प्राचीन भारत के इतिहास को जानने के लिए मुख्य रूप से तीन स्रोतों का उपयोग किया जाता है:
- पुरातात्विक स्रोत
- साहित्यिक स्रोत (धार्मिक एवं लौकिक साहित्य)
- विदेशी यात्रियों के विवरण
पुरातात्विक स्त्रोत
अभिलेख
पुरातात्विक स्रोतों के अंतर्गत सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्रोत अभिलेख है। अभिलेख पाषाण शिलाओं, स्तम्भों, ताम्रपत्रों, दीवारों तथा मुद्राओं पर उत्कीर्ण हैं तथा अभिलेखों के अध्ययन को ‘एपीग्राफी’ कहते हैं।
सर्वाधिक प्राचीन अभिलेख मध्य एशिया के (1400 ई. पू.) ‘बोगजकोई’ नामक स्थान से मिले। इसमें इन्द्र, मित्र, वरुण और नासत्य देवताओं के नाम मिलते हैं। जबकि भारत में सबसे प्राचीन अभिलेख अशोक के हैं, जो 300 ई.पू. के लगभग के हैं।
भारतीय पुरातत्व विभाग का जनक ‘सर अलेक्जेण्डर कनिंघम’ को कहा जाता है। तथा भारतवर्ष का सर्वप्रथम उल्लेख हाथीगुम्फा अभिलेख में मिलता है।
यवन राजदूत हेलिओडोरस का बेसनगर (विदिशा) से गरुड़ स्तम्भ लेख प्राप्त होता है, जिसमें मध्य भारत में भागवत धर्म के विकसित होने का प्रमाण मिलता है।
‘दुर्भिक्ष’ शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख सोहगौरा अभिलेख में मिलता है। एरण (मध्य प्रदेश) से प्राप्त वराह भगवान पर हूणराज तोरमाण का लेख अंकित है तथा सती प्रथा का पहला लिखित साक्ष्य मिलता है।
रेशम बुनकर की श्रेणियों की जानकारी मंदसौर अभिलेख से प्राप्त होती है।
डॉ. डी.आर. भण्डारकर ने अभिलेखों के अध्ययन के आधार पर मौर्य शासक अशोक का इतिहास लिखा।
प्राचीन भारत के राजाओं की प्रशंसा में रचित शिलालेख को प्रशस्ति कहते हैं।
महत्वपूर्ण अभिलेख एवं शासक
| क्रम | अभिलेख | शासक / विशेषता |
| 1 | हाथीगुम्फा अभिलेख | कलिंग राजा खारवेल (तिथि रहित अभिलेख) |
| 2 | जूनागढ़ (गिरनार) अभिलेख | रुद्रदामन (सुदर्शन झील की जानकारी) |
| 3 | नासिक अभिलेख | गौतमी पुत्र सातकर्णि (सातवाहनों की उपलब्धियाँ) |
| 4 | प्रयाग स्तम्भ अभिलेख | समुद्रगुप्त (दिग्विजयों की जानकारी) |
| 5 | ऐहोल अभिलेख | पुलकेशिन द्वितीय |
| 6 | मंदसौर अभिलेख | मालवा नरेश यशोवर्मन (रेशम बुनकर श्रेणी) |
| 7 | ग्वालियर अभिलेख | गुर्जर प्रतिहार वंश का इतिहास |
| 8 | भितरी एवं जूनागढ़ अभिलेख | स्कंदगुप्त (हूणों पर विजय का विवरण) |
| 9 | देवपाड़ा अभिलेख | विजयसेन (बंगाल शासक) |
| 10 | बांसखेड़ा एवं मधुबन | हर्षवर्धन की उपलब्धियाँ |
| 11 | बालाघाट एवं कार्ले | सातवाहनों की उपलब्धियाँ |
| 12 | अयोध्या अभिलेख | शुंगों की उपलब्धियाँ |
| 13 | भरहुत अभिलेख | शुंगों द्वारा निर्मित |
| 14 | एरण अभिलेख | भानुगुप्त (सती प्रथा का प्रथम साक्ष्य) |
सिक्के
सिक्कों के अध्ययन को ‘मुद्राशास्त्र’ कहते हैं। पुराने सिक्के ताँबा, चाँदी, सोना और सीसा धातु के बनते थे। प्राचीनतम सिक्कों को आहत सिक्के कहा जाता है, जिन्हें साहित्य में ‘कार्षापण’ कहा गया है। सर्वप्रथम सिक्कों पर यवन शासकों ने लेख लिखने का कार्य किया।
कनिष्क के सिक्कों से उसके बौद्ध धर्म के अनुयायी होने का प्रमाण मिलता है।
इण्डो-यूनानी तथा इण्डो-सीथियन शासकों के इतिहास के प्रमुख स्रोत सिक्के हैं।
आरम्भिक सिक्के अधिकतर चाँदी के होते थे, जबकि ताँबे के सिक्के बहुत कम थे। ये सिक्के पंचमार्क सिक्के कहलाते थे।
रोमन सिक्के अरिकमेडू (पुदुचेरी के पास) से प्राप्त हुए हैं।
उत्तर भारतीय मंदिरों की कला शैली ‘नागर शैली’ कहलाती है तथा दक्षिण भारतीय मंदिरों की कला शैली ‘द्रविड़ शैली’ कहलाती है। जबकि जिन मंदिरों में नागर एवं द्रविड़ दोनों शैलियों का प्रयोग हुआ है, वे ‘बेसर शैली’ के मंदिर कहलाते हैं।
कुषाण काल, गुप्तकाल और गुप्तोत्तर काल में निर्मित मूर्तियों से जन-साधारण की धार्मिक आस्थाओं और मूर्तिकला का ज्ञान मिलता है।
भरहुत, बोधगया, साँची और अमरावती की मूर्तिकला में जन-सामान्य के जीवन की यथार्थ झाँकी मिलती है।
अजन्ता गुफा में उत्कीर्ण ‘माता और शिशु’ तथा ‘मरणासन्न राजकुमारी’ जैसे चित्रों की शाश्वतता सर्वकालिक है, जिससे गुप्तकालीन कला और तत्कालीन जीवन की झलक मिलती है।
साहित्यिक स्रोत
वैदिक साहित्य
इसके अंतर्गत वेद तथा उनसे संबंधित ग्रंथ, पुराण, महाकाव्य और स्मृतियाँ आती हैं। भारत के सबसे प्राचीन ग्रंथ ‘वेद’ का शाब्दिक अर्थ ‘ज्ञान’ है। श्रवण परम्परा में सुरक्षित होने के कारण इन्हें ‘श्रुति’ भी कहा जाता है। वेदों के संकलनकर्ता महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास माने जाते हैं। वेद कुल चार हैं— ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद तथा अथर्ववेद।
- ऋग्वेद — ब्राह्मण साहित्य में सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद है। ऋग्वेद में ‘ऋक’ का अर्थ छन्दबद्ध मंत्र है। ऋचाओं के क्रमबद्ध संग्रह को ऋग्वेद कहा जाता है। इसमें 10 मंडल, 1028 सूक्त और 10,462 ऋचाएँ हैं। ऋचाओं को पढ़ने वाले ऋषि को ‘होत’ कहते हैं। विश्वामित्र द्वारा रचित तीसरे मंडल में सूर्य देवता ‘सावित्री’ को समर्पित प्रसिद्ध गायत्री मंत्र है। इसके 9वें मंडल में ‘सोम देवता’ का उल्लेख है।
बाद में जोड़े गए 10वें मंडल में पहली बार ‘शूद्र’ का उल्लेख किया गया, जिसे ‘पुरुष सूक्त’ कहा जाता है। इसके अनुसार चार वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र) आदि पुरुष ब्रह्मा के मुख, भुजा, जंघा और चरणों से उत्पन्न हुए। ऋग्वेद में इन्द्र के लिए 250 तथा अग्नि के लिए 200 ऋचाओं की रचना की गई है। वामनावतार के तीन पगों के आख्यान का प्राचीनतम स्रोत भी ऋग्वेद है।
यूनेस्को ने 2007 में ऋग्वेद की 30 पांडुलिपियों को ‘मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड रजिस्टर’ में शामिल किया।
- यजुर्वेद — ‘यजु’ का अर्थ ‘यज्ञ’ है। यजुर्वेद में यज्ञों के नियमों और विधि-विधानों का संकलन मिलता है। इसके मंत्रों का उच्चारण करने वाला पुरोहित ‘अध्वर्यु’ कहलाता है। यह गद्य और पद्य दोनों शैली में रचित है। यजुर्वेद कर्मकाण्ड प्रधान है। इसके दो भाग हैं— (अ) कृष्ण यजुर्वेद (ब) शुक्ल यजुर्वेद।
- सामवेद — ‘साम’ का अर्थ ‘संगीत’ है। इसमें यज्ञों के अवसर पर गाए जाने वाले मंत्रों का संकलन है। इसके मंत्रों को गाने वाला ‘उद्गाता’ कहलाता है। इसे भारतीय संगीत का जनक कहा जाता है।
सामवेद में कुल 1875 ऋचाएँ हैं, जिनमें से 75 को छोड़कर शेष ऋग्वेद से ली गई हैं। इसकी प्रमुख शाखाएँ— कौथुमीय, जैमिनीय तथा राणायनीय हैं।
- अथर्ववेद — अथर्वा ऋषि इसके प्रथम द्रष्टा माने जाते हैं, इसी कारण इसका नाम अथर्ववेद पड़ा। इसके दूसरे द्रष्टा आंगिरस ऋषि थे, इसलिए इसे ‘अथर्वांगिरस वेद’ भी कहा जाता है। इसे ‘भैषज वेद’ भी कहा जाता है। इसमें सर्वप्रथम सती प्रथा का उल्लेख मिलता है।
इसकी रचना सबसे अंत में हुई। इसमें 20 काण्ड, 731 सूक्त और 5987 मंत्र हैं। लगभग 1200 मंत्र ऋग्वेद से लिए गए हैं।
यह भौतिकवादी वेद है। इसमें सामान्य मनुष्यों के विचारों तथा अंधविश्वासों का विवरण मिलता है। इसमें जादू, टोने, टोटके का उल्लेख किया गया है। इसमें चिकित्सा पद्धतियों व औषधियों का उल्लेख किया गया है। इसका उपवेद ‘शिल्पवेद’ है। इस वेद में आर्य एवं अनार्य सभ्यता एवं संस्कृति का प्रभाव दिखाई देता है। अथर्ववेद में ‘परीक्षित’ को कुरूओं का राजा कहा गया है। इसमें सभा एवं समिति को प्रजापति की दो पुत्रियाँ कहा गया है। पृथ्वीसूक्त अथर्ववेद का प्रतिनिधि सूक्त माना जाता है।
चारों वेदों के एक-एक उपवेद भी है ऋग्वेद का उपवेद आयुर्वेद, सामवेद का उपवेद गंधर्ववेद, यजुर्वेद का उपवेद धनुर्वेद और अथर्ववेद का उपवेद अर्थशास्त्र है।
ब्राह्मण साहित्य
इनकी रचना वैदिक संहिताओं की व्याख्या करने हेतु सरल गद्य में की गई। ब्रह्म का अर्थ ‘यज्ञ’ है, अतः यज्ञ के विषयों का प्रतिपादन करने वाले ग्रंथ ‘ब्राह्मण’ कहलाते हैं। ऐतरेय में राज्याभिषेक के नियम एवं प्राचीन राजाओं के नाम दिये गये हैं।
शतपथ ब्राह्मण में गान्धार, शल्य, कैकेय, कुरू, पाँचाल, कोशल, विदेह आदि राजाओं के नाम का उल्लेख है।
ब्राह्मण ग्रंथ
| वेद | उपनिषद् | उपवेद | ब्राह्मण ग्रंथ |
| ऋग्वेद | ऐतरेय, कौषीतकी | आयुर्वेद | ऐतरेय एवं कौषीतकी ब्राह्मण |
| यजुर्वेद | कठ, श्वेताश्वतर, ईश, तैत्तिरीय, मैत्रायणी, वृहदारण्यक | धनुर्वेद | शतपथ एवं तैत्तिरीय ब्राह्मण |
| सामवेद | छान्दोग्य, केन | गन्धर्ववेद | षडविंश ब्राह्मण (इसे ताण्ड्य ब्राह्मण भी कहते हैं) |
| अथर्ववेद | मुण्डक, प्रश्न, माण्डूक्य | शिल्पवेद | गोपथ ब्राह्मण |
आरण्यक साहित्य
इनकी रचना जंगलों (अरण्य) में पढ़ाये जाने के कारण इन्हें आरण्यक कहा जाता है। यह ब्राह्मण ग्रंथ का अंतिम भाग है, जिसमें दार्शनिक एवं रहस्यात्मक ज्ञान के विषयों का वर्णन किया गया है।
आरण्यक कुल सात हैं- (1) ऐतरेय (2) शांखायन (3) तैत्तिरीय (4) मैत्रायणी (5) माध्यन्दिन (6) तत्वकार (7) छान्दोग्य।
उपनिषद्- (108) – उपनिषद् का शाब्दिक अर्थ है- उप-समीप, नि-निष्ठापूर्वक, सद्-बैठना। अर्थात् (दार्शनिक व रहस्यात्मक ज्ञान के लिए) गुरू के समीप निष्ठापूर्वक बैठना। इसे ‘वेदान्त’ भी कहा जाता है। क्योंकि यह वेदों का अन्तिम भाग है। इनका सम्बन्ध दर्शनशास्त्र से है। उपनिषद् मुख्यतः ज्ञानमार्गी रचनायें हैं।
उपनिषदों की कुल संख्या 108 मानी गई हैं किन्तु प्रमाणिक उपनिषद् 12 है।
12 उपनिषद्- 1. ईश 2. केन 3. कठ 4. प्रश्न 5. मुण्डक 6. माण्डूक्य 7. तैत्तिरीय 8. ऐतरेय 9. छान्दोग्य 10. श्वेताश्वतर 11. कौषीतकी 12. वृहदारण्यक
शंकराचार्य ने आरम्भिक दस उपनिषदों का भाष्य लिखा है। कठोपनिषद् में यम व नचिकेता का संवाद है। छान्दोग्य उपनिषद् में बौद्ध धर्म का पंचशील सिद्धान्त व श्रीकृष्ण का प्राचीनतम उल्लेख मिलता है।
भारत का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य ‘सत्यमेव जयते’ मुण्डकोपनिषद् से लिया गया है। जाबालोपनिषद् में चारों आश्रमों व्यवस्था का उल्लेख मिलता है। ऐतरेय उपनिषद् में बौद्ध धर्म का आष्टांगिक मार्ग का उल्लेख है। वृहदारण्यक उपनिषद् में अहम-ब्रह्मास्मि, पुनर्जन्म का सिद्धान्त एवं याज्ञवलक्य गार्गी संवाद का वर्णन है।
वेदांग- वैदिक साहित्य को समझने हेतु इसकी रचना की गई है। इनकी संख्या छः है।
- शिक्षा- वैदिक स्वरों के शुद्ध उच्चारण हेतु शिक्षा का निर्माण हुआ।
- कल्प- ये ऐसे कल्प (सूत्र) होते हैं जिनमें विधि एवं नियम का उल्लेख है।
- व्याकरण- इसमें नामों एवं धातुओं की रचना, उपसर्ग एवं प्रत्यय के प्रयोग, समासों एवं सन्धि आदि के नियम बताए गए हैं।
- निरुक्त- शब्दों की उत्पत्ति का शास्त्र है, यह एक प्रकार का भाषा-विज्ञान है।
- छन्द- वैदिक मंत्र प्रायः छंद बद्ध हैं। छंद शास्त्र पर पिङ्गलमुनि का ग्रंथ ‘छन्द सूत्र’ उपलब्ध है।
- ज्योतिष- इसमें ज्योतिषशास्त्र के विकास को दिखाया गया है। ज्योतिष में कुल 44 श्लोक हैं, सबसे प्राचीनतम आचार्य मगध मुनि है।
सूत्र- वैदिक साहित्य को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए सूत्र साहित्य का प्रणयन किया गया। ऐसे सूत्र जिनमें विधि और नियमों का प्रतिपादन किया जाता है, कल्पसूत्र कहलाते हैं। कल्पसूत्रों के तीन भाग हैं।
श्रौत सूत्र- यज्ञ सम्बन्धी नियम।
गृह्य सूत्र- लौकिक एवं पारलौकिक कर्त्तव्यों का विवेचन।
धर्म सूत्र- धार्मिक, सामाजिक एवं राजनैतिक कर्त्तव्यों का विवेचन।
प्रमुख सूत्रकारों में गौतम, बौद्धायन, आपस्तम्भ, वशिष्ठ आदि के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। गौतम धर्म सूत्र सबसे प्राचीन है।
पुराण- पुराण का शाब्दिक अर्थ ‘प्राचीन आख्यान’ होता है। पुराणों की संख्या 18 है। पुराणों की रचना लोमहर्ष एवं उग्रश्रवा ने की। पाँचवीं से चौथी शताब्दी ई.पू. में पुराण ग्रंथ अस्तित्व में आ चुके थे।
अमरकोश में पुराणों के पाँच विषय बताए गये हैं। मार्कण्डेय, ब्रह्मा, वायु, विष्णु, भागवत और मत्स्य सबसे प्राचीन पुराण हैं। वायु पुराण- गुप्त वंश, विष्णु पुराण- मौर्य वंश और मत्स्य पुराण- आन्ध्र सातवाहन से संबंधित है। मत्स्य, वायु, विष्णु, भागवत, ब्रह्म पुराण में ही राजाओं की वंशावली पायी जाती है।
सामाजिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से ‘अग्निपुराण’ का काफी महत्त्व है, जिसमें राजतंत्र के साथ-साथ कृषि संबंधी विवरण भी दिया गया है।
सर्वप्रथम ‘पार्जीटर’ ने पुराणों के ऐतिहासिक महत्त्व को पढ़ा।
वेद, उपनिषद्, पुराण और धर्मसूत्र संस्कृत भाषा में लिखे गए हैं।
वैदिक भजनों या मंत्रों के संग्रह को संहिता कहा जाता है।
स्मृति साहित्य
मनुस्मृति- प्राचीनतम स्मृति। शुंग व सातवाहन वंश की जानकारी मिलती है। जर्मन दार्शनिक ‘नीत्शे’ कहता है- ‘बाइबिल को जला दो, मनुस्मृति को अपनाओ।’ टीकाकार- भारूचि, मेधातिथि, गोविंदराज, कुल्लूक भट्ट।
याज्ञवल्क्य स्मृति- टीकाकार विश्वरूप, विज्ञानेश्वर, अपरार्क।
नारद स्मृति- इसमें “दासों की मुक्ति” का उल्लेख है।
कात्यायन- इसमें आर्थिक गतिविधियों का उल्लेख है।
बौद्ध साहित्य
सबसे प्राचीन बौद्ध ग्रंथ त्रिपिटक है। यह पालि भाषा में रचित है।
त्रिपिटक- 1. विनय पिटक 2. सुत्त पिटक 3. अभिधम्म पिटक।
बुद्ध की शिक्षाओं को संकलित कर इन्हें तीन भागों में बाँटा गया। इन त्रिपिटकों की रचना बुद्ध के निर्वाण प्राप्त करने के बाद हुई। बुद्ध के पूर्व जन्म की कथाओं को ‘जातक’ कहा जाता है। निकायों में बौद्ध धर्म के सिद्धान्त व कहानियों का संग्रह है।
हीनयान का प्रमुख ग्रंथ ‘कथावस्तु’ है, जिसमें महात्मा बुद्ध का जीवन-चरित्र अनेक कथानकों के साथ उल्लेखित है।
जैन साहित्य
जैन साहित्य को आगम (सिद्धांत) कहा जाता है। यह प्राकृत भाषा में लिखे गये हैं। जैन आगमों में सबसे महत्त्वपूर्ण बारह अंग (12) हैं। जिसमें 12 अंग, 12 उपांग, 10 प्रकीर्ण, 6 छेदसूत्र, 4 मूलसूत्र, अनुयोग सूत्र एवं नन्दी सूत्र की गणना की जाती है।
जैनधर्म का प्रारंभिक इतिहास ‘कल्पसूत्र’ से ज्ञात होता है जिसकी रचना ‘भद्रबाहु’ ने की थी। आचारांग सूत्र में जैन भिक्षुओं के आचार नियमों का उल्लेख है।
भगवती सूत्र में महावीर के जीवन की शैलियों पर प्रकाश पड़ता है। जैन ग्रंथों में सबसे महत्त्वपूर्ण हेमचन्द्र कृत ‘परिशिष्ट पर्व’ है, जिसकी रचना 12वीं शताब्दी में हुई।
लौकिक साहित्य (अन्य साहित्य)
ऐतिहासिक रचनाओं में सर्वप्रथम उल्लेख ‘अर्थशास्त्र’ का किया जाता है। अर्थशास्त्र भारत का पहला राजनीतिक ग्रंथ है, इसकी रचना कौटिल्य (चाणक्य) ने की। यह 15 अधिकरण व 180 प्रकरण में विभक्त है। यह मौर्यकालीन इतिहास व राजनीति के ज्ञान के लिए एक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है।
संस्कृत साहित्य में ऐतिहासिक रचनाओं में सर्वाधिक महत्व कश्मीरी कवि कल्हण द्वारा रचित ‘राजतरंगिणी’ का है। इसमें 8 सर्ग हैं, जिन्हें तरंग कहा गया है। इसमें कश्मीर के शासकों का वर्णन है और संस्कृत साहित्य में ऐतिहासिक घटनाओं के क्रमबद्ध इतिहास लिखने का प्रथम प्रयास है।
एक ज्योतिष ग्रंथ ‘गार्गी संहिता’ है, इसमें भारत पर होने वाले यवन आक्रमण का उल्लेख मिलता है।
‘अष्टाध्यायी’ व्याकरण की प्रथम पुस्तक है जिसके लेखक ‘पाणिनि’ हैं। इसमें पहली बार ‘लिपि’ शब्द का प्रयोग हुआ है। इसमें मौर्य से पूर्व का इतिहास तथा मौर्यकाल की राजनीतिक अवस्था की जानकारी प्राप्त होती है।
13वीं शताब्दी के आरम्भ में अरब लोगों ने अरबी में सिन्ध का इतिहास लिखा जिसका फारसी अनुवाद ‘चचनामा’ नामक पुस्तक में है।
विदेशी यात्रियों के विवरण
विदेशी यात्रियों से मिलने वाली प्रमुख जानकारी भारत में आने वाले विदेशी यात्रियों एवं लेखकों के विवरण से भी प्राप्त होती है, जिनमें अनेक यूनानी, रोमन, अरबी और चीनी यात्री सम्मिलित हैं।
(A) यूनानी-रोमन लेखक-
भारतीय स्रोत से हमें सिकन्दर के आक्रमण (325 ई.पू.) की कोई जानकारी नहीं मिलती, इसीलिए हमें यूनानी स्रोतों पर ही आश्रित रहना पड़ता है। सिकंदर के समकालीन एक भारतीय राजा ‘सेण्ड्रोकोट्स’ का नाम मिलता है, जिसका उल्लेख यूनानी लेखकों ‘स्ट्रेबो’ व ‘जस्टिन’ ने किया है।
एरियन तथा प्लूटॉर्क ने उसे ‘एण्ड्रोकोट्स’ तथा फिलार्कस ने ‘सेण्ड्रोकोट्स’ के नाम से उल्लेख किया है।
स्ट्रेबो, डियोडोरस, प्लिनी और एरियन नामक यूनानी विद्वान ‘क्लासिकल’ लेखक के रूप में जाने जाते हैं।
- टेसियस – यह ईरानी राजवैद्य था।
- हेरोडोटस – इसे “इतिहास का पिता” कहा जाता है। इसने अपनी पुस्तक ‘हिस्टोरिका’ 5वीं शताब्दी ई.पू. में लिखी, जिसमें भारत-फारस संबंधों का वर्णन है।
- निर्याकस, आनेसिक्रिटस, अरिस्टोबुल्स – ये सभी लेखक सिकन्दर के समकालीन थे तथा इनका विवरण अधिक प्रमाणिक व विश्वसनीय था।
- टॉल्मी – दूसरी शताब्दी में ‘भारत का भूगोल’ नामक पुस्तक लिखी। टॉल्मी की ‘ज्योग्राफी’ व ‘पेरिप्लस ऑफ द एरिथियन सी’ नामक पुस्तक में भारतीय बंदरगाहों व व्यापारिक वस्तुओं का वर्णन है।
- डायोनिसियस – मिस्र नरेश टालेमी फिलाडिल्फस के राजदूत के रूप में अशोक के दरबार में आया था।
- डाइमेकस – सीरियाई राजा ‘एन्टिओकस’ के राजदूत के रूप में बिन्दुसार के दरबार में रहा था।
- मेगस्थनीज – सेल्यूकस निकेटर के राजदूत के रूप में 14 वर्षों तक चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में रहा। इसकी पुस्तक ‘इण्डिका’ में मौर्यकालीन समाज व संस्कृति के बारे में बताया गया है।
- प्लिनी – इसकी पुस्तक ‘नेचुरल हिस्टोरिका’ (ईसा की प्रथम सदी) लैटिन भाषा में है, जिसमें भारत व इटली के मध्य होने वाले व्यापार, वनस्पतियों व खनिजों का वर्णन है।
(B) चीनी (लेखक) यात्रियों के विवरण-
भारत में आने वाले अधिकांश चीनी यात्री बौद्ध मतानुयायी थे। इनमें प्रमुख हैं-
- फाह्यान – यह गुप्त नरेश चंद्रगुप्त द्वितीय ‘विक्रमादित्य’ (375-415 ई.) के दरबार में भारत आया। 399 से 414 ई. तक उसने भारत के विभिन्न स्थानों का भ्रमण किया। उसने गुप्तकालीन भारत की सामाजिक, धार्मिक तथा आर्थिक स्थिति का विवरण दिया।
- ह्वेनसांग – सातवीं सदी में हर्ष के शासनकाल में भारत आया। वह भारत में 16 वर्षों तक रहा। 6 वर्ष तक उसने नालन्दा विश्वविद्यालय में अध्ययन किया। उसका यात्रा विवरण ‘सी-यू-की’ नाम से प्रसिद्ध है, जिसमें 138 देशों का विवरण है। यह हर्षकालीन भारतीय स्थिति जानने का महत्त्वपूर्ण स्रोत है।
- ह्वी ली – इसके द्वारा लिखित ह्वेनसांग की जीवनी से भी हर्षकालीन इतिहास का विवरण ज्ञात होता है।
- मा त्वान लिन – हर्ष के पूर्वी अभियान का विवरण।
- इत्सिंग – सातवीं शताब्दी के अन्त में भारत आने वाले इस चीनी यात्री ने नालंदा तथा विक्रमशिला विश्वविद्यालय और अपने समय की भारत स्थिति का वर्णन किया है।
- सुंग युन – यह 518 ई. में भारत आया। अपने 3 वर्षों की यात्रा में बौद्ध धर्म की प्राप्तियाँ एकत्रित कीं।
(C) अरबी लेखक-
- अलबरूनी – ग्यारहवीं शताब्दी में महमूद गजनवी के साथ भारत आया। अलबरूनी ने अपनी पुस्तक ‘तहकीक-ए-हिन्द’ (किताब-उल-हिन्द अर्थात् भारत की खोज) में राजपूतकालीन समाज, धर्म, रीति-रिवाज पर सुंदर प्रकाश डाला। अलबरूनी को महमूद द्वारा बंदी बनाया गया था, बाद में उसकी योग्यता से प्रभावित होकर उसे ‘राज ज्योतिषी’ बना दिया गया। यह रवीना (उज्बेकिस्तान) का था।
- सुलेमान – 9वीं शताब्दी में भारत आया और तत्कालीन प्रतिहार शासकों तथा पाल शासकों के विषय में लिखा।
- अलमसूदी – 10वीं सदी में बगदादी यात्री अलमसूदी भारत में आया। यह राष्ट्रकूट व प्रतिहार शासकों की जानकारी देता है।
- इब्नबतूता – इसने अपना यात्रा वृत्तांत अरबी भाषा में लिखा, जिसे ‘रेहला’ कहा जाता है। 14वीं शताब्दी में (1333 ई. में) दिल्ली पहुँचने पर इससे प्रभावित होकर सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक ने उसे दिल्ली का काजी (न्यायाधीश) नियुक्त किया।
(D) अन्य लेखक-
- तारानाथ – एक तिब्बती लेखक हैं। इन्होंने ‘कंग्युर’ तथा ‘तंग्युर’ नामक ग्रंथ की रचना की। इनसे भारतीय इतिहास के बारे में जानकारी मिलती है।
- मार्कोपोलो – यह 13वीं शताब्दी के अन्त में पाण्ड्य देश की यात्रा पर आया था। इसका विवरण पाण्ड्य इतिहास के अध्ययन के लिए उपयोगी है।
प्राचीन भारत
परिचय
अतीत काल की घटनाओं की स्थिति की जानकारी देने वाले शास्त्र को ही हम ‘इतिहास’ कहते हैं। प्राचीन भारतीय इतिहास की विशद सामग्री को सरल एवं समझने योग्य बनाने के लिए इतिहासकारों ने इसे तीन भागों में बाँटा है-
- प्रागैतिहासिक काल
- आद्य ऐतिहासिक काल
- ऐतिहासिक काल
प्रागैतिहासिक काल
इस काल का इतिहास पूर्णतः पुरातात्विक साधनों पर निर्भर है। इस काल में मनुष्यों के कोई लिखित साधन (साक्ष्य) उपलब्ध नहीं हैं। इसीलिए इसे प्रागैतिहासिक काल कहा जाता है।
आद्य ऐतिहासिक काल
इतिहास का ऐसा काल जिसके लिए लेखन कला के प्रमाण तो हैं, लेकिन वे या तो अपुष्ट हैं या उनकी लिपि को समझना कठिन है, ऐसे काल को ‘आद्य ऐतिहासिक’ काल कहते हैं।
इस काल के इतिहास लेखन के लिए साहित्यिक एवं पुरातात्विक साधनों का प्रयोग किया जाता है। इस काल के अंतर्गत 2500 ई.पू. से 600 ई.पू. के मध्य का काल आता है।
ऐतिहासिक काल
जिस काल के लिए लिखित सामग्री उपलब्ध है और जिसमें मानव सभ्य बन चुका था, उस काल के अंतर्गत 600 ई.पू. के बाद का काल आता है, जिसे ‘ऐतिहासिक काल’ कहते हैं।