन्द्रगुप्त को सौंप दिए। इस जानकारी का उल्लेख यूनानी इतिहासकार स्ट्रेबो और एप्पियानस ने किया है।
प्लूटार्क के अनुसार चन्द्रगुप्त ने सेल्यूकस को 500 हाथी उपहार में दिए। सिकंदर ने अपना राजदूत मेगस्थनीज चन्द्रगुप्त के दरबार में भेजा। मेगस्थनीज भारत आने वाला पहला विदेशी यात्री था। उसने ‘इण्डिका’ नामक पुस्तक लिखी, जिसमें मौर्य साम्राज्य के नगरीय और सैन्य प्रशासन का वर्णन है। इसमें प्रशासन के लिए छह समितियों का उल्लेख मिलता है। उसने पाटलिपुत्र (पॉलिखोया) का वर्णन किया, जो गंगा और सोन नदी के संगम पर स्थित था और जिसमें 570 बुर्ज तथा 64 मीनारें थीं।
कौटिल्य (चाणक्य) को ‘अर्थशास्त्र’ का लेखक माना जाता है। यह राजनीति विज्ञान से संबंधित ग्रंथ है। इसमें 15 अधिकरण, 180 प्रकरण और लगभग 4000 श्लोक हैं। इसकी तुलना मैकियावेली की पुस्तक ‘प्रिन्स’ से की जाती है।
चन्द्रगुप्त मौर्य को भारत का प्रथम प्रभुत्वसम्पन्न शासक माना जाता है। उसका आध्यात्मिक गुरु भद्रबाहु था। उसने जैन धर्म ग्रहण किया और जीवन के अंतिम समय में शासन त्यागकर श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) चला गया, जहाँ 298 ई.पू. में संल्लेखना विधि द्वारा उपवास करते हुए शरीर त्याग दिया। जैन ग्रंथों के अनुसार उसके शासन के अंत में मगध में 12 वर्षों का भयंकर अकाल पड़ा।
चन्द्रगुप्त के सामंत पुष्यगुप्त ने गुजरात में सुदर्शन झील का निर्माण कराया।
बिन्दुसार (298 ई.पू.–272 ई.पू.) चन्द्रगुप्त मौर्य का पुत्र था और 298 ई.पू. में गद्दी पर बैठा। यूनानी साहित्य में उसे ‘अमित्रोचेट्स’ या ‘अमित्रधात’ कहा गया है। तिब्बती इतिहासकार तारानाथ के अनुसार वह एक महान शासक था। कहा जाता है कि उसने दक्षिण भारत पर आक्रमण किए। वह आजीवक संप्रदाय का अनुयायी था। आजीवक संप्रदाय की स्थापना मक्खलिपुत्त गोसाल ने की।
यूनानी इतिहासकार एथिनियस के अनुसार बिन्दुसार ने यूनान के शासक एण्टियोकस-1 से तीन वस्तुएँ मंगवाईं— मीठी शराब, सूखे मेवे (विशेषकर अंजीर) और एक दार्शनिक।
बिन्दुसार के समय तक्षशिला में दो विद्रोह हुए, जिनका दमन अशोक और सुसीम ने किया। नेपाल के विद्रोह का दमन भी अशोक ने किया। बिन्दुसार की मृत्यु के समय अशोक उज्जैन का राज्यपाल था।
बिन्दुसार के अन्य नाम
| नाम | स्रोत / विवरण |
| अमित्रघात (अमित्रोचेट्स) | यूनानी लेखकों द्वारा (इसका अर्थ है: ‘शत्रुओं का नाश करने वाला’) |
| भद्रसार (या वारिसार) | वायु पुराण के अनुसार |
| सिंहसेन | जैन ग्रंथों के अनुसार |
| विन्दुपाल | चीनी विवरणों के अनुसार |
| अलिड्रोकेड्स | यूनानी विद्वान स्ट्रेबो के अनुसार |
अशोक का लगभग 4 वर्षों तक अपने भाइयों के साथ सत्ता-संघर्ष चला। सिंहली अनुश्रुति के अनुसार अशोक ने अपने 99 भाइयों की हत्या की।
अशोक की माता का नाम भीमा / सुभद्रांगी था। उनकी पत्नी देवी (विदिशा, म.प्र.) थीं, जिनके पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा ने श्रीलंका में बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार किया।
अशोक की दूसरी पत्नी कारूबाकी थी, जिनसे पुत्र तीवर उत्पन्न हुआ। तीवर का उल्लेख एक अभिलेख में मिलता है।
कहा जाता है कि अशोक ने क्रोधित होकर तिस्यरक्षिता को जीवित जला दिया।
अशोक का राज्याभिषेक 269 ई.पू. में हुआ।
अशोक का नाम
| अशोक के नाम | स्रोत / अभिलेख |
| अशोक वर्द्धन | पुराणों में (विशेषकर विष्णु पुराण) |
| अशोक मौर्य | गिरनार अभिलेख (रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख) |
| अशोक (व्यक्तिगत नाम) | मास्की, गुर्जरा, नेटुर एवं उदेयगोलम् अभिलेखों में |
| प्रियदर्शी (पियदस्सी) | भाब्रू शिलालेख (इसमें अशोक स्वयं को ‘मगध का राजा’ भी कहता है) |
| देवानांपिय | अधिकांश शिलालेखों में (अर्थ: ‘देवताओं का प्रिय’) |
‘Kalhana’ की पुस्तक ‘Rajatarangini’ के अनुसार Ashoka पहले भगवान शिव का अनुयायी था। अशोक ने ‘श्रीनगर’ शहर की स्थापना की और वहाँ शिव मंदिर का निर्माण करवाया। ‘राजतरंगिणी’ को भारतीय इतिहास की प्रथम पुस्तक माना जाता है तथा ‘कल्हण’ जयसिंह के दरबार में था। अशोक ने नेपाल में भी ‘ललितपाटन’ शहर बसाया था। अशोक ने अपने राज्याभिषेक के 8वें वर्ष (261 ई.पू.) में कलिंग युद्ध किया, कलिंग का शासक ‘नंदराज’ था। इस युद्ध में अशोक ने विजय प्राप्त की लेकिन इस युद्ध में 1 लाख लोग मारे गए तथा 1.50 लाख लोगों को बन्दी बनाया गया। इस युद्ध के पश्चात् अशोक का हृदय-परिवर्तन हो गया इसलिए उसने युद्धघोष के स्थान पर ‘धम्म घोष’ को अपना लिया।
मौर्यकालीन स्थापत्य कला का सर्वश्रेष्ठ नमूना साँची का स्तूप है। यह बौद्ध धर्म से सम्बन्धित है। यह मध्य प्रदेश में स्थित है। मौर्यकाल का प्रचलित सिक्का-पण था। ‘धम्म’ शब्द राहुलोवाद सुत्त पुस्तक से लिया गया है। धम्म एक आचार संहिता है। मौर्यकाल का सर्वश्रेष्ठ बन्दरगाह ताम्रलिप्ति था। ‘कण्टकशोधक’ शब्द न्यायालय के लिए प्रयुक्त हुआ है। भाग, बलि, प्रणय, विष्टि एक कर थे।
विष्टि एक बेगारी कर था। बिना मजदूरी/परिश्रम दिए बिना कार्य करवाना। अशोक को भारतीय इतिहास में जनहित कार्यों के लिए स्मरण किया जाता है।
कलिंग का प्राचीन नाम ‘उत्कल’ था, इसकी राजधानी तोसली थी। कलिंग शासक खारवेल महामेघवाहन वंश के थे। इन्होंने उड़ीसा में उदयगिरि की पहाड़ियों में हाथीगुफा शिलालेख उत्कीर्ण करवाया था।
कौटिल्य की ‘अर्थशास्त्र’ के अनुसार कलिंग हाथियों के लिए प्रसिद्ध था। इन्हीं हाथियों को प्राप्त करने के लिए अशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया।
सिंहली अनुश्रुतियों ‘दीपवंश’ तथा ‘महावंश’ के अनुसार अशोक को उसके शासन के चौथे (4वें) वर्ष ‘निग्रोध’ नामक भिक्षु ने बौद्ध धर्म में दीक्षित किया। इसके बाद अशोक ‘मोग्गलिपुत्त तिस्स’ से प्रभावित हुआ एवं बौद्ध धर्म में रुचि रखने लगा।
‘दिव्यावदान’ (बौद्ध साहित्य) के अनुसार अशोक को बौद्ध धर्म में दीक्षित करने का श्रेय ‘उपगुप्त’ को दिया गया है, चीनी यात्री ‘हेनसांग’ इसका समर्थन करता है।
20वें वर्ष में लुम्बिनी की यात्रा की।
अशोक ने अपने शासन के दौरान सर्वप्रथम बौद्ध गया की धम्म यात्रा की।
अशोक ने ‘धम्म’ के प्रचार-प्रसार हेतु जगह-जगह लेख उत्कीर्ण करवाए।
इसकी खोज 1750 ई. में ‘टीफैन्थेलर’ ने की।
अशोक को इसकी प्रेरणा ईरानी शासक ‘डेरियस प्रथम / दारा प्रथम’ से मिली।
1837 ई. में ‘जेम्स प्रिंसेप’ ने सर्वप्रथम पढ़ने में सफलता प्राप्त की। इसके उत्कीर्णकर्ता “चापड़ कापड़” थे। अभिलेखों का विषय प्रशासनिक होता था। लेकिन ‘अर्थ’ से संबंधित लेख ‘रूम्मिनदेई अभिलेख’ है, जो कर नीति से संबंधित है। इसमें अशोक ने लुम्बिनी यात्रा के समय भू-राजस्व कर की दर को 1/6 भाग से घटाकर 1/8 कर दिया।
अशोक के समकालीन मिस्र का राजा ‘टॉलमी द्वितीय’ था।
ब्राह्मी लिपि के अभिलेख गुजरात से प्राप्त होते हैं तथा ग्रीक व अरामाइक लिपि के अभिलेख कंधार व काबुल से तथा खरोष्ठी लिपि के अभिलेख शहबाजगढ़ी, मानसेहरा (पाकिस्तान) से प्राप्त होते हैं। कंधार अभिलेख की खोज 1958 में हुई।
अभिलेखों की लिपियाँ-
| लिपि | प्रमुख क्षेत्र (अवस्थिति) | विशेषता |
| ब्राह्मी लिपि | आधुनिक भारत में | यह बाएँ से दाएँ (Left to Right) लिखी जाती थी। अधिकांश शिलालेख इसी लिपि में हैं। |
| खरोष्ठी लिपि | उत्तर-पश्चिम पाकिस्तान में | यह दाएँ से बाएँ (Right to Left) लिखी जाती थी। (जैसे: मानसेहरा और शाहबाजगढ़ी अभिलेख) |
| ग्रीक (यूनानी) लिपि | अफगानिस्तान में | यूनानी समुदायों के लिए प्रयुक्त। |
| अरमाइक लिपि | अफगानिस्तान में | ईरानी/सीरियाई मूल के लोगों के लिए प्रयुक्त। |
अशोक ने सार्वजनिक स्थानों पर राजाज्ञाएँ स्थापित करवाई थीं।
द्विभाषीय अभिलेख वे होते हैं, जिनमें दो लिपियाँ सम्मिलित होती हैं। गांधार से ‘शार-ए-कुना’ अभिलेख प्राप्त हुआ, जो ग्रीक व अरामाइक मिश्रित लिपि में था।
अशोक ने अपने अभिलेखों को तीन भागों में विभाजित किया था।
लेख
| श्रेणी (Category) | उप-श्रेणी (Sub-type) | मुख्य विशेषताएँ |
| 1. शिलालेख (Rock Edicts) | वृहत् शिलालेख | इसमें 14 महत्वपूर्ण आज्ञाओं का समूह है। यह 8 विभिन्न स्थानों से प्राप्त हुए हैं। |
| लघु शिलालेख | ये अशोक के व्यक्तिगत जीवन और बौद्ध धर्म के प्रति झुकाव को दर्शाते हैं। | |
| 2. स्तम्भ लेख (Pillar Edicts) | वृहत् स्तम्भ लेख | इनकी संख्या 7 है, जो 6 अलग-अलग स्तंभों पर उत्कीर्ण हैं। ये केवल ब्राह्मी लिपि में हैं। |
| लघु स्तम्भ लेख | ये राजा की राजकीय घोषणाओं (जैसे संघ में एकता बनाए रखना) से संबंधित हैं। | |
| 3. गुहा लेख (Cave Inscriptions) | गया (बिहार) की ‘बराबर की पहाड़ियों’ में भिक्षुओं के निवास के लिए बनाई गई गुफाओं के लेख। |
अशोक ने 8 स्थानों पर वृहत् शिलालेख लगवाएँ। जिनकी संख्या 14 हैं।
वृहत् शिलालेख
| क्र. सं. | स्थान का नाम | आधुनिक स्थिति (क्षेत्र) | लिपि |
| 1. | शाहबाजगढ़ी | पेशावर, पाकिस्तान | खरोष्ठी |
| 2. | मानसेहरा | हजारा, पाकिस्तान | खरोष्ठी |
| 3. | कालसी | देहरादून, उत्तराखण्ड (भारत) | ब्राह्मी |
| 4. | जूनागढ़ (गिरनार) | जूनागढ़, गुजरात (भारत) | ब्राह्मी |
| 5. | धौली | पुरी, ओडिशा (भारत) | ब्राह्मी |
| 6. | जोगढ़ | गंजाम, ओडिशा (भारत) | ब्राह्मी |
| 7. | सोपारा | ठाणे, महाराष्ट्र (भारत) | ब्राह्मी |
| 8. | एरागुडी (एरिंगुढ़ि) | कर्नूल, आन्ध्र प्रदेश (भारत) | ब्राह्मी |
अशोक के शिलालेख और उनके विषय
| शिलालेख | मुख्य विषय (Content) |
| पहला शिलालेख | पशु वध पर प्रतिबंध: इसमें उत्सवों के समय पशु बलि की निंदा की गई है और राजकीय रसोई में भी पशु वध को सीमित (केवल दो मोर और एक हिरण) करने की बात कही गई है। |
| दूसरा शिलालेख | लोक कल्याण एवं चिकित्सा: इसमें मनुष्य और पशुओं के लिए अलग-अलग चिकित्सालयों के निर्माण का उल्लेख है। साथ ही चोल, पांड्य, सत्यपुत्र और केरलपुत्र जैसे पड़ोसी राज्यों का भी जिक्र है। |
| तीसरा शिलालेख | राजकीय अधिकारियों की नियुक्ति: इसमें ‘युक्त’, ‘राजुक’ और ‘प्रादेशिक’ नामक अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे हर पाँच वर्ष पर राज्य का दौरा करें और धम्म का प्रचार करें। |
| चौथा शिलालेख | धम्म घोष की विजय: इसमें बताया गया है कि अब युद्ध की घोषणा (भेरीघोष) को त्याग कर नैतिकता और धर्म की घोषणा (धम्म घोष) को अपनाया गया है। |
| मुख्य विषय / विवरण | |
| पाँचवाँ शिलालेख | धम्म महामात्रों की नियुक्ति की जानकारी दी गई है। |
| छठा शिलालेख | प्रतिवेदकों (Reporters) को स्पष्ट आदेश और प्रशासनिक सुधारों का उल्लेख। |
| सातवाँ शिलालेख | सभी पंथों के मध्य धार्मिक सहिष्णुता और आत्म-नियंत्रण की अपील। |
| आठवाँ शिलालेख | धम्म यात्राओं का विवरण; आखेट (शिकार) यात्रा के स्थान पर धम्म यात्राओं का प्रतिपादन। |
| नवाँ शिलालेख | ‘मंगलाचरण’ जैसे निरर्थक समारोहों के स्थान पर “धम्म-मंगलाचरण”, सच्ची भेंट और सच्चे शिष्टाचार पर बल। |
| दसवाँ शिलालेख | ख्याति और गौरव की निंदा; आदेश कि राजा व उच्च अधिकारी हमेशा प्रजा के हित में सोचें। |
| ग्यारहवाँ शिलालेख | ‘धम्म दान’ को सबसे श्रेष्ठ दान बताया गया और धम्म की व्याख्या की गई। |
| बारहवाँ शिलालेख | धार्मिक सहिष्णुता की नीति और स्त्री महामात्रों की नियुक्ति का उल्लेख। |
| तेरहवाँ शिलालेख | कलिंग युद्ध का वर्णन, अशोक का हृदय परिवर्तन और 5 यूनानी राजाओं के यहाँ धम्म प्रचारक भेजने का विवरण। |
| चौदहवाँ शिलालेख | पूर्व के अभिलेखों का पुनरावलोकन और जनता को धार्मिक जीवन बिताने हेतु प्रेरणा। |
अशोक ने 11वें, 12वें तथा 13वें शिलालेख में बदलाव किया है, इसे “पृथक कलिंग प्रज्ञापन” कहा जाता है।
अशोक के लघु शिलालेख 18 विभिन्न स्थानों से प्राप्त होते हैं, जिनकी संख्या निश्चित नहीं है। जिसमें सबसे नवीनतम लघु शिलालेख “सन्नाति” (कर्नाटक) का है। मास्की, गुर्जरा, नेत्तूर व उदयगोलम् लेख में अशोक का नाम ‘अशोक’ मिलता है।
भाबू शिलालेख जो कोटपुतली-बहरोड़ के बैराठ (विराटनगर) में, बीजक की पहाड़ी में भीम डूंगरी पर स्थित है। जिसकी खोज 1837 ई. में कैप्टन बर्ट ने की। जिसमें अशोक का नाम ‘मगधाधिराज’ लिखा हुआ मिलता है।
भानू शिलालेख (बैराठ-राजस्थान) में अशोक के बौद्ध होने का सबल प्रमाण मिलता है। जिसमें अशोक स्पष्ट बुद्ध, धम्म और संघ का अभिवादन करता है। जिन्हें बौद्ध धर्म के ‘त्रिरत्न’ कहा गया है।
भाबू शिलालेख में ही अशोक स्वयं को “मगधराज” या “मगध का राजा” बताता है। भारत में सर्वप्रथम शिलालेख का प्रचलन अशोक ने किया।
मास्की शिलालेख में अशोक ने स्वयं को बुद्ध शाक्य कहा, जिसकी खोज 1915 ई. में ‘वीडेन’ ने की।
अशोक स्तम्भ लेखों में वृहत् स्तम्भ लेख हमें 6 स्थानों से 7 लेख मिले यानी इनकी संख्या (6) हैं पर (7) लेख मिलते हैं।
दिल्ली टोपरा स्तम्भ लेख मूलरूप से यह हरियाणा के अम्बाला जिले में था। फिरोजशाह तुगलक द्वारा इसे दिल्ली लाया गया। यह एकमात्र अभिलेख है जिसमें अशोक के 7 लेख उत्कीर्ण हैं।
दिल्ली- मेरठ स्तम्भ लेख मूलरूप से यह मेरठ में था, फिरोजशाह तुगलक ने इसे दिल्ली में “शिकार-ए-कुश” महल में रखवाया।
लौरिया नन्दनगढ़ अभिलेख (बिहार) तथा लौरिया अरेराज अभिलेख (चम्पारन, बिहार) महत्वपूर्ण हैं।
रामपुरवा अभिलेख (बिहार) भी उल्लेखनीय है।
जौगड़ शिलालेख (उड़ीसा) की खोज 1850 ई. में वाल्टर इलियट ने की थी।
प्रयाग-प्रशस्ति अभिलेख मूलरूप से कौशाम्बी में था जिसे अकबर ने इलाहाबाद के किले में स्थापित करवाया। इसमें “रानी का लेख” (कारूवाकी), समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति, तथा अकबर व बीरबल के लेख भी उत्कीर्ण हैं।
अशोक के शिलालेख मध्यप्रदेश में रूपनाथ व गुर्जरा, कर्नाटक में गोविमठ, ब्रह्मगिरी, सिद्धपुर, जेटिग्रामेश्वर, कनगनहल्ली, पालकिगुण्डु, बिहार में सासाराम, उत्तरप्रदेश में अहरौरा में मिले हैं। निगाली सागर, जौगड़ व रामपुरवा शिलालेख भी अशोक से संबंधित हैं।
अशोक के लघु स्तम्भ लेखों में राजकीय घोषणाएँ मिलती हैं।
अशोक स्तम्भ साँची में तथा धमेख स्तूप सारनाथ में स्थित है। साँची (म.प्र.) व सारनाथ (उ.प्र.) के लेखों में सम्प्रदाय-भेद रोकने के आदेश दिए गए हैं।
निगाली सागर अभिलेख में अशोक ने अपने राज्याभिषेक के 14वें वर्ष में “कनक मुनि” के स्तूप का जीर्णोद्धार करवाया।
लुम्बिनी ग्राम का धार्मिक कर (वलि) माफ कर दिया गया।
वास्तुकला के इतिहास में अशोक ने नई शैली विकसित की। गुफा लेख धार्मिक सहिष्णुता का परिचायक हैं।
बराबर की पहाड़ियों में अशोक ने कर्ण गुफा, सुदामा गुफा, चोपार गुफा तथा विश्व झोपड़ी गुफा का निर्माण करवाया, जिन्हें आजीवक सम्प्रदाय को दान में दिया गया।
अशोक के पौत्र दशरथ ने नागार्जुन पहाड़ी पर गुफाओं का निर्माण करवाया तथा लोमस ऋषि गुफा भी बनवाई।
बौद्ध परम्पराओं के अनुसार अशोक ने 84000 स्तूपों का निर्माण करवाया। महात्मा बुद्ध की मृत्यु के बाद 9 स्तूप बनाए गए, जिनमें 8 में शारीरिक अवशेष और 9वें में पात्र रखा गया।
अहरौरा लेख में घोषणा की गई कि अशोक व्यक्तिगत रूप से बौद्ध धर्म का अनुयायी था। अर्थशास्त्र में 18 तीर्थों का वर्णन किया गया है।
| क्रम | तीर्थ (अधिकारी) | संबंधित विभाग / कार्य |
| 1 | मंत्री एवं पुरोहित | प्रधानमंत्री और प्रमुख धर्माधिकारी (राजा के मुख्य सलाहकार)। |
| 2 | सेनापति | सैन्य विभाग का प्रधान मंत्री। |
| 3 | युवराज | राजा का उत्तराधिकारी (राजकुमार)। |
| 4 | प्रशास्ता | राजकीय कागजातों को सुरक्षित रखने वाला तथा राजा की आज्ञाओं को लिपिबद्ध करने वाला लिपिक प्रमुख। |
| 5 | समाहर्ता | राजस्व विभाग का प्रधान (कर संग्रहकर्ता और बजट तैयार करने वाला)। |
| 6 | सन्निधाता | राजकीय कोषाध्यक्ष (राजकीय कोष और भंडार गृह का संरक्षक)। |
| 7 | प्रदेष्ट्रि | फौजदारी न्यायालय का न्यायाधीश (कमीश्नर)। |
| 8 | नायक | सेना का संचालक अथवा नगर रक्षा का अध्यक्ष। |
| 9 | व्यावहारिक | नगर का प्रमुख न्यायाधीश (दीवानी न्यायालय)। |
| 10 | दण्डपाल | सेना की रसद एवं सामग्री जुटाने वाला मुख्य अधिकारी (पुलिस/सैन्य अधिकारी)। |
| 11 | कर्मान्तिक | देश के उद्योगों एवं कारखानों का अध्यक्ष। |
| 12 | अन्तपाल | सीमावर्ती दुर्गों का रक्षक। |
| 13 | दुर्गपाल | देश के भीतर के राजकीय दुर्गों का अध्यक्ष। |
| 14 | नागरक (पौर) | नगर का प्रमुख अधिकारी या नगर कोतवाल। |
| 15 | दौवारिक | राजमहलों की देखरेख और द्वार रक्षा करने वाला प्रधान अधिकारी। |
| 16 | आटविक | वन विभाग का प्रधान। |
| 17 | अंतर्वेदिक | सम्राट के अंतःपुर (निवास स्थान) का अध्यक्ष। |
| 18 | मंत्रीपरिषदाध्यक्ष | मंत्रिपरिषद का अध्यक्ष। |
मंत्रिपरिषद के नीचे द्वितीय श्रेणी के अधिकारी थे जिन्हें अध्यक्ष कहा जाता था। अर्थशास्त्र में 26 अध्यक्षों का उल्लेख है। अर्थशास्त्र में प्रमुख चार व्यापारिक राजमार्गों का भी वर्णन है। कौटिल्य बताते हैं कि उत्तरापथ की अपेक्षा दक्षिणापथ अधिक महत्वपूर्ण थे। अशोक के समय प्रान्तों की संख्या को 4 से बढ़ाकर 5 कर दिया गया था।
प्रान्तों का शासन राजवंशीय “कुमार” या “आर्यपुत्र” नामक पदाधिकारियों द्वारा होता था।
| क्रम | मौर्य प्रांत (चक्र) | राजधानी | वर्तमान क्षेत्र |
| 1. | उत्तरापथ | तक्षशिला | उत्तर-पश्चिमी भारत और पाकिस्तान का क्षेत्र। |
| 2. | दक्षिणापथ | सुवर्णगिरी | दक्षिण भारत का क्षेत्र (आंध्र प्रदेश/कर्नाटक)। |
| 3. | अवन्तिराष्ट्र | उज्जयिनी | उज्जैन (मध्य प्रदेश) और पश्चिमी भारत। |
| 4. | कलिंग | तोसली | वर्तमान ओडिशा का क्षेत्र। |
| 5. | प्राची (मध्य प्रदेश/देश) | पाटलिपुत्र | साम्राज्य का केंद्र (बिहार और उत्तर प्रदेश का भाग)। |
प्रांतों को चक्र कहा जाता था। प्रांतों का विभाजन विषय में किया गया था, जो विषयपति के अधीन होते थे।
जिले का प्रशासनिक अधिकारी (शासक) स्थानिक था, जो समाहर्ता के अधीन होता था।
मेगस्थनीज के अनुसार नगर का प्रशासन 30 सदस्यों का एक मण्डल करता था, जो 6 समितियों में विभाजित था। प्रत्येक समिति में 5 सदस्य होते थे।
नगरीय प्रशासनिक समितियाँ एवं उनके कार्य
| समिति | मुख्य कार्य |
| प्रथम समिति | औद्योगिक कलाओं का निरीक्षण: उद्योगों और शिल्पकारों के कार्यों की देखरेख करना। |
| द्वितीय समिति | विदेशियों की देखरेख: विदेशियों के रहने, भोजन और स्वास्थ्य का प्रबंध करना। |
| तृतीय समिति | जन्म-मरण का लेखा-जोखा: जनसंख्या का हिसाब रखने के लिए जन्म और मृत्यु का पंजीकरण करना। |
| चतुर्थ समिति | व्यापार एवं वाणिज्य: व्यापारिक नियमों, बाट और माप (Weights and Measures) का नियंत्रण। |
| पंचम समिति | निर्मित वस्तुओं का निरीक्षण: मिलावट रोकना और पुरानी व नई वस्तुओं के विक्रय का प्रबंधन। |
| छठी समिति | बिक्री कर (Sales Tax) वसूलना: बेची गई वस्तुओं के मूल्य का 10वां भाग कर के रूप में लेना। |
विक्रय कर के रूप में मूल्य का 10वाँ भाग वसूला जाता था।
एग्रोनोमाई मेगस्थनीज के अनुसार मार्ग निर्माण अधिकारी था।
सैन्य व्यवस्था में मेगस्थनीज के अनुसार सैन्य विभाग 6 समितियों में विभक्त था और प्रत्येक समिति में 5 सदस्य होते थे।
सैनिक प्रबन्धन की देख-रेख करने वाला अधिकारी ‘अन्तपाल’ कहलाता था।
सैन्य विभाग का सबसे बड़ा अधिकारी सेनापति होता था। प्लिनी नामक यूनानी लेखक के अनुसार चन्द्रगुप्त की सेना में 600000 पैदल सिपाही, 30000 घुड़सवार और 9000 हाथी थे।
मुद्रा विभाग का अधिकारी — लक्षणाध्यक्ष,
कृषि विभाग का अधिकारी — सीताध्यक्ष,
व्यापारिक कर विभाग का अधिकारी — शल्काध्यक्ष,
खान विभाग का अध्यक्ष — अकाराध्यक्ष,
व्यापारिक मार्ग विभाग का अधिकारी — संस्थाध्यक्ष,
पासपोर्ट विभाग का अध्यक्ष — मुद्राध्यक्ष कहलाते थे।
सैन्य समितियाँ एवं उनके कार्य
| समिति | मुख्य कार्य |
| प्रथम समिति | नौसेना (जल सेना) का प्रबंध: जल मार्गों और नौसैनिक शक्ति का निरीक्षण। |
| द्वितीय समिति | यातायात एवं रसद सामग्री: सेना के लिए भोजन, अस्त्र-शस्त्र और परिवहन (Logistics) की व्यवस्था। |
| तृतीय समिति | पैदल सेना का निरीक्षण: पैदल सैनिकों (Infantry) का प्रशिक्षण और उनकी देखरेख। |
| चतुर्थ समिति | अश्व-सेना का निरीक्षण: घुड़सवार सेना का प्रबंधन और घोड़ों की गुणवत्ता की जांच। |
| पंचम समिति | गज सेना का निरीक्षण: हाथी सेना (War Elephants) का प्रबंधन और युद्ध अभ्यास। |
| षष्ठ (छठी) समिति | रथ सेना का निरीक्षण: युद्ध रथों की तैयारी और रथारोहियों का नियंत्रण। |
मेगस्थनीज ने भारतीय समाज को 7 वर्गों में विभाजित किया है:
(1) दार्शनिक
(2) व्यापारी
(3) किसान
(4) कारीगर / चरवाह
(5) सैनिक
(6) मंत्री व परामर्शदाता
(7) गुप्तचर
अर्थशास्त्र में गुप्तचर को ‘गूढ पुरुष’ कहा गया है।
एक ही स्थान पर रहकर कार्य करने वाले गुप्तचर को ‘संस्था’ कहा जाता था तथा एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमण करके कार्य करने वाले गुप्तचर को ‘संचार’ कहा जाता था।
मौर्य शासन में पुरुषों के साथ महिला अंगरक्षक भी होती थी।
अर्थशास्त्र में भूमि छिद्र न्याय का वर्णन किया गया है। सरकारी भूमि को सीता भूमि कहा जाता था। बिना वर्षा के अच्छी खेती होने वाली भूमि को अदेवमातृक कहा जाता था। सीताध्यक्ष कृषि के अधिकारी थे। एरियन ने गुप्तचरों को ‘ओवरसियर’ तथा स्ट्रैबो ने ‘इंस्पेक्टर’ कहा है।
गुप्तचर विभाग एक पृथक अमात्य के अधीन रखा गया, जिसे ‘महामात्यसर्प’ कहा गया।
समाज में वैश्यावृत्ति प्रचलित थी तथा इसे राजकीय संरक्षण भी प्राप्त था। स्वतंत्र रूप से वैश्यावृत्ति करने वाली स्त्रियाँ “रूपाजीवा” कहलाती थी। इनके कार्यों का निरीक्षण ‘गणिकाध्यक्ष’ करता था।
सभ्रान्त घर की स्त्रियाँ प्रायः घर के अंदर ही रहती थी। कौटिल्य ने ऐसी स्त्रियों को “अनिष्कासिनी” कहा है।
मौर्य शासन 137 वर्षों तक रहा। भागवत् पुराण के अनुसार मौर्य वंश में 10 राजा हुए, जबकि वायु पुराण के अनुसार 9 राजा हुए। मौर्यकालीन अर्थव्यवस्था में दासों का महत्वपूर्ण योगदान था, जबकि मेगस्थनीज के अनुसार मौर्य काल में दास प्रथा नहीं थी।
मौर्य शासन में दो प्रकार की न्यायिक व्यवस्था थी —
(1) धर्मस्थीय व्यवस्था
(2) कंटक शोधन न्यायालय
राजुक को क्षेत्रीय न्यायाधीश या गणराज्य न्यायाधीश कहा जाता था।
मौर्य वंश का अंतिम शासक बृहद्रथ था। इसकी हत्या इसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने 185 ई.पू. में कर दी और मगध पर शुंग वंश की नींव डाली।