बिना परिश्रम के कोई उन्नति नहीं करता।
भूमिका : परिश्रम ही सफलता की कुञ्जी है। बिना परिश्रम के कुछ भी प्राप्त करना सम्भव नहीं, इसलिए श्रम करना प्रत्येक का कर्तव्य है। इतिहास इसका साक्षी है कि जिन्होंने परिश्रम का महत्त्व नहीं समझा उनका पतन निश्चित रूप से हुआ।
श्रम का अर्थ: सृष्टि के सारे जीव परिश्रम के सहारे ही जीते हैं। चींटी से लेकर ज्ञानपुंज-मानव तक अपना जीवन-यापन परिश्रम से ही करते हैं। अतएव परिश्रम का संबल पकड़े रहना सबका धर्म है। किन्तु इस बात का सदा ध्यान रखना चाहिए कि परिश्रम वही है जिससे निर्माण होता है, रचना होती है। नदी किनारे बैठ कर पानी पीटना भी परिश्रम है लेकिन उससे कोई निर्माण नहीं होता, अतः वह परिश्रम की कोटि में नहीं आता।
उन्नति का केन्द्र-बिन्दु: परिश्रम मानव का मुख्य केन्द्र बिन्दु है। परिश्रम करने वाला ही जीवन संग्राम में सफल होता है, जो छात्र परिश्रम नहीं करता, परीक्षा में असफल होता है। इसी प्रकार, किसान के परिश्रम पर देश का विकास निर्भर करता है तो श्रमिक के श्रम पर उद्योग। कोई भी देश विना परिश्रम किए सम्पन्न राष्ट्र कभी भी नहीं कहला सकता। जापान श्रम के फलस्वरूप ही विश्व में उत्तम स्थान रखता है। इसीलिए गाँधी, बिनोवा भावे, जवाहर लाल नेहरू ने देशवासियों को परिश्रम करने का सन्देश दिया। अब्राहम लिंकन, वाशिंगटन, अम्बेदकर, लाल बहादुर शास्त्री आदि परिश्रम के कारण ही यशस्वी पुरुष कहलाये। क्योंकि-
‘श्रमेण लभते विद्या, श्रमेण लभते धनम्।
श्रमेण लभते ज्ञानम्, श्रमेण लभते यशम्।’
परिश्रम के लाभ : कुछ लोग परिश्रम की अपेक्षा भाग्य को महत्त्व देते हैं। कहते हैं- भाग्य में जो लिखा होता है, वही होता है। किन्तु बिना हाथ हिलाए भोजन भी तो मुँह में नहीं जाता। अतः केवल भाग्य के सहारे बैठना ठीक नहीं है। कहते हैं- परिश्रमी पुरुष अपना भाग्य पलट देते हैं।
उपसंहार : अतः हर व्यक्ति को श्रम करना चाहिए क्योंकि श्रमजीवी ही ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ तथा देशप्रेमी होते हैं। परिश्रमी का स्वास्थ्य भी ठीक रहता है। किन्तु अकर्मण्य अथवा कामचोर, बेईमान, निष्ठुर तथा देशद्रोही होते हैं। ऐसे व्यक्ति देश, जाति की हानि के सिवाय और कुछ नहीं करते। सिर्फ श्रमी या परिश्रमी ही इतिहास के पन्नों पर अपना नाम अमर रखते हैं।