प्रागैतिहासिक काल (प्राक् + इतिहास)

प्रागैतिहासिक काल को ‘प्रस्तर युग’ भी कहते हैं। भारत में पाषाणकालीन सभ्यता की खोज सर्वप्रथम 1863 ई. में हुई, जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के विद्वान रॉबर्ट ब्रूस फुट ने ‘पल्लवरम’ (मद्रास) से पूर्व-पाषाण कालीन उपकरण (पत्थर की हाथ की कुल्हाड़ी) प्राप्त किया।

तुरान मध्य एशिया में स्थित प्रागैतिहासिक मानव बस्ती, ऐतिहासिक भौगोलिक क्षेत्र या संस्कृति को संदर्भित करता है।

ब्रिटिश भू-वैज्ञानिक और पुरातत्वविद् रॉबर्ट ब्रूस फुट ने जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया के लिए भारत में इतिहास-पूर्व स्थानों का भू-विज्ञान संबंधी सर्वेक्षण किया था। इन्हें भारत में इतिहास-पूर्व अध्ययन का संस्थापक माना जाता है।

विद्वानों का विचार है कि इस सभ्यता का उदय और विकास ‘अतिनूतन’ काल (प्लायोसीन युग) में हुआ।

अब तक की जानकारी के अनुसार 400 करोड़ वर्ष पुरानी पृथ्वी की चार अवस्थाओं में से चौथी और अंतिम अवस्था के दो भाग हैं-

  1. अतिनूतन

  2. अद्यतन (होलोसीन)

अतिनूतन काल दस लाख वर्ष से दस हजार वर्ष पूर्व तक माना जाता है तथा अद्यतन युग आज से लगभग दस हजार वर्ष पूर्व आरम्भ हुआ।

मानव सभ्यता के इस प्रारम्भिक काल को सुविधानुसार तीन भागों में बाँटा गया है-

  1. पुरा-पाषाण काल (5,00,000 ई.पू. – 50,000 ई.पू.) – आखेटक व खाद्य संग्राहक

  2. मध्य-पाषाण काल (10,000 ई.पू. – 7000 ई.पू.) – आखेटक व पशुपालक

  3. नव-पाषाण काल या उत्तर पाषाण काल (9000 ई.पू. (विश्व) व 7,000 ई.पू. (भारत) से 2500 ई.पू. तक)

पुरा-पाषाण काल

प्रागैतिहासिक काल का समय 5,00,000 ई.पू. से 2500 ई.पू. तक माना जाता है।

भारत में पुरापाषाण युगीन सभ्यता का विकास प्लाइस्टोसीन या हिम युग से हुआ।

पुरा-पाषाण काल के मानव की जीविका का मुख्य आधार आखेट (शिकार) था और शिकार ही इस काल में आदि मानव के मनोरंजन का साधन था।

इसका प्रमाण कुल्हाड़ी (हैंड एक्स), विदारणी (क्लीवर) और गंडासा (खंडक) के उपयोग से मिलता है, जिनके अवशेष पंजाब की सोहन नदी घाटी, उत्तर प्रदेश की बेलन घाटी, राजस्थान के डीडवाना तथा नर्मदा घाटी से प्राप्त हुए हैं।

कर्नाटक में स्थित हुनासागी से चूना पत्थर, बलुआ पत्थर, डोलोराइट, क्वार्टजाइट आदि पत्थरों से बने पुरापाषाणकालीन उपकरण मिले हैं।

भीमबेटका (मध्य प्रदेश) की गुफाओं में तत्कालीन मनुष्यों के आवास के अवशेष मिले हैं, किंतु उस समय मानव आखेटक जीवन जीता था, इसलिए स्थायी निवास का अभाव था।

मध्यप्रदेश के नर्मदा नदी घाटी में स्थित हथनोरा गाँव से 70 हजार वर्ष पुरानी ‘होमो इरेक्टस’ मानव की खोपड़ी के अवशेष 5 दिसम्बर 1982 को डॉ. अरूण सोनकिया द्वारा प्राप्त किए गए। यहाँ से हाथी, घोड़ा, दरियाई घोड़ा तथा जंगली भैंसों के जीवाश्म भी मिले हैं।

ये लोग शिकार द्वारा प्राप्त जानवरों के माँस तथा फल-सब्जियों और कंद-मूल पर जीवन व्यतीत करते थे। उच्च पुरापाषाण युग में ज्ञानी मानव (होमोसेपियन्स) का प्रवेश हुआ।

आग का आविष्कार (खोज) पुरापाषाण काल में हुआ, परंतु उस समय मानव इसका प्रयोग करना नहीं जानते थे।

मध्य-पाषाण काल

मध्य-पाषाण कालीन मानव शिकार करके, मछली पकड़कर तथा जंगली कंद-मूल का संग्रह कर अपना पेट भरते थे। इस युग के उपकरण बहुत छोटे हो गए थे, इसलिए इन्हें “माइक्रोलिथ” कहा जाता था।

मध्य प्रदेश के आदमगढ़ तथा राजस्थान के बागोर से पशुपालन के सबसे प्राचीन साक्ष्य मिले हैं।

संभवतः प्रथम मानव अस्थि-पंजर मध्य-पाषाण काल से ही प्राप्त हुआ है। उत्तर प्रदेश के ‘सराय नाहर’ तथा ‘महवहा’ नामक स्थानों से मानव कंकाल के अवशेष मिले हैं।

नव-पाषाण काल (अन्न उत्पादक युग)

नव-पाषाण काल में मानव में स्थायी निवास की प्रवृत्ति विकसित हुई। उसने सबसे पहले कुत्ते को पालतू बनाया। नवपाषाण की प्राचीनतम बस्ती पाकिस्तान के बलूचिस्तान में स्थित ‘मेहरगढ़’ में है। मेहरगढ़ से कृषि के प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। यहाँ के लोग गेहूँ, जौ और रूई की खेती करते थे।

इलाहाबाद (प्रयागराज) के निकट कोल्डिहवा से चावल उगाने के प्रमाण मिले हैं। नवपाषाण युग के लोग प्राचीनतम कृषक समुदाय के थे। वे मिट्टी और सरकंडे से बने गोलाकार या आयताकार घरों में रहते थे। वे कृषि के साथ-साथ पशुपालन भी करते थे तथा गाय, बैल और बकरी पालते थे।

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज के बेलन नदी घाटी में स्थित महदहा स्थल से पशुबाड़े के साक्ष्य मिले हैं। यहाँ से भेड़, बकरी, हिरण और जंगली सुअर की हड्डियों के अवशेष तथा मिट्टी की सतह पर मवेशियों के खुरों के निशान मिले हैं, जो पशुपालन के प्रमाण हैं।

इस युग में पालिशदार पाषाण उपकरणों (हथियारों) का प्रयोग किया जाता था। विशेष रूप से पत्थर की कुल्हाड़ी का उपयोग होता था, जिसे ‘सेल्ट’ कहा जाता था। इसके अतिरिक्त सूक्ष्म पाषाण फलकों का भी प्रयोग किया जाता था।

बुर्जहोम से अनेक प्राचीन भूमिगत गर्त-आवास प्राप्त हुए हैं। यहाँ से पाँच जंगली कुत्तों और बारहसिंगों के सींगों के अवशेष भी मिले हैं। बुर्जहोम तथा गुफकराल (कश्मीर) से विभिन्न प्रकार के मृदभाण्ड तथा बड़ी मात्रा में हड्डियों से बने उपकरण प्राप्त हुए हैं। यहाँ कब्रों में कुत्तों को उनके मालिकों के साथ दफनाया जाता था।

नवपाषाण काल में सर्वप्रथम पहिए का प्रयोग हुआ तथा आग का नियमित उपयोग प्रारंभ हुआ।

बिहार के सारण जिले में गंगा नदी के तट पर स्थित चिरांद एक प्रमुख नवपाषाणकालीन स्थल है। यहाँ से हड्डियाँ, गेहूँ की बालियाँ, पत्थर के औजार तथा सींग से बने औजार प्राप्त हुए हैं।

नवपाषाणकालीन स्थल संगनकल्लू (बेल्लारी, कर्नाटक) से राख के टीले मिले हैं। पिक्लीहल (कर्नाटक) से राख के ढेर एवं निवास-स्थल के प्रमाण प्राप्त हुए हैं। उत्तर प्रदेश के चोपानीमांडो से मधुमक्खी के छत्ते जैसी झोपड़ियाँ एवं हस्तनिर्मित मृदभाण्ड मिले हैं। असम के सारूतारू से आदिम कुल्हाड़ियाँ और चित्रित मृदभाण्ड प्राप्त हुए हैं।

ताम्र-पाषाण काल (Chalcolithic Age)

ताम्र-पाषाण युग को ‘चालकोलिथिक युग’ भी कहा जाता है। इस काल के लोग मुख्यतः ग्रामीण समुदाय के थे और देश के उन भागों में बसे थे, जहाँ पहाड़ी भूमि और नदियाँ थीं।

मनुष्य ने सर्वप्रथम ताँबे धातु का प्रयोग किया तथा उससे बनाया जाने वाला प्रथम औजार कुल्हाड़ी था।

भारत में इस काल से संबंधित स्थल दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, पश्चिमी मध्य प्रदेश, पश्चिमी महाराष्ट्र तथा दक्षिण-पूर्वी भारत में पाए गए हैं।

राजस्थान में ‘आहड़’ और ‘गिलंड’ (बनास घाटी) में उत्खनन हुआ है। महाराष्ट्र में भीमा नदी की सहायक नदी घाट के तट पर स्थित इनामगाँव ताम्र-पाषाण काल की एक बड़ी बस्ती थी। यह बस्ती किलाबंद थी और खाई से घिरी हुई थी। इसका संबंध जोर्वे संस्कृति से था।

महाराष्ट्र में गोदावरी नदी की सहायक प्रवरा नदी के तट पर स्थित जावें गाँव एक ताम्रपाषाणकालीन स्थल है। यहाँ से जावें संस्कृति के अवशेष मिले हैं। इसका समयकाल 1400 ई.पू. से 700 ई.पू. माना जाता है। यह संस्कृति मुख्यतः पश्चिमी महाराष्ट्र में विकसित हुई। इसके प्रमुख स्थल सानेगाँव, इमामगाँव, चन्दोली, जावें, नासिक और दायमाबाद हैं।

ताम्रपाषाणकालीन स्थल नेवासा (महाराष्ट्र) से पटसन के प्रथम साक्ष्य तथा लाल तल पर काली डिजाइन वाले चाक-निर्मित बर्तनों के प्रमाण मिले हैं। नवदाटोली (मध्य प्रदेश) से चित्रित काले मृदभाण्ड प्राप्त हुए हैं। दायमाबाद (महाराष्ट्र) से कलश शवाधान तथा घरों के नीचे कलश रखने के प्रमाण मिले हैं। दायमाबाद सबसे बड़ा ताम्रपाषाणिक स्थल है।

नवदाटोली का उत्खनन कार्य एच. डी. साकलिया ने किया था। ताम्रवती (राजस्थान) से सफेद रेखीय चित्रों से सजे काले मृदभाण्ड प्राप्त हुए हैं।

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