एक कवि ने कहा है-
“जो भरा नहीं भावों से, जिसमें बहती रसधार नहीं,
हृदय नहीं वह पत्थर है. जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।”
भूमिका: समाजसेवा, देशसेवा, देशभक्ति, देशप्रेम मनुष्य की नैसर्गिक प्रवृत्ति है। पक्षियों को अपने घोंसले से प्यार होता है. पानी के बिना मछली तो मनुष्य हैं। जिस धरती पर सरक-सरक कर हम खडे हुए हैं. जिसका नहीं जी सकती, पेड़-पौधे भी अपनी खास मिट्टी में ही उपजते हैं। फिर हम अन्न-जल ग्रहण किया है. जिसकी हवा में माँस लिया है. उससे प्रेम कैसे नहीं होगा?
नैसर्गिक प्रवृत्ति देशभक्ति या समाज-सेवा का अर्थ है देशवासियों की निःस्वार्थ सेवा। मुल्क के गरीबों की गरीबी, भुखमरी दूर करने का प्रयत्न, अंधविश्वास और रूढियों से निकालने की कोशिश, देश से भ्रष्टाचार, बेरोजगारी भगाने की चेष्टा और सताए हुए लोगों को ऊपर उठाने का कार्य अपने देश के सीमाओं की रक्षा और निष्ठापूर्वक कर्तव्य पालन देशभक्ति है। प्रतीक्षा की जरूरत नहीं है। देश में अगर कहीं भी अत्याचार हो रहा है, तो इसे दूर करने का प्रयत्न या इसके विरुद्ध आवाज उठाना भी देशभक्ति ही है।
स्वरूप : देशभक्ति या समाज-सेवा का भाव जिसमें होता है, वह देश के लिए हँसते-हँसते अपने को न्योछावर कर देता है और लोगों के मन-मंदिर में प्रतिष्ठित हो जाता है। महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, गुरुगोविन्द सिंह, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, भगत सिंह और गाँधी इसी कारण मरकर भी अमर हैं। किसी देश का इतिहास उसके देशभक्तों का ही इतिहास होता है। जहाँ कहीं देशभक्त होते हैं, वहाँ खुशहाली-ही-खुशहाली होती है। जिस देश में देशभक्त या समाज-सेवी नहीं होते हैं, वहाँ गरीबी और शोषण का नंगा नाच देखने को मिलता है।
उपसंहार : देशभक्त या समाज-सेवी अपने इसी गुण के कारण देवताओं की कोटि में आता है, जिसके चरणों पर अपना मस्तक रखना लोग सौभाग्य समझते हैं। कहा गया है-
“मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर देना तुम फेंक
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ पर जावें वीर अनेक।”