मगध राज्य के उत्कर्ष में मुख्यतः तीन वंशों का योगदान रहा—
- हर्यक वंश
- शिशुनाग वंश
- नंद वंश
यह मगध का सबसे प्राचीन वंश था। इसके संस्थापक बृहद्रथ थे और जरासंध बृहद्रथ का पुत्र था। इसकी प्रारम्भिक राजधानी गिरिव्रज (राजगृह) थी। मगध राज्य के आरम्भिक इतिहास की जानकारी महाभारत से मिलती है।
हर्यक वंश (544 ई.पू.–412 ई.पू.)
बिम्बिसार (544 ई.पू.–492 ई.पू.) – बिम्बिसार ने हर्यक वंश की स्थापना की। वह 544 ई.पू. में मगध की गद्दी पर बैठा। इसे श्रेणिक के नाम से भी जाना जाता है। वह बौद्ध धर्म का अनुयायी था और गौतम बुद्ध का समकालीन था। इसने राजगृह को अपनी राजधानी बनाया। इस नगर का योजनाकार महागोविन्द था। यह प्रथम साम्राज्यवादी शासक था।
इसने अंग के नरेश बहादत्त को हराकर अपने पुत्र अजातशत्रु को वहाँ गवर्नर नियुक्त किया। इसने कोसल नरेश प्रसेनजित की बहन कौशलादेवी से विवाह किया। लिच्छवि राजकुमारी चेल्लना से भी विवाह किया, जिससे अजातशत्रु उत्पन्न हुआ।
प्रसेनजित ने बिम्बिसार को काशी दहेज में दिया। इसने मद्रदेश की राजकुमारी खेमा से विवाह किया। अपने चिकित्सक जीवक को अवन्ति के शासक प्रद्योत (जो पाण्डु रोग से पीड़ित था) की चिकित्सा हेतु भेजा। जीवक की शिक्षा तक्षशिला में हुई थी।
492 ई.पू. में उसके पुत्र अजातशत्रु ने उसकी हत्या कर दी।
अजातशत्रु (492 ई.पू.–460 ई.पू.) – इसका उपनाम कुणिक था तथा इसे पितृहन्ता भी कहा जाता है। इसने काशी पर अधिकार कर लिया। अपने पिता की हत्या देवदत्त के कहने पर की।
इसके मंत्री वस्सकार ने वज्जि संघ में फूट डाल दी। अजातशत्रु ने वज्जि संघ को जीत लिया तथा इस युद्ध में रथमूसल एवं महाशिलाकंटक का प्रयोग किया। लिच्छवि गणराज्य को मगध में मिला लिया।
इसने प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन राजगृह में करवाया। 461 ई.पू. में उसके पुत्र उदायिन ने उसकी हत्या कर दी।
उदायिन (461 ई.पू.–444 ई.पू.) – यह जैन धर्म का अनुयायी था। इसने गंगा और सोन नदी के संगम पर पाटलिपुत्र नगर बसाया और राजधानी बनाया।
नोट – हर्यक वंश का अंतिम शासक नागदशक था।
शिशुनाग वंश (412 ई.पू.–344 ई.पू.)
शिशुनाग ने 412 ई.पू. में इस वंश की स्थापना की। इसने अवन्ति (उज्जयिनी) को जीत लिया। वैशाली को जीतकर राजधानी बनाया।
कालाशोक शिशुनाग वंश का परवर्ती शासक था। इसने पाटलिपुत्र को पुनः राजधानी बनाया तथा द्वितीय बौद्ध संगीति का आयोजन करवाया।
नोट – शिशुनाग वंश का अंतिम शासक नंदिवर्धन था।
नंद वंश (344 ई.पू.–322 ई.पू.)
महापद्मनंद – नंद वंश का संस्थापक था। इसे नाई जाति का माना जाता है। यह जैन धर्म का अनुयायी था। इसका दूसरा नाम भार्गव था।
खारवेल के हाथीगुम्फा अभिलेख के अनुसार इसने कलिंग पर आक्रमण किया और वहाँ नहरों का निर्माण करवाया तथा “जिनसेन की मूर्ति” लेकर आया।
अष्टाध्यायी के लेखक पाणिनी इसके समकालीन थे।
घनानंद नंद वंश का अंतिम शासक था। यह सिकंदर का समकालीन था। यूनानी लेखकों ने इसे अग्रमीज या जैन्ड्रमीज कहा है। इसने जनता पर अत्यधिक कर लगाए और अपने दरबार में चाणक्य का अपमान किया।
नंद वंश का विनाश चाणक्य और चन्द्रगुप्त मौर्य ने मिलकर किया तथा घनानंद की हत्या कर दी। इसके बाद मौर्य वंश की स्थापना चन्द्रगुप्त मौर्य ने की।