विषय प्रवेश : भारत के दलितों, शोषितों, और अछूतों को बराबरी का हक दिलाने के लिए डॉ. भीमराव अम्बेदकर चिरस्मरणीय हैं।
जन्म एवं शिक्षा : डॉ. अम्बेदकर का जन्म 14 जुलाई, 1891 ई. को महाराष्ट्र के रत्नगिरि जिले के अंबावदे गाँव में हुआ। इसीलिए वे अम्बेदकर कहलाए। वे श्री रामजी सकपाल और भीमबाई की चौदहवीं संतान थे। इनके बचपन का नाम भीम सकपाल था। भीमराव सकपाल ने सन् 1907 ई. में मैट्रिक परीक्षा पास की। सन् 1912 ई. में बी. ए. करने के पश्चात् बड़ौदा महाराज की छात्रवृत्ति से अमेरिका एम. ए. की पढ़ाई करने चले गये। कोलम्बिया यूनिवर्सिटी से सन् 1916 ई. में इन्होंने पी-एच. डी. करने के बाद लंदन आ गए।
समाज-उत्थान के कार्य :विदेशों में रहकर इन्होंने अपने अध्ययन और शोध-कार्य के अलावा वहाँ की संस्कृति, रीति-रिवाज और प्रगति को अच्छी तरह देखा-परखा। उनकी इच्छा हुई कि यहाँ की अच्छाइयों का समावेश हिन्दू-समाज में किया जाये, किन्तु यहाँ आने पर भारतीय समाज का बहुत कटु अनुभव उन्हें हुआ। सन् 1927 ई. में इन्होंने मराठी भाषा में अपनी पत्रिका निकाली जिसका नाम था ‘बहिष्कृत समाज’। इसके द्वारा इन्होंने सड़ी-गली परम्पराओं पर प्रहार के लिए कार्य शुरू किया। अपने इन क्रान्तिकारी विचारों के कारण वे भारत की दलित और शोषित जनता के मसीहा बन गये। डॉ. अम्बेदकर के तकों से प्रभावित होकर ब्रितानी सरकार ने अनेक कानून बनाये और परिवर्तन की शुरुआत हुई।
संविधान निर्माण में भूमिका: सन् 1947 ई. में 15 अगस्त को जब भारत स्वतंत्र हुआ तो ये कानून मंत्री बने। इसी वर्ष भारतीय संविधान का प्रारूप तैयार करने के लिए जो समिति बनी उसके अध्यक्ष डॉ. अम्बेदकर को ही बनाये गये। इन्होंने अपने गहन अध्ययन-चिंतन एवं परामर्श से संविधान का प्रारूप तैयार किया। इनके ही प्रयत्न और साहस से संविधान सभा ने घोषणा की-“छुआछूत को तद्नुरूप कोई भावना पायी गयी तो उसे कानूनन अपराध माना जाएगा।” दलितों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गयी। हिन्दू कोड बिल के मसले पर पं. नेहरू से मतभेद होने के कारण डॉ. अम्बेदकर ने 1951 ई. में केन्द्रीय मंत्रिमण्डल से इस्तीफा दे दिया। सन् 1956 ई० में इन्होंने अपने पाँच लाख अनुयायियों सहित अंततः बौद्ध धर्म अपना लिया। 6 दिसम्बर, 1956 ई० को प्रातः यह तेजस्वी महापुरुष चिरनिद्रा में सो गया।
उपसंहार : आज अम्बेदकर हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन भारत के संविधान-निर्माता और दलितों के अधिकार और सम्मान-रक्षक के रूप में वे सदा याद किए जायेंगे।