Bihar Board Class 10 Hindi Essay Collection | 20 महत्वपूर्ण निबंध

                                मेरे प्रिय साहित्यकार प्रेमचन्द/मेरा प्रिय लेखक

भूमिका : लिखते तो बहुत लोग हैं लेकिन बहुत कम लोग होते हैं जिनकी रचनाएँ जन-जन के मन-मन में बसती हैं। प्रेमचन्द ऐसे ही कथाकार हैं जिन्होंने अपनी रचनाओं से भारत के लोग के अन्तर को छुआ है। यही कारण है कि वे मेरे ही नहीं लाखों लोगों के प्रिय उपन्यासकार और कथाकार हैं।

प्रेमचन्द का जन्म और जीवन-वृत्त: मुंशी प्रेमचन्द का जन्म सन् 1880 ई० में वाराणसी के निकट ‘लमही’ गाँव में एक साधारण परिवार में हुआ। नाम पड़ा धनपत राय। माता नहीं रही तो विमाता आई और धनपत उनकी आँख की किरकिरी बन गए। आपकी शिक्षा-दीक्षा मुश्किल से हुई। लेकिन इनकी पढ़ने में रुचि थी। उर्दू के नामी लेखकों के फसाने पढ़े। साहित्य में रस आने लगा। किसी प्रकार मैट्रिक किया और जीवन-समर में उतर गये। बाद में बी.ए. किया और स्कूल इंस्पेक्टर भी बन गये।

नाम परिवर्तन : लेकिन श्री राय नौकरी के लिए नहीं जन्मे थे। उन्हें तो उपन्यास-सम्राट बनना था। उर्दू में ‘जमाना’ नामक पत्रिका में लिखने लगे। लोगों ने हाथों-हाथ लिया। परन्तु कहानी-संकलन ‘सोजेवतन’ सरकार द्वारा जब्त होने के बाद हिन्दी में ‘प्रेमचन्द’ के नाम से लिखना शुरू किया और एक बार जो शुरू हुए तो अपनी कहानियों और उपन्यासों की झड़ी लगा दी। प्रेमचन्द के उपन्यास हैं- प्रेमाश्रम, निर्मला, रंगभूमि, कर्मभूमि, गोदान, सेवासदन, कायाकल्प और गबन। इन्होंने लगभग 300 कहानियाँ भी लिखीं जो ‘मान-सरोवर’ के आठ भागों में संकलित है। सद्गति, मंत्र, कफन, पूस की रात आदि अमर कहानियाँ हैं।

रचनाएँ एवं महत्त्व : प्रेमचन्द के उपन्यास भारतीय मध्य वर्ग और किसानों के जीवन और मरण की दास्तान हैं। ‘गबन’ में यदि स्त्रियों के आभूषण की प्रेमजनित विभीषिका और शहरी जीवन के चित्र हैं तो रंगभूमि में शहर और गाँव दोनों की कथा और किसानों के संघर्ष के भी। ‘निर्मला’ में दहेज की बलिवेदी पर चढ़ी जवान विधवा है जो लांछना और प्रताड़ना सह रही है। ‘सेवासदन’ में भी यह बात उभर कर आई है। ‘गवन’ लालसा का दुष्परिणाम है। ‘गोदान’ भारतीय कृषक जीवन की अमर-गाथा है। उसका सुख-दुःख, समाज सब-कुछ आईने की तरह उसमें झलकता है। ‘होरी’ उसका रूप है।

                 प्रेमचन्द में गोर्की जैसी गरीबी के मुकाबले की भावना है तो चेखव की भाँति उजड़ते लोगों के दुःख-दर्द की समझ भी। दायस्तोवास्की की भाँति कानूनों की प्रताड़ना का उल्लेख है तो मायोवास्की जैसी लयात्मकता भी। टाल्स्टाय का मानववाद है तो तुर्गनेव की भाँति सामन्तों पर व्यंग्य करने की शक्ति भी। इन्हीं गुणों ने प्रेमचन्द को उपन्यास-सम्राट बनाया है।

भाषा : प्रेमचन्द की भाषा का क्या कहना- इतनी सरल, सहज और सुबोध कि मत कहिए। पढ़ना क्या है भाव-सरिता में डूबते चले जाना है। , मुहावरों और कहावतों की नग-जड़ाई तो देखते ही बनती है। यही कारण है कि मुंशी प्रेमचन्द मुझे बहुत प्रिय हैं।

उपसंहार : मुंशी जी की सबसे बड़ी खूबी है कि वे मानव-मनोविज्ञान को समझने की शक्ति रखते थे। गूढ़ और सूक्ष्म-से-सूक्ष्म मनोभावों को उतारने में उन्हें कमाल हासिल था। यही कारण है कि उनके उपन्यास और उनके पात्र सीधे हमारे दिलो-दिमाग पर छा जाते हैं। (समरूप निबंध-मेरा प्रिय उपन्यासकार)

                        मेरी प्रिय पुस्तक : रामचरितमानस

रामचरितमानस विमल संतन जीवन प्राण।                                                                                                 विषय प्रवेश ‘रामचरितमानस’ गोस्वामी तुलसीदास की अनुपम कृति है। इस महाकाव्य में अयोध्या के राजा दशरथ के नंदन, पुरुषोत्तम, राम की कथा है।

 “रामकथा: राम अनुज लक्ष्मण के साथ विश्वामित्र के आश्रम में पढ़नेजाते हैं और अल्पकाल में ही सारी विद्याएँ प्राप्त करते हैं तथा वे ताड़का आदि राक्षसों का भी नाश करते हैं। फिर उनका विवाह राजा जनक की पुत्री सीता से होता है। दशरथ राम को गद्दी देने की तैयारी करते हैं। लेकिन रानी कैकेयी को यह बात अच्छी नहीं लगती। वे राजा को पहले दिए गए उनके वचन का स्मरण दिला राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास और अपने पुत्र भरत के लिए राजगद्दी माँग लेती हैं। राम अपने अनुज लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ वन जाते हैं। वियोग में राजा चल बसते हैं। भरत गद्दी पर नहीं बैठते, वे राम की खड़ाऊँ गद्दी पर रखकर राज-काज चलाते हैं। उधर लंका का राजा रावण एक दिन सीता का हरण कर लेता है। हनुमान सीता को खोज निकालते हैं और लंका में आग लगा देते हैं। फिर बन्दर-भालुओं की सेना लेकर राम लंका पर चढ़ाई करते और आततायी रावण का नाश करते हैं। अंत में अयोध्यापति राम आदर्श रूप में अपनी प्रजा का पालन करते हैं।

समाज और जीवन : संत तुलसीदास ने इस कथा को बालकांड, अयोध्या कांड, अरण्य कांड, किष्किंधा कांड, सुन्दरकांड, लंकाकांड और उत्तरकांड में बाँट कर, दोहा-चौपाई के माध्यम से बड़े ही भावपूर्ण और मनोरंजक ढंग से प्रस्तुत करते हुए हिन्दू धर्म का सच्चा स्वरूप राम के माध्यम से उपस्थित किया है। धर्म और समाज, राजा-प्रजा, ऊँच-नीच, द्विज-शूद्र एवं पुत्र के साथ माता-पिता का, भाई-बहन, गुरु-शिष्य आदि का सामाजिक और धार्मिक संबंध कैसा होना चाहिए यह सब इस ग्रंथ में संगुंफित है। जहाँ इसमें रावण जैसा अत्याचारी है, वहाँ लक्ष्मण और भरत जैसे भाई भी हैं, कौशल्या जैसी माता हैं तो अनन्य सेवक हनुमान हैं, सीता जैसी आदर्श पत्नी है, तो शूर्पणखा जैसी उच्छृंखल युवती भी है, और वशिष्ठ एवं विश्वामित्र जैसे आदर्श गुरु भी हैं।

काव्य-कला: इस ग्रंथ में सभी रसों का परिपाक हुआ है। बालकांड में वात्सल्य और श्रृंगार रस है तो अयोध्या कांड में करुण रस। इसी प्रकार, सुन्दरकांड में शान्त रस तो लंकाकांड में रौद्र, वीर और वीभत्स रस। छन्दों और अलंकारों की छटा तो देखते ही बनती है। सगुण, निर्गुण, शैव-वैष्णव, भक्ति और ज्ञान के साथ लोक और शास्त्र का अद्भुत संगम है यह ग्रंथ-

जासु राज़ प्रिया दुखारी, सो नृप अवसु नरक अधिकारी।”

महत्वं एवं उपसंहार : कदम-कदम पर सूक्तियाँ मिलती हैं

 यथा-जहाँ सुमति तहँ सम्पत्ति नाना, 

 जहाँ कुमति तहँ विपत्ति निदाना।

 ‘रामचरितमानस’ ग्रंथ नहीं, तत्कालीन समाज का सच्चा दर्पण है। यही कारण है कि ‘रामचरितमानस’ मेरी सबसे प्रिय पुस्तक है।

                                                                      होली

प्रारम्भ : रंग और उल्लास का पर्व होली मनाने की तैयारी वसंत पंचमी से ही शुरू हो जाती है। भारतवर्ष के कोने-कोने में यह उत्सव पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। वसंत ऋतु की प्राकृतिक सुंदरता के बीच होली का त्योहार और भी उल्लासपूर्ण हो जाता है। आम्रमंजरियों, सुगंधित फूलों, मोर, कोयल की कूहू-कूहू आदि से इस त्योहार का आकर्षण और बढ़ जाता है। पूर्णिमा की शाम को मुहूर्त के अनुसार होलिका दहन किया जाता है। कुछ लोग होलिका-कुंड का विधिवत् पूजन भी करते हैं।

पौराणिकता : होली भारतवासियों का एक सांस्कृतिक त्योहार है। यह पर्व एक साथ ही मौज-मस्ती, रवानी-जवानी, रंगीली अलमस्ती की याद दिलाती है। सच पूछा जाय तो होलिकोत्सव केवल होलिका का दहन, प्रह्लाद की रक्षा या हिरण्यकशिपु वध की स्मृति पर्व नहीं, वरन् नास्तिकता पर आस्तिकता का, बुराई पर भलाई का, पाप पर पुण्य का तथा दानवता पर देवत्व का विजय का प्रतीक है।

उल्लास की अभिव्यक्ति: हर्षोल्लास का यह पर्व होली प्रीति का प्रेय है। यह पर्व हमें वैमनस्य, ईर्ष्या, द्वेष को भूलने तथा परस्पर प्रेम, स्नेह एवं एकता की भावना के साथ रहने का संदेश देता है।

  किन्तु कुछ अबोध जन इस दिन दूसरों पर सड़ा कीचड़ उछालते हैं, पत्थर फेंकते हैं, ताड़ी और दारू पीकर शर्मनाक गाने और गाली-गलौज करते हैं। कुछ इस अवसर पर पुरानी अदावत का बदला लेना चाहते हैं; वर्गगत, जातिगत तथा संप्रदायगत विद्वेष का विष फैलाना चाहते हैं। वे भूल जाते हैं कि होली शत्रुता के विरुद्ध मित्रता, गंदगी के विरुद्ध स्वच्छता एवं अनेकता के विरुद्ध एकता का अभियान है।

साहित्य में वर्णन: यह पर्व भारतीय संस्कृति की एक पौराणिक कथा से जुड़ा हुआ है। हिरण्यकशिपु नामक एक महाबली दानवराज था, जो अपने को सृष्टिकर्ता ईश्वर से भी श्रेष्ठ मानता था। उसका पुत्र प्रह्लाद ईश्वर-भक्त था। उसकी बहन होलिका को अग्निदेव नहीं जला सकते थे, ऐसा उसको वरदान था। हिरण्यकशिपु ने होलिका की गोद में प्रह्लाद को बैठाकर जिन्दा जलाने का प्रयास किया। ईश्वर की महिमा अपरम्पार है। होलिका वरदान रहते हुए भी जल गई, परन्तु ईश्वर-भक्त प्रह्लाद को बाल-बाँका नहीं हो सका।

  इस प्रकार, नास्तिकता पर आस्तिकता की, बुराई पर भलाई की विजय हुई। बाद में ईश्वर ने नृसिंहावतार धारण कर हिरण्यकशिपु का नाश किया। दूसरी कथा के अनुसार जब श्रीकृष्ण ने दुष्टों का दमन कर गोप बालाओं के साथ रासलीला रचाया, तब होली पर्व का प्रचलन हुआ। इस त्योहार के पीछे जो भी अंतरकथा हो, इतना निश्चित है कि हर्षोल्लास का यह पर्व दुराग्रह पर, सत्याग्रह की विजय का प्रतीक है। यह आनंद एवं उत्साह का महोत्सव है।

उपसंहार : होली एक सामाजिक पर्व है। होली भारत की सांस्कृतिक परम्परा का प्रतीक है और यह हमें प्रेम, स्नेह, भ्रातृत्व तथा एकता का पाठ पढ़ाता है। अतः हमें असामाजिक प्रवृत्तियों तथा शर्मनाक आचरण से दूर रहना चाहिए।

 दुर्गा पूजा

या देवी सर्वभूतेषु मातुरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमो नमः

या देवी सर्वभूतेषु शांतिरूपेण संस्थिता नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

भूमिका :यह कर्णप्रिय मंत्रोच्चार जब शुरू होता है तो पता चल जाता है कि आश्विन माह का शुक्ल प्रतिपदा है और कलशस्थापन हो गया है। माँ दुर्गा शक्तिदायिनी शक्तिरूपिणी है। दुर्गतिनाशिनी है।

धार्मिक कथा: वैसे तो, अनेक धार्मिक कथाएँ विभिन्न तरह से बताई जाती हैं, जो वेद, पुराण, देवी भागवत, उपनिषद आदि में वर्णित हैं। लेकिन हमारे यहाँ जो कथा प्रचलित है उसमें कहा जाता है कि लंकापति रावण दंभी-अभिमानी, पापी आत्ताई; लेकिन शिवाशीष से अपराजेय था। अतः भगवान राम ने माँ दुर्गा से आशीर्वाद लेकर उसका संहार किया। चूँकि उसका दस आनन (सिर) था इसलिए दशहरा और दशमी तिथि को रावण पर विजयी प्राप्त की, इसलिए विजयादशमी के नाम से भी इस पर्व को मनाते हैं।

लाभ : कोई भी त्योहर सामाजिक सौहार्द, मैत्रीभाव, बन्धुत्व को बढ़ाता है। लेकिन सबसे बड़ी सोच यह है कि राष्ट्र की सबलता जिन बातों पर निर्भर करता है, वह है, संपत्ति, विद्या, ज्ञान, शारीरिक आदि; बलों के समुचित रूप में विद्यमान होना। यहाँ दुर्गा के साथ सरस्वती विद्याबल, लक्ष्मी-संपत्तिबल, गणेश-ज्ञानबल, कार्तिकेय पशुधनबल के साथ-ही-साथ लोगों की एकजुटता शारीरिक बल का होना राष्ट्रबल का प्रतीक बन जाता है।

हानि: इस त्योहर की कुछ हानियाँ भी हैं; जैसे-मूर्ति के लिए मिट्टी कटने से मृदा प्रदूषण, उच्च ध्वनि तरंगों में ध्वनिविस्तारक यंत्रों का बजाना ध्वनि प्रदूषण, हवन से निकलने वाले धुएँ से वायु प्रदूषण, समाप्ति के उपरान्त जलसमाधि से जल प्रदूषण मुख्य हानियाँ तो है ही चंदा उगाही को लेकर कुछ दबंग लोगों द्वारा बल का प्रयोग सामाजिक वैमनस्य पैदा करता है। इसके अलावे मेला में भीड़ जुटने से कई प्रकार का आपराधिक व साम्प्रदायिक दुर्घटना भी दुर्योगवश हो जाया करती है।

उपसंहार : इस प्रकार, हम निष्कर्ष पर पहुँचते हैं तो पाते हैं कि यह त्योहार असत्य पर सत्य, अन्याय पर न्याय की आसुरीबल पर दैवीबल की जीत है। जहाँ महिषासुर और माँ दुर्गा प्रतीक रूप में है।:

 मेरे प्रिय कवि : तुलसीदास

कागज के पन्नों को तुलसी तुलसीदल जैसा बन गया‘।

भूमिका: लगभग पाँच सौ वर्षों की कालधारा जिस कवि की कृति को धूमिल न कर पाई, वह कवि हैं गोस्वामी तुलसीदास। तुलसीदास का आविभांव उस समय हुआ, जिस समय हिन्दू-जाति विधर्मियों के अत्याचार से त्राहि-त्राहि कर रही थी। निराशा के इस काल में उन्होंने कण्ठितों के बीच आशा का संचार किया और भक्ति का दीप जलाकर पथ उजागर किया।

तुलसीदास का जीवन वृत्त: तुलसी का जन्म  सम्वत् 1554 में उत्तर प्रदेश के राजापुर नामक गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम आत्माराम दुबे एवं माता का नाम हुलसी था। कहा जाता है कि मूल नक्षत्र में जन्म लेने के कारण माता-पिता ने उनका त्याग कर दिया। फलतः इनका बाल्यकाल अत्यंत दुःखमय रहा। गुरु नरहरि दास की कृपा ने इन्हें रामबोला से तुलसीदास बना दिया। शेष सनातन जी से शिक्षा ग्रहण करने के बाद तुलसीदास की रत्नावाली से शादी हुई। पत्नी पर मुग्ध तुलसी एक बार बिन बुलाए ससुराल पहुँच गाए। रत्नावली ने लोकलाजवश इन्हें कड़ी झिड़की दी। बस, इस झिड़की से आसक्ति भक्ति में बदल गई। विरक्त हो, तुलसी ने मानसरोवर से सेतुबन्ध तक की यात्रा की तथा अपने जीवन को राममय बना लिया।

रचनाएँ एवं महत्त्व : राम के रंग में रंग कर तुलसी ने अनेक ग्रंथों की रचना की, यथा-कवितावली, दोहावली, गीतावली, रामलला नहछू, वैराग्य संदीपनी, जानकी-मंगल, पार्वती-मंगल, विनय पत्रिका और रामचरितमानस । तुलसी का व्यक्तित्व अनोखा है। इनके समक्ष कबीर, जायसी एवं सूरदास सबके सब फीके पड़ गये क्योंकि कबीर ने सधुक्कड़ी भाषा में, जायसी ने अवधी में और सूरदास ने ब्रजभाषा में रचनाएँ की किंतु तुलसी ने दोनों भाषाओं में अपनी रचना कर सबों को पीछे छोड़ दिया। इनकी रचनाओं में रस, अलंकार एवं छन्द स्वतः आ गये हैं, इसीलिए तो हरिऔध जी ने कहा ह

“कविता पा तुलसी न लसे, कविता लसी पा तुलसी की कला।”

उपसंहार : तुलसी परिस्थिति-विशेष की ऊपज थे। इस समय हिन्दू-जाति भयंकर यंत्रणा से गुजर रही थी। इन्होंने अपने विशेष महाकाव्य ‘रामचरितमानस’ एवं ‘विनयपत्रिका’ की रचना कर, भक्ति की गंगा बहाकर सबको मुग्ध किया एवं बिखरी हिन्दू-जाति को एकता का पाठ पढ़ाया तथा सारे सम्प्रदायवादी विचारों का अन्त कर एक नयी दिशा दी।

राष्ट्रीय खेल हॉकी

भूमिका : हॉकी मैदान में खेले जाने वाला खेल है, जिसे 11-11 खिलाड़ियों को रखने वाली दो टीमों के द्वारा खेला जाता है। इसे भारत का राष्ट्रीय खेल इसलिए चुना गया है क्योंकि भारत हॉकी में कई सालों तक विश्व विजेता रहा था। हॉकी को आधिकारिक रूप से राष्ट्रीय खेल घोषित नहीं किया गया है। हालांकि, इसे केवल भारत का राष्ट्रीय खेल माना जाता है, क्योंकि भारत ने हॉकी में बहुत से स्वर्ण पदकों को जीता है।

 खिलाड़ी और हॉकी खेलने का समय: पहले समय में, यह अलग तरीकों  के साथ खेला जाता था हालांकि, अब इसे मैदानी हॉकी के रूप में खेला जाता है, जो 19वीं सदी में ब्रिटिश द्वीपों में विकसित हुआ था। इसके बाद, यह अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर फैल गया और इसने विश्व भर में प्रसिद्धी प्राप्त कर ली। इस खेल को नियंत्रित करने और अपने नियमों का मानकीकरण करने के लिए, लंदन हॉकी ऐसोसिएशन का गठन किया गया था। बाद में, अन्तर्राष्ट्रीय हॉकी महासंघ (1924 में) और महिला हॉकी के अन्तर्राष्ट्रीय महासंघ का गठन किया गया।

महत्त्व : हॉकी भारत में बहुत महत्त्वपूर्ण खेल है क्योंकि भारत को हॉकी के क्षेत्र में कई वर्षों तक विश्व विजेता बनाया है, इसलिए इसे भारत के राष्ट्रीय खेल के रूप में चुना गया है। इस खेल का इतिहास बड़ा और महान है, क्योंकि यह बुद्धिमान खिलाड़ियों द्वारा भारत की जड़ों में गहराई तक समाया हुआ है। यह भारत के प्राचीन ज्ञात खेलों में से एक है।

निष्कर्ष : यह एक शानदार भारतीय हॉकी खिलाड़ी, जिनका नाम ध्यानचंद था, की वजह से हुआ। उन्होंने वास्तव में एम्सटर्डम की भीड़ के सामने सभी भारतीयों को मंत्रमुग्ध कर दिया था। भारत लगातार हॉकी के अपने स्वर्ण युग के दौरान छह ओलम्पिक स्वर्ण पदक और लगातार 24 हॉकी मैच जीता था।                   

लोकतंत्र और चुनाव

भूमिका : लोकतंत्र अपने-आप में एक ऐसा प्रणाली है जो ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ है। अब्राहम लिंकन की वह उक्ति कि “लोकतंत्र लोगों के ऊपर लोगों का लोगों द्वारा शासन है।” इससे स्पष्ट होता है कि इस शासन प्रणाली में चयनित जनप्रतिनिधि शासन करते हैं। अर्थात् सारी जनता की सहभागिता ऐसी शासन प्रणाली में हो जाती है।

निर्वाचन एक प्रधान साधन: लोकतांत्मक प्रणाली को पूर्णरूपेण सफल बनाने हेतु स्वच्छ निष्पक्ष शांतिपूर्ण एवं कदाचारमुक्त आम चुनाव का होना अनिवार्य है। इस चुनाव में वैसे सभी वयस्क नागरिक जो 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुके हैं और मानसिक रूप से स्वस्थ हैं; वे अपने मत देने का अधि कार प्राप्त कर लेते हैं। 26 नवम्बर, 1949 को भारतीय संविधान परिषद् ने भारतीय संविधान को स्वीकृति प्रदान की और इस पद्धति से निर्वाचन शुरू हो गया।

नागरिक अधिकार : भारतवर्ष के प्रत्येक नागरिक को यह अधिकार प्राप्त है जिनकी आयु 18 वर्ष पूर्ण हो गई है। निर्वाचन नामावली में उनका नाम जुड़ चुका है; चाहे वे किसी भी जाति, धर्म, वर्ग, वर्ण अथवा लिंग के हों। संविधान में उन्हें यह मौलिक अधिकार के रूप में दिया गया है जिसकी रक्षा की जिम्मेवारी एक प्रतिष्ठित एवं शक्तिशाली संस्था को दी गई है, जो ‘चुनाव आयोग’ कहलाता है।

एक दलीय शासन का अंत: लोकतंत्र की सफलता के लिए यह एक अत्यन्त अहम बिन्दु है कि इस चुनाव प्रणाली में सबको समान रूप से शासन चलाने का मौका दिया जाता है। विपक्ष में रहने वाले लोग भी कभी सत्ता पर आसीन हो सकते हैं क्योंकि जहाँ एकदलीय प्रणाली होगी, वहाँ जनता के हित की अनदेखी निश्चित होती है। अतः जनता अपन सरकार चुन लेती है।

उपसंहार : लोकतंत्र में चुनाव प्रणाली सबसे सफल प्रणाली है। इस प्रणाली में जनता को अधिक से अधिक लाभ होता है। यही कारण है कि आज सम्पूर्ण विश्व में भारतीय लोकतंत्र एवं इसके चुनाव प्रणाली की सराहना की जा रही है।

अनुशासन                                   

भूमिका : अनुशासन का अर्थ है- व्यवस्था, क्रम और आत्म-नियंत्रण। यह एक ऐसा गुण है जो समय की बचत करता है, धन और शक्ति का अपव्यय रोकता है तथा अतिरिक्त बल पैदा करता है। अनुशासन का मानव-जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है।

 अनुशासन का महत्व : सिनेमा की टिकट खिड़की या बस पर चढ़ने वाले यात्रियों को लें। अधिकांशतः बस पर चढ़ने वाले यात्रियों में धक्का-मुक्की होती है। कभी-कभी एकाध खरोंच भी आ जाती है। यदि बस पर चढ़ने का कार्य अनुशासन से हो जाए तो सभी बस में बैठ जाएँगे और धक्का-मुक्की से उत्पन्न समस्याएँ भी नहीं पैदा होंगी।

अनुशासनहीनता के दुष्प्रभाव : अनुशासनहीनता के दुष्प्रभाव अनादि काल से ही देखने को मिलता है। महाभारत का युद्ध, राम-रावण युद्ध, जापान पर अणुबम का प्रयोग सब अनुशासन की मर्यादा भूलने के परिणाम हैं। दैनिक जीवन में यदि हम अनुशासित नहीं रहेंगें तो हमें असफलता का सामना करना पड़ेगा। यदि अनुशासन न पालन किया जाए तो सामाजिक ताना-बाना गड़बड़ हो जाएगा। पारिवारिक माहौल बिगड़ जाएगा। ग्रह एवं तारे भी अनुशासन नियम का पालन कर दिन-रात में परिवर्तित होता है।

अनुशासन से संयम आता है तथा सभ्यता का प्रारंभ होता है। आज की नवीन सभ्यता अनुशासन का ही देन है। ग्रामीण सभ्यता में कोई रहन-सहन का व्यवस्थित तरीका नहीं, बोल-चाल में अनुशासन नहीं, इसलिए वे पिछड़ जाते हैं। दूसरी ओर शहरी सभ्यता में हर चीज की एक व्यवस्था है, बोलने का, कार्य करने में एक नियमित क्रम है, इसलिए आज उसका आकर्षण है।

निष्कर्ष : मुट्ठी भर अंग्रेजों ने विशाल भारत को किस प्रकार गुलाम बनाया? निश्चय ही अनुशासन के बल पर। अनुशासन से शक्तियों का केंद्रीकरण होता है, गतिशील ऊर्जा का जन्म होता है तथा जीवन सहज, सरल और सुंदर बन जाता ह

गणतंत्र दिवस : 26जनवरी

विषय-प्रवेश : गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) का भारतवासियों के जीवन में महत्त्वूपर्ण स्थान है। सदियों की गुलामी से त्रस्त देशभक्तों ने अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध स्वतंत्रता का शंखनाद किया। लाखों के बलिदान के पश्चात् दासता से मुक्ति मिली और गणतंत्र की स्थापना इसी दिन हुई।

पृष्ठभूमि: स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान अनेक नाजुक क्षण आए। किंतुगाँधीजी ने स्वाधीनता संग्राम को नया आयाम दिया। इसी बीच सन् 1929 ई में पवित्र रावी के तट पर, लाहौर अधिवेशन में, तत्कालीन काँग्रेस अध्यक्ष पं. जवाहरलाल नेहरू ने पूर्ण स्वराज्य की घोषण की। तभी से उस दिन (26 जनवरी) स्वतंत्रता दिवस मनाया जाने लगा। किन्तु 1947 ई० में आजादी के बाद जब संविधान बना और वयस्क मताधिकार अंगीकृत हुआ तो 26 जनवरी गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। गवर्नर जेनरल का पद समाप्त कर राष्ट्रपति पद की व्यवस्था की गई और 26 जनवरी, 1950 ई० को डा० राजेन्द्र प्रसाद प्रथम राष्ट्रपति बने।

विशेषता एवं महत्त्व : भारत में इस दिन का उतना ही महत्त्वपूर्ण स्थानहै जितना कि होली, दीपावली का हिन्दुओं के लिए, क्रिसमस का ईसाइयों के लिए तथा ईद, मुहर्रम, मुसलमानों के लिए। 26 जनवरी के दिन देश के सभी राज्यों की राजधानियों में बड़ी धूमधाम से विशेष समारोह आयोजित होते हैं। देश की राजधानी दिल्ली में राष्ट्रपति राष्ट्रध्वज फहराते हैं और सेना की टुकड़ियाँ सलामी देती हैं। फिर रंगारंग झाँकियाँ निकलती हैं जिनमें देश की प्रगति की झलक होती है। समाज और सेना के विभिन्न क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण कार्य करने वालों के लिए पद्म अलंकारों की घोषणा होती है और बहादुर बच्चे एवं सैनिक सम्मानित किए जाते हैं।

कार्यक्रम : राज्यों की राजधानियों में राज्यपाल ध्वजारोहण करते हैं और सैनिक टुकड़ियाँ, छात्रवाहनियाँ सलामी देती हैं। रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। राष्ट्रसेवा के लिए व्रत लिया जाता है।

उपसंहार : अतः हमें सतत् ध्यान रखना चाहिए। इस पवित्र तिथि का उद्देश्य कभी भी धूमिल न होने पावे और हम अपने गणतंत्र की बागडोर वैसे सच्चे प्रतिनिधि को ही सौंपें जिनसे देश का कल्याण हो।

                                                                        गरीबी

भूमिका: भोजन, वस्त्र और आवास की समस्या से जूझना ही गरीबी है। दो जून की रोटी की जुगाड़ ही गरीबी है। अधूरे सपने लेकर जीवन-पर्यन्त गरीबी से लड़ते हुए मौत के मुँह में समा जाना गरीबी है।

गरीबी के कारण : हमारे देश में जन-जाति, दलित और खेतिहर मजदूर गरीबी की श्रेणी में आते हैं। बिहार, झारखण्ड, उड़ीसा, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड में देश के लगभग 60 प्रतिशत लोग गरीबी की मार झेलने को मजबूर हैं। इसका मुख्य कारण बढ़ती जनसंख्या दर, निरक्षरता, खराब स्वास्थ्य और वित्तीय संसाधनों की कमी तथा अशिक्षा। गरीबी के कारण ही प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय में कमी आई है।

 पूरे दिन मेहनत करने वाले कारीगरों की दैनिक मजदूरी बहुत कम हो उसपर दलालों की गिद्ध-दृष्टि उनके मुँह का निवाला भी छिनने में नहीं शर्माती ।

गरीबी उन्मूलन के उपाय : गरीबी को मिटाने के लिए सरकार ने शिक्षा व्यवस्था में सुधार निःशुल्क शिक्षा, कौशल विकास केन्द्र खोलकर तकनीकी शिक्षा की रोजगारपरक व्यवस्था की है। मनरेगा द्वारा लोगों का आय बढ़ाई जा रही है। शौचालयों एवं बिजली-पानी निःशुल्क मुहैया कराई जा रही है। गाँव-शहर की दूरी सड़कों द्वारा आसान हो गई है। ‘आशा’ कार्यकर्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता, गैर सरकारी संस्थाएँ भी सहयोग कर रही हैं।

निष्कर्ष : मानव जीवन को सम्मान से जीने के लिए रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य एवं शिक्षा-मूलभूत आवश्यकताएँ बन गयी हैं। धीरे-धीरे गरीबों का जीवन-स्तर सुधर रहा है। हमारी सरकार की पूरी कोशिश है जनता को गरीबी जैसे अभिशाप से मुक्ति मिले।.

 जंगल

भूमिका : जंगल हमारे धरोहर हैं। प्राचीन काल में इन्होंने सभी जीवों को आश्रय, भोजन, एवं पर्यावरण प्रदान किया।

जंगल का महत्व : जंगलों का धरती पर महत्वपूर्ण योगदान है। जंगल पर्यावरण को सुरक्षित रखते हैं। वन्य जीवों के आश्रय स्थल हैं। इमारती एवं जलावन की लकड़ी ये प्रदान करते हैं। दुर्लभ जड़ी बूटियाँ जंगलों में पाई जाती हैं।

जंगल से लाभ : जंगली जीव, उत्पाद हमारे अर्थोपार्जन के स्त्रोत हैं। जंगल जीवों के वास स्थल हैं। कई प्रकार के दुर्लभ जीव-जातियों को इन्होंने संरक्षित किया है। जंगल वर्षा लाने में सहायक हैं। हरे पौधे हमें भोजन फल प्रदान करते हैं। ये ऑक्सीजन छोड़ते हैं जिससे पर्यावरण संरक्षित एवं सुरक्षित रहता है।

जंगलों की अंधाधुंध कटाई से हानि: आज हम जंगलों की अंधाधुंध कटाई कर अपने लाभ की पूर्ति तो कर रहे हैं किंतु वह दिन दूर नहीं जब धरती प्रदूषित हो जाएगी। जलस्तर बढ़ जाएगा। वैश्विक तापन बढ़ जाएगा। तब ध रती बंजर हो जाएगी। मानव सभ्यता विहिन हो जाएगी। अतः वनों को लगाना जरूरी है।

उपसंहार : वन हमें स्वच्छ पर्यावरण प्रदान करते हैं। प्रकाश संश्लेषण द्वारा O₂ प्राप्त करते हैं। फल, फूल एवं मेवा प्रदान करते हैं। घर बनाने के उपस्कर हेतु लकड़ी प्रदान करते हैं। अतः इनको बचाना हमारा परम कर्त्तव्य है।

पुस्तकालय

भूमिका : पुस्तकालय का अर्थ-पुस्तक+आलय अर्थात् पुस्तकें रखने का स्थान। पुस्तकालय मौन अध्ययन का स्थान है। जहाँ हम बैठकर ज्ञानार्जन करते हैं।

महत्व : पुस्तकालयों के अनेक लाभ हैं। सभी पुस्तकों को खरीदना हर किसी के लिए सम्भव नहीं है। इसके लिए लोग पुस्तकालय, का सहारा लेते हैं। इन पुस्तकालयों से निर्धन व्यक्ति भी लाभ उठा सकता है। पुस्तकालय से हम अपनी रुचि के अनुसार विभिन्न पुस्तकें प्राप्त कर अपना ज्ञानार्जन कर सकते हैं।

उपयोगिता : पुस्तकालय भिन्न-भिन्न प्रकार के हो सकते हैं। कई विद्या-प्रेमी अपने उपयोग के लिए अपने घर पर ही पुस्तकालय की स्थापना कर लेते हैं। ऐसे पुस्तकालय ‘व्यक्तिगत पुस्तकालय’ कहलाते हैं। सार्वजनिक उपयोगिता की दृष्टि से इनका महत्व कम होता है।                               

                                              दूसरे प्रकार के पुस्तकालय स्कूलों और कॉलेजों में होते हैं। इनमें बहुधा उन पुस्तकों का संग्रह होता है, जो पाठ्य-विषयों से संबंधित होती हैं। सार्वजनिक उपयोग में इस प्रकार के पुस्तकालय भी नहीं आते। इनका उपयोग छात्र और अध्यापक ही करते हैं। परन्तु ज्ञानार्जन और शिक्षा की पूर्णता में इनका सार्वजनिक महत्त्व है। इनके बिना विद्यालयों की कल्पना नहीं की जा सकती                                                     

हानि : तीसरे प्रकार के पुस्तकालय ‘राष्ट्रीय पुस्तकालय’ कहलाते हैं। आर्थिक दृष्टि से संपन्न होने के कारण इन पुस्तकालयों में देश-विदेश में छपी भाषाओं और विषयों की पुस्तकों का विशाल संग्रह होता है। इनका उपयोग भी बड़े-बड़े विद्वानों द्वारा होता है। चौथे प्रकार के पुस्तकालय संचालन सार्वजनिक संस्थाओं के द्वारा होता है।

पुस्तक न खरीद सकने वाले व्यक्ति, ग्रामीण समुदाय पुस्तकालय की पुस्तकों को पढ़कर लाभ उठाते हैं।

उपसंहार : पुस्तकालय हमारे जीवन में प्रभावशाली महत्व रखते हैं। आज आधुनिकता के दौर में पुस्तकालयों का महत्व नई पीढ़ी इंटरनेट एवं गूगल सर्च कर प्राप्त कर रहा है जो अत्यंत ही शोचनीय बात है।

भ्रमण का महत्व

भूमिका: किसी कवि ने ठीक ही कहा है कि प्रातः काल सैर करने से स्वास्थ्य सुधरता है। प्रातः काल उठने के लिए रात को शीघ्र सो जाना चाहिए। ‘Early to bed and early to rise makes a man healthy, wealthy and wise.’ का सिद्धान्त अपनाना चाहिए। गाँव में रहने वाले लोगों को प्रकृति की स्वच्छ हवा आसानी से मिल जाती है। परन्तु महानगरों में कल-कारखानों की अधिकता और मोटरकारों का धुंआ दिनभर वायुमंडल को प्रदूषित करता रहता है। स्वच्छ, सुगंधित, शीतल वायु का सेवन हम प्रातः काल ही कर सकते हैं। प्रातः काल घूमने की आदत बहुत अच्छी होती है।’

भ्रमण का महत्व : प्रातः कालीन भ्रमण के अनेक लाभ हैं। सबसे पहला लाभ यह है कि प्रातः काल शीघ्र उठने से शरीर में स्फूर्ति बनी रहती है। प्रातः कालीन शीतल वायु फेफड़ों के लिए बहुत अच्छी होती है। इससे स्मरण शक्ति तीव्र होती है। घूमने-फिरने से शरीर में एक नई चेतना उत्पन्न होती है। शरीर स्वस्थ्य एवं मन प्रसन्न बना रहता है। ब्लड प्रेशर, मधुमेह (सुगर) आदि बीमारियों पर नियंत्रण रहता है।

भ्रमण का शैक्षिक महत्व: पार्क में अनेक लोग सामूहिक योगासन करते हुए देखे जाते हैं। कहीं युवा छात्र फुटबॉल या बालीबॉल खेलते हैं। स्त्रियां आसन करती दिखाई देती हैं तो कहीं वृद्धजनों की टोली भगवान का कीर्तन करने में संलग्न दिखाई देती है। ये सब कार्य भ्रमण के महत्व हैं। छात्रों को ऐतिहासिक महत्व वाले स्थानों का भ्रमण करने से इतिहास, भूगोल, समाज शास्त्र की जानकारी प्राप्त होती है। भारतवर्ष की पुरानी गरिमा के बारे में जानकारी मिलती है। राज्य सरकार ने छात्रों को शैक्षणिक भ्रमण हेतु सभी विद्यालयों में फंड प्रदान कर रखा है।

निष्कर्ष : पार्क में लोग विभिन्न प्रकार के व्यायाम करते मिलते हैं। वे – कभी कबड्डी मैच खेलते हैं। कभी लाठी चलाने का अभ्यास करते हैं। भ्रमण करने से ज्ञान-विज्ञान में वृद्धि होती है। रोचक सूचनाएँ प्राप्त होती हैं। तत्कालीन व्यवस्था का पता चलता है। ऐतिहासिक, भौगोलिक एवं स्थापत्य कला के विकास का पता चलता है। अतः भ्रमण अनिवार्य है।

 भ्रष्टाचार

भूमिका: भ्रष्टाचार का शाब्दिक अर्थ है- भ्रष्ट आचरण। भ्रष्टाचारी व्यक्ति परिवार, समाज के लिए कलंक होता है। आज के समय में भ्रष्टाचार ‘वैश्विक समस्या’ बन गया है।

भ्रष्टाचार के कारण : हमारी भोग लिप्सा और ज्यादा से ज्यादा अर्थ संग्रह भ्रष्टाचार का मूल कारण है। ज्यादा से ज्यादा सुख-संपत्ति की भूख सभी अनैतिक कार्य करने को मजबूर करती है। शिक्षा, व्यापार, राजनीति, खेल-कूद,

शासन-व्यवस्था एवं शिक्षा कुछ भी अछूता नहीं रहा।

भ्रष्टाचार का स्वरूप : विद्यार्थी परीक्षा में नकल करते हैं, कार्यालय के बाबू घूस लेते हैं, आला अधिकारी गलत काम करते हैं। भ्रष्टाचार ही वर्त्तमानसभा में शिष्टाचार बन गया है।

भ्रष्टाचार के निवारण के उपाय : भ्रष्टाचार से बचने के लिए नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देना होगा। स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज, देश और विश्वकी चिन्ता करनी होगी। भौतिक ऐश्वर्य और भोगवाद से हटकर समाज-सेवा और मानव-कल्याण की भावना जाग्रत करनी होगी। भ्रष्टाचार का आधार स्वार्थ और धनलिप्सा होता है हमें राष्ट्र के प्रति अपनी जवाबदेही पैदा करनी होगी। जब तक हमारे भीतर राष्ट्रप्रेम और मानव-कल्याण का भाव नहीं पैदा होगा, जबतक भ्रष्टाचार नहीं मिटेगा। धर्म में आस्था रखते हुए ईश्वर के प्रति जवाबदेही समझनी होगी। पाप-पुण्य में अन्तर करना होगा।

निष्कर्ष : इस प्रकार समाज के लिए भ्रष्टाचार कलंक है। इस कलंक की मुक्ति के लिए आत्मानुशासन, जिम्मेदारी और वफादारी का भाव रखना होगा। यह लड़ाई घर से शुरू करनी पड़ेगी और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर जारी रखनी होगी। भ्रष्टाचार से मुक्ति हमारा राष्ट्रीय संकल्प बनकर उभरे, यही हमारी मंगल कामना है।

मित्रता

मित्रता बड़ा अनमोल रतन, कब इसे तौल सकता है धन?                    

भूमिका सच है, मित्रता अनमोल धन है. अतुलनीय है। जिसे सच्चा मित्र  मिल जाता है, उसका हर दुख आधा हो जाता है।

मित्र चयन में सतर्कता: मनुष्य जब संसार-सागर में उतरता है तो उसे किसी की बातें और किसी की दरियादिली। युवा मन इन्हीं में से किसी पर बहुत लोग मिलते हैं। किसी की अदा निराली होती है. किसी का रंग-रूप, फिदा हो जाता है और उसे मित्र बना लेता है। ऐसे लोग शायद ही मित्रता निभाते हैं। अधिकतर मतलबी होते हैं. कुछ दिन मौज-मस्ती की और खिसके।

 सच्चे मित्र से लाभ वस्तुतः सच्ची मित्रता वहीं होती है. जहाँ विचारों की एकता होती है। इसमें समृद्धि, निर्धनता जाति-पाति आडे नहीं आती।कृष्ण राजा थे, सुदामा निर्धन फिर भी दोनों में गाढी मित्रता थी। इसी प्रकार, राम और सुग्रीव गाढे मित्र थे। कहते हैं महाकवि तुलसी और कविवर रहीम भी मित्र थे।

बुरे से हानि : कभी विपरीत विचारों वालों में भी मित्रता हो जाती है क्योंकि हम चाहते हैं कि जो गुण हममें नहीं है, उस गुणवाला कोई मिल जाए। राम शान्त स्वभाव के थे किन्तु भावावेश में आने वाले लक्ष्मण को वे बहुत चाहते थे। चिन्तन प्रिय व्यक्ति प्रफुल्ल चित्त वाले को, निर्बल बलवान को और वीर उत्साही को खोजता                                                          वस्तुतः सच्चे मित्र में उत्तम वैद्य की सी निपुणता और परख होती है। जैसे वैद्य अपनी औषधि से शरीर के विकार को निकाल देता है, वैसे ही सच्चा मित्र अपनी सलाह से अपने मित्र को दुगुर्गों से बचाता, संकट में उसकी रक्षा करता और दुर्दिन में उसकी सहायता करता है। रामचन्द्र शुक्ल की दृष्टि में सच्चे मित्र में माता-सा धैर्य और कोमलता होती है। सच्चा मित्र आनन्द को दुगुना और दुख को आधा कर देता है।

उपसंहार : इसलिए किसी से मित्रता बहुत सोच-विचार कर, जाँच-परख कर करनी चाहिए। मुँह के सामने प्रशंसा और पीठ पीछे बुराई करनेवालों से सदा सचेत रहना चाहिए। सुविधा से अपना काम निकाल कर खिसक जानेवाले लोग बहुत मिलते हैं, वे मित्र नहीं होते, मतलबी होते हैं। कहा है-

मतलबी यार किसके ? काम निकला और खिसके।

 सच्ची बात तो यह है कि मित्रता दैवी देन है और मनुष्य के लिए वरदान। यही कारण है कि सच्चे मित्र बहुत नहीं होते।

सच्चा मित्र जीवन में एक वरदान है। वह भूले-भटके को राह दिखाता और मित्र की सोई किस्मत को जगाता है

राष्ट्रभाषा                                              

आरम्भ : राष्ट्रभाषा का अर्थ है राष्ट्र की भाषा अर्थात् ऐसी भाषा जिसका प्रयोग देश की हर भाषा के लोग आसानी से कर सकें, बोल सकें और लिख सकें। हमारे देश की ऐसी भाषा है, हिन्दी। आजादी के पहले अंग्रेजी सरकार ने अंग्रेज के माध्यम से सारा काम चलाया किन्तु अपने देश में सबके लिए एक भाषा का होना आवश्यक है, ऐसी भाषा जो अपने देश की हो। वह भाषा केवल हिन्दी ही है।

पक्ष में तथ्य : हिन्दी को संस्कृत की बड़ी बेटी कहते हैं। हिन्दी का प्रमुख गुण यह है कि यह बोलने, पढ़ने, लिखने में अत्यन्त सरल है। हिन्दी के प्रसिद्ध विद्वान जॉर्ज ग्रियर्सन ने कहा है कि हिन्दी व्याकरण के मोटे नियम केवल एक पोस्टकार्ड पर लिखे जा सकते हैं। संसार के किसी भी देश का व्यक्ति कुछ ही समय के प्रयत्न से हिन्दी बोलना और लिखना सीख सकता है। इसकी दूसरी विशेषता है कि यह भाषा लिपि के अनुसार चलती है। इसमें जैसा लिखा जाता है, वैसा ही बोला जाता है।

  इसकी सबसे बड़ी विशेषता है कि संसार की लगभग सभी भाषाओं के शब्द इसमें घुलमिल सकते हैं। कुर्सी, आलमारी, कमीज, बटन, स्टेशन, पेन्सिल, बेंच आदि अनगिनत शब्द हैं जो विदेशी भाषाओं से आकर इसके अपने शब्द बन गए हैं।

आवश्यकता : हिन्दी संसार के अनेक विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती है और इसका साहित्य भी विशाल है। इसके अलावा, हिन्दी ने देश में एकता लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उत्तर दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक, भारत के अधिकतर विद्वानों ने भारत की एकता अखंडता के लिए हिन्दी का समर्थन किया है।

  इतने अधिक गुणों से भरपूर होकर भी हिन्दी आज अंग्रेजी के पीछे क्यों चल रही है? इसका सबसे बड़ा कारण है ऊँचे पदों पर बैठे व्यक्ति जो अंग्रेजी के पुजारी हैं, वे सोचते हैं कि अंग्रेजी न रही तो देश पिछड़ जाएगा।

 अंग्रेजी देश की अधिकतर जनता के लिए कठिन है, इसलिए वे जनता पर इसके माध्यम से अपना रौब रख सकते हैं। दूसरा कारण है-क्षेत्रीय भाषाओं के मन में बैठा भय। उन्हें, लगता है कि यदि हिन्दी अधिक बढ़ी तो क्षेत्रीय भाषाएँ पीछे रह जाएँगी।

 वास्तव में ये दोनों विचार गलत हैं। ऊँचे पदों पर बैठे अधिकारी हिन्दी के माध्यम से देश की अधिक सेवा कर सकते हैं और जनता का प्रेम पा सकते हैं। आज अंग्रेजी क्षेत्रीय भाषाओं को पीछे धकेल रही है जबकि हिन्दी की प्रकृति किसी को पीछे करने की नहीं, बल्कि मेलजोल की है। यदि हिन्दी का विकास होता है, तो क्षेत्रीय भाषाओं का भी विकास होगा।

उपसंहार : भारत की भूमि पर जन्म लेने के नाते हमारा यह कर्त्तव्य है कि हम भारत की भाषाओं के विकास पर बल दें और हिन्दी का विकास करके सभी भाषाओं को जोड़ने का प्रयास करें। तभी हिन्दी सचमुच राष्ट्रभाषा बन पाएगी।

व्यायाम

भूमिका : हमने बहुत बार सुना है कि पहला सुख है निरोग शरीर। इसी की वजह से हम अन्य सभी सुखों का आनंद उठा सकते हैं। अपनी पढ़ाई पर ध्यान भी हम तभी कर सकते हैं जब हमारा शरीर स्वस्थ हो। व्यायाम शरीर को चुस्त और फुर्तीला का उत्तम मार्ग है।

लाभ : व्यायाम से शारीरिक शक्ति बढ़ती है, शरीर में रक्त का संचार होता है। शरीर फुर्तीला और चुस्त रहता है। मांसपेशियाँ सुदृढ़ रहती हैं। पाचन शक्ति ठीक रहती है। आलस्य दूर भागता है। शरीर में अनावश्यक चर्बी नहीं बढ़ती और शरीर गतिशील बना रहता है। व्यायाम करने वाले युवकों पर बुढ़ापा आक्रमण नहीं करता है। व्यायाम करने से पसीना आता है तथा विभिन्न प्रकार के अनावश्यक पदार्थ जो शरीर के लिए हानिकारक हो सकते हैं- पसीने के साथ बाहर निकल आते हैं। इस प्रकार शरीर स्वस्थ रहता है।

हानि : प्रातःकाल की सैर, तैराकी, योगाभ्यास, खेल जैसे-क्रिकेट, बेडमिंटन, कबड्‌डी इत्यादि यह सभी व्यायाम के साधन हैं। अपनी रुचि और इच्छा के अनुसार हम किसी भी व्यायाम का चयन कर सकते हैं। आवश्यक यह है कि व्यायाम नियमित रूप से किया जाय। जोश में एक दिन क्षमता से अधिक व्यायाम कर लेने से हम थक जाएँगे। इसलिए चार दिन तक शरीर हिला न पाएँ, ऐसा नहीं होना चाहिए। तुरन्त किसी चिकित्सक को दिखाना चाहिए। किसी कुशल व्यक्ति के निर्देशन में ही व्यायाम करना चाहिए।

 निष्कर्ष : व्यायाम की आदत बचपन से ही डालनी चाहिए। स्वस्थ जीवना ही आनंद का स्रोत है। स्वस्थ व्यक्ति ही धनोपार्जन कर सकता है तथा सभी प्रकार के सुखों का भोग भी कर सकता है।

     संचार क्रांति

भूमिका : प्रगति के पथ पर मानव बहुत दूर चला आया है। आज संसार मानव की मुट्ठी में समाया है। जीवन के क्षेत्रों में सबसे अधिक क्रांतिकारी कदम ‘संचार’ के क्षेत्रों में उठाए गए हैं।

संचार क्रांति का स्वरूप: संचार साधनों में सबसे अहम् भूमिका ‘इन्टरनेट’ की है। इसकी शुरूआत 1969 में एडवान रिचर्स प्रोजेन्टस एजेंसिज द्वारा संयुक्त राज्य अमेरिका के चार विश्वविद्यालयों के कम्प्यूटरों की नेटवर्किंग कर की गई।

संचार क्रांति से लाभ: 1971 तक इस कम्पनी ने लगभग दो दर्जन कम्प्यूटरों को इस नेट से जोड़ दिया। 1972 में ई-मेल की शुरूआत हुई जिसने ‘संचार जगत’ में क्रांति ला दी। इसका उपयोग तेजी से हमलोग फेस बुक, व्हाट्सएप, इन्स्टाग्राम, वीडियो कॉलिंग, चेटिंग कर सकते हैं।

संचार क्रांति से हानि: सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ‘गूगल’ सर्च के द्वारा जीवनोपयोगी कोई भी सवाल का उत्तर जान सकते हैं। धीरे-धीरे इन्टरनेट के क्षेत्र में भूचाल आ गया। 1994 में नेट स्कैप कम्यूनिकेशन और 1995 में ‘माइक्रोसॉफ्ट’ के ब्राउजर बाजार में उपलब्ध हो गए। लगभग 05 करोड़ लोगों ने इन्टरनेट का प्रयोग शुरू कर दिया है। दिन-प्रतिदिन संचार माध्यम के नए-नए रास्ते खुलते गए। नई-नई शब्दावलियाँ जैसे ई-मेल, वेबसाइट, वायरस, लवबग आदि इससे जुड़ते गए। अब तो लोग मोबाइल में ही लगे रहते हैं पढ़ाई न कर पाते। बड़ी दुर्घटना मोबाइल पर वयस्त रहने के कारण बढ़ गई है। बच्चे मोवाइल के चक्कर में पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। कुछ जाहिल लोग मोबाइल पर धमकी भी देने लगे हैं।

निष्कर्ष : अब तो ऐसा लगता है कि रोटी, कपड़ा, मकान की तरह इन्टरनेट भी जीवन के लिए उपयोगी हो गया। इसके अभाव में हम अपने आप को अपाहिज, समझने लगते हैं। 

  सत्यवादिता

परिभाषा : सत्यवादिता दृष्टि का प्रतिबिम्ब है, जान की प्रतिलिपि है, आत्मा की वाणी है। सत्यवादिता के लिए केवल निष्कपट मन चाहिए। एक झूठ के लिए हजारों झूठ बोलने पड़ते हैं, झूठ की लम्बी श्रृंखला मन में बैठानी पड़ती है।

इसी बात को शास्त्र ने समझाया है-

सत्यं ब्रूयात, प्रियं ब्रूयात, न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्

अर्थात् सच बोलो, पर प्रिय यानी भली मंशे से सच बोलो; अप्रिय यानी बुरी मंशे से सच कभी न बोलो।

महत्ता : संसार में जितने महान व्यक्ति हुए हैं, सबने सत्य का सहारा लिया है- सत्य की उपासना की है। चन्द्र टरै, सूरज टरै, टरै जगत-व्यवहार के उद्घोषक राजा हरिश्चन्द्र की सत्यनिष्ठा जगद्विख्यात है। महात्मा गाँधी ने सत्य की शक्ति से ही विदेशी शासन की जड़ काट दी। उनका कथन है-सत्य एक विशाल वृक्ष है, उसकी ज्यों-ज्यों सेवा की जाती है, त्यों-त्यों उसमें अनेक फल आते हुए नजर आते हैं; उसका अंत नहीं होता वस्तुतः, सत्य-भाषाण और सत्य-पालन के अमित फल होते हैं।

  सत्य बोलने का अभ्यास बचपन से ही करना चाहिए। कभी-कभी झूठ बोलने से कुछ क्षणिक लाभ हो जाता है। बच्चे झूठ बोलकर माँ-बाप से पैसे झींट लेते हैं, पढ़ाई का बहाना करके सिनेमा चले जाते हैं, किन्तु यह क्षणिक लाभ उनके जीवन-विकास का मार्ग अवरुद्ध कर देता है- उनके चरित्र में छिद्र होने लगता है और रिसता हुआ चरित्र कभी महान हो नहीं सकता ।                                                        झूठ बोलनेवालों के प्रति लोगों का विश्वास उठ जाता है। उनकी उपेक्षा सर्वत्र होती है। उनकी उन्नति के द्वार बंद हो जाते हैं। कभी-कभी तो उन्हें अपनी बेशकीमती जिन्दगी से भी हाथ धोना पड़ता है। क्या आपने उस चरवाहे लड़के की कहानी नहीं सुनी है जो भेड़िया आया-भेड़िया आया कहकर लोगों को उल्लू बनाता था? जो झूठ की मूठ पकड़कर दूसरों का शिकार करते हैं वे खुद ही शिकार हो जाते हैं।

सत्य की महिमा अपार है। बाइबिल का कथन है- यदि तुम सत्य जानते हो, तो सत्य तुम्हें मुक्त कर देगा। सत्य महान और परम शक्तिशाली है। संस्कृति की सूक्तियाँ हैं ‘सत्यमेव जयते, नानतम्’ तथा ‘नहि सत्यात् परो धर्मः’ ‘सत्य की ही विजय होती है, असत्य की नहीं तथा सत्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं। जॉन मेंसफील्ड की धारणा है कि सत्य की नाव से ही हम मृत्युसागर का संतरण कर सकते हैं।

पायथैगोरस की उक्ति है कि सत्य ईश्वर की आत्मा है, किन्तु इससे आगे बढ़कर उन्होंने यह भी कहा कि सत्य ही ईश्वर है। हमारे यहाँ ईश्वर को सत्य कहा गया।

 उपसंहार : सत्य सदा परिकल्पना से दृढ़-दृढ़तर होता है। इस पर ही संसार का ज्ञान-विज्ञान आधारित है। सारा मानव समाज इसकी धुरी पर ही कायम है। जिस समाज में खाली झूठ ही झूठ का प्रचलन हो, वह समाज कभी समाज रह न पाएगा। सत्य के पथ में भले खाइयाँ मिले, किन्तु उस पथ से विचलित होना ठीक नहीं है। सत्य के खिलाफ बोलना ईश्वर के खिलाफ बोलना है-उसे दुःखित करना है। असत्य बोलनेवाले प्रभु के प्रिय तो होते नहीं, उलटे दंड के भागी बनते हैं। सत्य से बढ़कर कोई पुण्य नहीं और असत्य से बढ़कर कोई पाप नहीं।

  हमारे पड़ोसी

भूमिका: पास-पड़ोस के वैसे लोग जिनसे हमारा नजदीक का संबंध होता है पड़ोसी कहलाते हैं। पड़ोसी हमें अकेला नहीं छोड़ते। अतः इनके साथ मधुर एवं सही संबंध रखना जरूरी है।

सम्पन्न पड़ोसी : कुछ पड़ोसी धनी होते हैं। ये थोड़ा घमंडी होते हैं। किंतु इन्हे भी हमें कद्र करनी चाहिए। धन आता-जाता है, संबंध के साथ ऐसी बात नहीं है।

गरीब पड़ोसी : गरीब पड़ोसी दूसरे की भलाई एवं दुखों में साथ निभाते हैं। उन्हें जीवन की सरलता पसंद होती है। ऐसे पड़ोसी विनम्र एवं सहायक गुण वाले होते हैं।

हमारा कर्त्तव्य : अमीर या गरीब कैसा भी पड़ोसी हो, हमें इनसे अच्छे संबंध रखने चाहिए। आपसी सौहार्द्र की भावना जीवित रखनी चाहिए। एक-दूसरे की मदद करनी चाहिए। मैं ऐसा ही करता हूँ। यही मेरा कर्त्तव्य है।

उपसंहार: अकेला मनुष्य कुछ नहीं है। अतः मनोरंजन, सहयोग, सेवा, साथ के लिए पड़ोसी का जीवन में बहुमूल्य योगदान है। हमें अपने पड़ोसियों से अच्छे संबंध रखना चाहिए। 

Leave a Comment