पारसी धर्म

पारसी धर्म के संस्थापक जरथुस्त्र (जरयुस्त्र) थे। इनका जन्म प्राचीन ईरान में लगभग 1700 ई.पू. में हुआ। इनकी माता का नाम दुधघोवा तथा पिता का नाम पौरूषहस्प था। इस्लाम के आगमन से पूर्व प्राचीन ईरान में जरथुस्त्र धर्म (पारसी धर्म) प्रचलित था।

पारसी धर्म का धार्मिक ग्रंथ ‘जेन्द्रा अवेस्ता (अवेस्ता)‘ है, जो अवेस्ता भाषा में रचित है। इनका पवित्र चिन्ह पवित्र कुर्ती (सुद्रेह) और पवित्र धागा (कुस्ती) है। इसके अनुयायी एक ईश्वर ‘अहुर मज्दा’ को मानते हैं।

इनके धर्मस्थल को ‘अग्नि मंदिर‘ कहा जाता है। इसके अन्य नाम ‘आतिश बेहराम‘ या ‘दर-ए-मेहर‘ हैं। इस धर्म में अग्नि पूजा का विशेष महत्व है, इसलिए इसके अनुयायियों को ‘अग्नि-पूजक‘ कहा जाता है।

नोटअकबर ने फारसी संत दस्तूर मेहर राणा से प्रभावित होकर 24 घंटे दरबार में अग्नि प्रज्वलित रखने का आदेश दिया था।

इनके ग्रंथ की मूल शिक्षा का सूत्र है— सद्विचार, सद्वचन, सद्‌कार्य

फारसी त्योहारनवरोज (नववर्ष) तथा खारदोद साल (जन्मोत्सव)।

पारसी धर्म विश्व के प्राचीन धर्मों में से एक है। इसे जरथुस्त्र धर्म (Zoroastrianism) भी कहा जाता है। यह धर्म प्राचीन ईरान (फारस) में शुरू हुआ था।

🔹 संस्थापक

पारसी धर्म के संस्थापक Zoroaster (जरथुस्त्र) थे।

🔹 पवित्र ग्रंथ

इस धर्म का पवित्र ग्रंथ अवेस्ता (Avesta) है।

🔹 मुख्य शिक्षाएँ

  • अहुरा मज़्दा (Ahura Mazda) एक सर्वोच्च ईश्वर हैं।

  • सत्य और धर्म का पालन करना।

  • अच्छे विचार, अच्छे शब्द और अच्छे कर्म (Good Thoughts, Good Words, Good Deeds)।

🔹 उपासना स्थल

पारसी लोग अग्नि मंदिर (Fire Temple) में पूजा करते हैं। आग को पवित्र माना जाता है।

🔹 विशेष बातें

  • पार

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