भूमिका: जनसंख्या की समस्या आज देश के सामने सुरसा की भाँति अपना मुँह बाये इसकी आबादी खड़ी है। विकास को इसने सर्वाधिक प्रभावित किया है। आजादी के समय कुल आबादी मात्र तीस करोड़ थी। लेकिन आज देश की जनसंख्या एक सौ दस करोड़ से ऊपर हो गई है। यह आबादी प्रतिमाह दस लाख की दर से बढ़ रही है।
आबादी की शक्ति, बढ़ने के कारण, परिणाम: वस्तुतः आबादी बढ़ने के कारण हैं- संतान के प्रति लोगों का अत्यधिक मोह, गरीबी और अंधविश्वास। अशिक्षा के कारण परिवार नियोजन का संदेश लोगों के गले के नीचे नहीं उतरता। बाल-विवाह और बहु विवाह से भी आबादी बढ़ी है। अन्य कारण हैं, स्वास्थ्य सेवाओं में वृद्धि के कारण मृत्यु दर में कमी। यही कारण है कि आज देश की प्रगति पर प्रश्न चिह्न लगा हुआ है। जितने लोगों के लिए योजना बनती है, योजना पूरी होते-होते, लोगों की आबादी उससे अधिक हो जाती। वस्तुतः जनसंख्या गुणात्मक रूप से बढ़ती है और उत्पादन धनात्मक रूप से। नतीजा है कि अभाव बना का बना रहता है। अगर इसे रोका नहीं गया तो देशवासियों को न खाना मिलेगा, न सोने को जमीन और देश में भयंकर मार-काट मच जाएगी।
एक कवि ने ठीक ही कहा है-
यदि यही रहा क्रम बच्चों के उत्पादन का
, तो कुछ सवाल आगे आएँगे बड़े-बड़े।
सोने को किंचित जगह धरा पर नहीं मिले,
मजबूरन हम तुम सब सोएँगे खड़े-खड़े ॥
बादी बढ़ने से बेरोजगारी एवं महँगाई बढ़ी है। फलस्वरूप पूरे मुल्क में अराजकता और अशांति बढ़ी है। नक्सलवाद आदि आन्दोलन आबादी वृद्धि के कारणों में है। आबादी बढ़ने से हर आदमी बेहद आर्थिक दबाव में पड़ गया है। चीजें कम हैं, उपभोक्ता ज्यादा। नतीजा है कि कालाबाजारियों की चाँदी और गरीबों की मौत। जीवन-स्तर पहले से गिर गया है।
उपसंहार : इस समस्या को देश के सभी लोगों को गंभीरता से लेना होगा। परिवार-कल्याण के कार्यक्रम को तेजी से लागू करना होगा और परिवार को सीमित रखने के फायदे लोगों को बताने होंगे।