पल्लव राजवंश — प्रारम्भिक पल्लव शासकों के उल्लेख उनके प्राकृत तथा संस्कृत अभिलेखों में प्राप्त होते हैं। पल्लव राजवंश की स्थापना उस समय हुई जब सातवाहन शक्ति का पतन हो रहा था। पल्लव का शाब्दिक अर्थ ‘पत्ता/पान’ (Leaf) होता है। पल्लव शासक ब्राह्मण थे लेकिन अभिलेखों में स्वयं को क्षत्रिय बताते हैं। पल्लव वंश का संस्थापक ‘वप्पदेव’ (तीसरी-चौथी सदी में) था। वप्पदेव ने आंध्र प्रदेश एवं ताण्डैमण्डलम् पर शासन किया। सिंहविष्णु को पल्लव वंश का वास्तविक संस्थापक कहा जाता है। इसे ‘आदि पुरुष’ भी मानते हैं।
सिंह विष्णु (सिंहवर्मन) को अवनिसिंह तथा सिंहविष्णुपोतरयण के नाम से जाना जाता है। सिंहविष्णु के दरबार में लेखक ‘भारवि’ रहते थे। लेखक भारवि ने ‘किरातार्जुनीयम्’ की रचना की थी। इसमें अर्जुन एवं किरात/शिकारी (शिव) की कहानी है। सिंह विष्णु वैष्णव धर्मानुयायी थे। उसके समय में मामल्लपुरम् में वराह मंदिर का निर्माण हुआ। सिंहविष्णु द्वारा चोलों की पराजय का वर्णन वैलूर पालैयम् ताम्रपत्र से मिलता है।
महेन्द्र वर्मन प्रथम (600-630 ई.) सिंहविष्णु का पुत्र तथा उत्तराधिकारी था। वह पल्लव वंश के महानतम शासकों में था। महेन्द्रवर्मन विद्वान था; वह एक कवि एवं संगीतज्ञ था। महेन्द्रवर्मन ने ‘मतविलास’ व ‘गुणभर’ उपाधियाँ ग्रहण की थीं। महेन्द्रवर्मन युद्ध और शान्ति दोनों में समान रूप से महान था। महेन्द्रवर्मन ने ‘मत्तविलास प्रहसन’ नामक हास्य ग्रंथ की रचना की थी। इसमें बौद्ध भिक्षु एवं कापालिकों पर व्यंग्य किया गया है। इस पुस्तक को भारत की प्रथम व्यंग्यात्मक पुस्तक माना जाता है। महेन्द्रवर्मन ने शैव संत अप्पर के प्रभाव में जैन धर्म त्यागकर शैव मत ग्रहण कर लिया।
महेन्द्रवर्मन प्रथम को पुलकेशिन द्वितीय से पराजित होना पड़ा। पल्लव वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक नरसिंह वर्मन प्रथम (630-668 ई.) हुआ। नरसिंह वर्मन ने पुलकेशिन द्वितीय (चालुक्य) को तीन युद्धों में पराजित किया। इसकी जानकारी हमें अभिलेखों से मिलती है। नरसिंह वर्मन प्रथम ने ‘माम्मलपुरम्’ नामक नगर बसाया जो वर्तमान में महाबलिपुरम् नाम से प्रसिद्ध है। इसने ‘माम्मल’ तथा ‘वातापीकोण्ड’ की उपाधि धारण की। नरसिंह वर्मन प्रथम का पराक्रमी सेनापति ‘शितोण्ड’ था।
महाबलिपुरम् के कुछ एकाश्मक रथों का निर्माण कार्य नरसिंहवर्मन प्रथम के काल में शुरू हुआ। रथ मंदिरों की संख्या सात है तथा सबसे छोटा द्रोपदी रथ है, जिसमें किसी प्रकार का अलंकरण नहीं है।
महाबलिपुरम् उसके राज्य का प्रमुख बंदरगाह था।
उसके शासनकाल में चीनी यात्री हेनसांग कांची गया था। उसके अनुसार कांची के लोग विद्या-प्रेमी, उत्साही एवं सत्यवादी थे।
नरसिंह वर्मन प्रथम के श्रीलंका विजय का वर्णन काशावकुड़ी ताम्रपत्र तथा महावंश में मिलता है।
चालुक्य नरेश विक्रमादित्य को परमेश्वर वर्मन प्रथम ने पराजित किया। परमेश्वर वर्मन प्रथम शैव धर्म के अनुयायी थे। उन्होंने अत्यन्तकाम, रणंजय, लोकादित्य, गुणभाजन, उग्रदण्ड एवं विद्याविनीत की उपाधियाँ धारण कीं। परमेश्वर वर्मन प्रथम ने मामल्लपुरम् में गणेश मंदिर बनवाया।
नरसिंह वर्मन द्वितीय (राजासिंह 680-720 ई.) परमेश्वर वर्मन का पुत्र तथा उत्तराधिकारी था। इसके शासनकाल में कला और साहित्य के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण प्रगति हुई। नरसिंह वर्मन द्वितीय ने कांची के कैलाशनाथ मंदिर तथा महाबलिपुरम् के शोर मंदिर का निर्माण करवाया। संस्कृत के प्रख्यात लेखक ‘दण्डिन’ उसकी राजसभा में थे। उन्होंने ‘दशकुमारचरित’ की रचना की थी। नरसिंह वर्मन द्वितीय की प्रिय उपाधियाँ राजसिंह, शंकर भक्त तथा आगमप्रिय थीं। नरसिंह वर्मन द्वितीय ने चीनी यात्रियों के लिए नागपट्टनम में एक विहार निर्मित करवाया था।
परमेश्वर वर्मन द्वितीय की आकस्मिक मृत्यु के बाद पल्लव राज्य में संकट उत्पन्न हो गया क्योंकि उसका कोई वैध उत्तराधिकारी नहीं था।
कांची के लोगों ने समानान्तर शाखा के एक राजकुमार नन्दिवर्मन द्वितीय को राजा बनाया। नन्दिवर्मन द्वितीय शैव मतानुयायी थे और कला व साहित्य को प्रोत्साहन दिया। उन्होंने कांची के मुक्तेश्वर मंदिर और बैकुण्ठ पेरूमल मंदिर का निर्माण करवाया। प्रसिद्ध वैष्णव संत तिरूमंगई आलवार उसका समकालीन था। अपराजित पल्लव वंश का अंतिम महत्त्वपूर्ण शासक था। दक्षिण में वैष्णव आंदोलन का प्रारम्भ सर्वप्रथम पल्लवों के राज्य से हुआ तथा बाद में दक्षिण के अन्य भागों में पहुँचा। पल्लव राजाओं का शासनकाल नयनारों तथा आलवारों के भक्ति आंदोलनों के लिए प्रसिद्ध रहा।
संगम युग
संगम का शाब्दिक अर्थ साहित्यकारों की सभा (परिषद्) या संघ (मण्डली) होता है। इसका समयकाल पहली से तीसरी शताब्दी है।
नोट: रामशरण शर्मा के अनुसार संगम काल तीसरी से छठी शताब्दी है।
तमिल साहित्य के संकलन के उद्देश्य से संगमों का आयोजन किया गया। पाण्ड्य शासकों के संरक्षण में कुल तीन संगम आयोजित किए गए।
प्रथम संगम — स्थान: मदुरै। अध्यक्षता: ऋषि अगस्त्य। 89 पाण्ड्य राजाओं का संरक्षण। भाग लेने वाले 549 संस्थान और 7 कवि, 4499 लेखक। इस संगम की एक भी पुस्तक उपलब्ध नहीं है। अगस्त्य ऋषि एवं ब्राह्मण कौडिन्य को वैदिक परम्परा (आर्य संस्कृति) को दक्षिण भारत में ले जाने का श्रेय दिया जाता है।
द्वितीय संगम — स्थान: कपाटपुरम (वर्तमान अलवै — समुद्र में विलीन)। अध्यक्षता: अगस्त्य ऋषि; उनके पश्चात् तोलकाप्पियर। 59 पाण्ड्य राजाओं का संरक्षण। भाग लेने वाले 49 अकादमी सदस्य, 3700 कवि। यह 3700 वर्ष तक चला। ‘तोलकाप्पियम्’ की रचना तोलकाप्पियर ने की, जो एक प्राचीन तमिल व्याकरण ग्रंथ है। इसके तीन भाग हैं — (i) इलुथू (वर्ण विचार), (ii) सोल (वाक्य विचार), (iii) पारूल (वस्तु विचार)।
तृतीय संगम — स्थान: उत्तरी मदुरै। अध्यक्षता: नक्कीरर। 1850 वर्ष तक चला। इसमें 49 पाण्ड्य राजा, 49 संस्थान और 449 कवि थे। इस संगम की पुस्तकें — वरि, वेरिसै, पदितुप्पत्तु, परिपाडल आदि। तृतीय संगम में जैन, बौद्ध एवं हिन्दू तीनों सम्प्रदायों के लोगों ने भाग लिया।
| लेखक (रचनाकार) | ग्रंथ (पुस्तक) | मुख्य विषयवस्तु / विवरण |
| इलांगो आडिगल | शिल्प्पदिकारम् (नुपूर की कहानी) | इसमें 30 सर्ग हैं। कोवलन, उसकी पत्नी कण्णगी और नर्तकी माधवी की मार्मिक प्रेम कहानी और न्याय की कथा। |
| सीतलै सतनार | मणिमेकलै | यह ‘शिल्प्पदिकारम्’ की अगली कड़ी है। इसमें कोवलन और माधवी की पुत्री ‘मणिमेकलै’ तथा राजकुमार उदयकुमारन की कथा है। यह बौद्ध धर्म से प्रभावित है। |
| तिरुतक्क देवर | जीवक चिन्तामणि | इसे ‘विवाह ग्रंथ’ भी कहते हैं। इसमें नायक जीवक के आठ विवाहों और अंत में जैन धर्म अपनाकर साधु बनने का वर्णन है। |
| तिरुवल्लुवर | तिरुक्कुरल (कुरल) | इसे ‘तमिल साहित्य का बाइबल’ या ‘पंचम वेद’ कहा जाता है। इसमें धर्म, अर्थ और काम (त्रिवर्ग) का अद्भुत दर्शन है। |
| तोलकाप्पियर | तोलकाप्पियम् | यह उपलब्ध प्राचीनतम तमिल व्याकरण ग्रंथ है। यह केवल व्याकरण ही नहीं, बल्कि उस समय की सामाजिक-आर्थिक स्थिति भी बताता है। |
| रुद्रशर्मन | अहनानूरू | यह 400 प्रेम कविताओं का संग्रह है। |
नोट : संगम साहित्य के काव्य को दो भागों में बाँटा गया है अकम और पुरम। अकम काव्यों का मूल विषय प्रेम प्रसंग है जबकि पुरम काव्यों का विषय युद्ध है।
संगम काल की प्रमुख फसलें गन्ना, धान एवं रागी थी।
संगम काल में चावल मुख्य खाद्यान्न था।
संगम काल की राजधानी में एक राजसभा होती थी जिसे ‘नालवै’ कहा जाता था, जिसमें प्रजा की कठिनाइयों पर विचार किया जाता था।
राजा का सर्वोच्च न्यायालय राजा की सभा ‘मनरम’ ही होता था, राजा का जन्मदिन प्रतिवर्ष मनाया जाता था जिसे ‘पेरूनल’ कहते थे।
चोरी तथा व्याभिचार के अपराध के लिए मृत्युदण्ड दिया जाता था, झूठी गवाही देने पर जीभ काट ली जाती थी। भूमिकर राजस्व का प्रमुख साधन था, भू-राजस्व दर उत्पादन का 1/6 भाग था।
नोट : संगम साहित्य में हमें दक्षिण भारत के तीन राज्यों चेर, चोल तथा पाण्ड्य का उल्लेख प्राप्त होता है। दक्षिण-पश्चिम में चेर, उत्तर-पूर्व में चोल तथा दक्षिण-पूर्व में पाण्ड्य राज्य स्थित था।
चेर राजवंश का प्रतीक चिन्ह ‘धनुष’ था, इसने एक बड़ी पाकशाला का निर्माण करवाया तथा महाभारत के युद्ध में भाग लेने वाले योद्धाओं का भोज करवाया।
नेदुन जरेल ने ‘मरन्दै’ को अपनी राजधानी बनाया और अनेक यवन व्यापारियों को कैद कर लिया और बड़ी धनराशि हर्जाने के रूप में वसूल किया।
शेनगुट्टुवन को ‘लाल चेर’ भी कहा जाता है। इसने ‘अधिराज’ की उपाधि ग्रहण की। कल्लि, वलावन, सेम्बिदास जैसे नामों से प्रसिद्ध चोल राज्य पूर्वी तमिलनाडु में पेन्नार तथा वेल्लारू नदियों के मध्य स्थित था।
मेगस्थनीज के अनुसार पाण्ड्य राज्य पर ‘हेराकल’ की पुत्री का शासन था और वह राज्य मोतियों के लिए प्रसिद्ध था।
मेगस्थनीज ने सर्वप्रथम पाण्ड्यों का उल्लेख किया है।
पाण्ड्य राज्य की राजधानी ‘मदर’ थी तथा इसका प्रतीक चिन्ह ‘मछली’ थी।
पाण्ड्यों का उल्लेख रामायण व महाभारत काल में भी मिलता है।
संगम काल के राज्यों में सर्वाधिक शक्तिशाली चोलों का राज्य था।
वेगी नदी पाण्ड्यों की जीवन रेखा थी।
पाण्ड्यों, चोलों, केरों व कलभ्रों को विक्रमादित्य द्वितीय ने पराजित किया।
चोल राजवंश
चोल का प्राचीनतम उल्लेख कात्यायन ने किया है। इनका प्रतीक चिन्ह ‘बाघ’ था।
चोल की राजधानी उरैयर तथा तंजाब बनी।
करिकाल चोल शासकों में सबसे महान शासक था, इसका शाब्दिक अर्थ है “जले हुए पैरों वाला”।
इसने चोलों की तटीय राजधानी आधुनिक कावेरी पटनम (पुहार) की स्थापना की तथा कावेरी नदी के किनारे 160 किमी. लम्बा बाँध बनवाया।
करिकाल को ‘पेरूनानुन्नुपादे’ ग्रंथ में संगीत के सप्तस्वरों का विशेषज्ञ बताया गया है।
करिकाल वैदिक धर्म अनुयायी था। इसने ब्राह्मण धर्म को राजकीय संरक्षण प्रदान किया।
संगमकालीन साहित्यों में दो चोल नरेशों का प्रमुख रूप से उल्लेख मिलता है—
(i) करिकाल
(ii) कोच्चेनगनान
चोल राष्ट्र पैन्नार और कावेरी नदियों के बीच पूर्वी समुद्र तट पर स्थित था।
चोल राजवंश का उदय नौवीं शताब्दी में हुआ। इसकी स्थापना विजयालय (850-887 ई.) ने की। उसने तंजौर पर अधिकार करके ‘नरकेसरी’ की उपाधि धारण की और तंजौर को अपनी राजधानी बनाया।
विजयालय ने निशुम्भसूदिनी देवी का मंदिर बनवाया।
आदित्य प्रथम ने पल्लवों को पराजित करके चोलों की स्वतंत्र सत्ता स्थापित की और ‘कोदण्डराम’ की उपाधि धारण की।
द्राविड़ देश में चोल आधिपत्य की स्थापना वास्तव में परान्तक प्रथम (907-953 ई.) के समय में हुई।
राजराज प्रथम (985 ई.) के राज्यारोहण के समय चोल इतिहास की महानता का युग प्रारम्भ हुआ।
उसने तंजौर में बृहदेश्वर (राजराजेश्वर) मंदिर का निर्माण करवाया।
राजेन्द्र प्रथम ने गंगा घाटी अभियान की सफलता पर ‘गंगकौण्ड चोल’ की उपाधि धारण की और ‘गंगकॉण्डचोलपुरम्’ नामक नई राजधानी की स्थापना की।
चोल साम्राज्य की प्रशासनिक इकाइयाँ—
राज्य, मण्डल, वलनाडू, नाडु, कुर्रम या कोट्टयम।
नाडु की स्थानीय सभा को नट्टार तथा व्यापारिक संघ की सभा को नगरट्टार (नगरम्) कहते थे।
महासभा को पेरूंगुरिं, इसके सदस्यों को पेरूमक्कल तथा समिति के सदस्यों को वारियप्पेरूमक्कल कहा जाता था।
राज्य की आय का प्रमुख साधन भूमिकर था। कृषि उत्पादन का 1/3 भाग भू-राजस्व के रूप में वसूल किया जाता था।
ब्राह्मणों को दी गई भूमि को चतुर्वेदि मंगलम् तथा दान दी गई भूमि को ब्रह्मदेय कहा जाता था।
चोल सेना के प्रमुख तीन अंग थे—
पदाति, गजारोही एवं अश्वारोही।
चोल काल में सोने के सिक्के को ‘काश’ कहा जाता था।
चोल कालीन स्थापत्य कला का सर्वश्रेष्ठ नमूना भगवान नटराज की मूर्ति है।
वृहदेश्वर मंदिर तंजौर में स्थित है और शिव को समर्पित है।
चोल द्रविड़ शैली की मुख्य विशेषता— विमान।
चोल मंदिर निर्माण कला की मुख्य विशेषताएँ— ऊँचे विमान, मण्डप, गोपुरम्, कलापूर्ण स्तम्भों से युक्त वृहत्सदन।
राजस्व से संबंधित शब्दावली
| शब्दावली | अर्थ / विवरण |
| इराई (Irai) | भू-राजस्व / लगान: यह उपज का 1/6 भाग होता था। |
| कडमई (Kadamai) / पाडु | राजा को देय भूमिकर: वह निश्चित भाग जो किसान राजा को देता था। |
| इरावु (Iravu) | जबरन उपहार: राजा द्वारा प्रजा से जबरन लिया जाने वाला उपहार। |
| उल्कु (Ulku) / सुंगम | चुंगी एवं सीमा शुल्क: व्यापारिक वस्तुओं पर लगाया जाने वाला कर। |
| इखें वेट्टी (Iravu Vetti) | बेगार / जबरन श्रम: अतिरिक्त या बिना पारिश्रमिक के लिया जाने वाला काम। |
| वरियम (Variyam) | उपज पर कर: कर वसूलने वाली इकाई या उपज पर लिया जाने वाला हिस्सा। |
| कडमई / पाडुवडु | राजकीय शुल्क: राजा को अदा किया जाने वाला अन्य विशेष शुल्क। |
नोट: ‘कर‘ अदा करने वाले क्षेत्र की एक प्रसिद्ध इकाई ‘वरियमवारि’ थी। जिसका
अर्थ ‘कर‘ था।
चोल शिलालेखों में वर्णित भूमियां-
पल्लिच्वंदम जैन संस्थाओं को दान की गई भूमि।
ब्रह्मादेय- ब्राह्मणों को दान-उपहार में दी गई भूमि। शालाभोग स्कूलो के रख-रखाव के लिए दी गई भूमि।
वेल्लनवगाई- गैर ब्राह्मण किसानों को दी गई भूमि।
तिरूनामट्टक्कानी- मंदिरों को भेंट की गई जमीन।
संगमकालीन शासकों के पास पेशेवर सैनिक होते थे तथा चतुरंगिणी होती थी जो
अश्व, गज, रथ तथा पैदल सिपाही सैनिक होते थे। सेना के कप्तान को ‘एनाडि’ की उपाधि दी जाती थी।
संगम काल में समय जानने के लिए जल घड़ी का प्रयोग किया जाता था।
नोट-संगमकालीन समाज, 1. अडनर (ब्राह्मण वर्ग), 2. अरसर (शासक वर्ग)
- वेगिनर (व्यापारी वर्ग), 4. वेल्लाल (कृषक वर्ग)
तमिल भूमि में ब्राह्मण का दर्शन सबसे पहले संगम युग में होता है। इस काल में ब्राह्मण माँस खाते थे और ताड़ी (सूरा) पीते थे, जो समाज में बुरा नहीं माना जाता था।
अरिकमेडू व्यापारिक केन्द्र के रूप में प्रसिद्ध था तथा चोलवंश का एक प्रमुख बन्दरगाह भी था।
पेरिप्लस में अरिकमेडू को ‘पेडाके’ कहा गया है।
सिन्ध से कन्याकुमारी तक चौबीस बंदरगाहों का उल्लेख ‘पेरिप्लस ऑफ द इरिनियन
सी’ यूनान लेखक की पुस्तक में मिलता है।
दरबारों में गायकों के साथ नर्तकियाँ नाचती थी, जिन्हें ‘पाणर’ या ‘विडैलियर’ कहा जाता था।
संगम काल में कृषक को वेल्लार तथा उनके प्रमुखों को ‘वेलरि’ कहा जाता था। खेत-मजदूर का काम सबसे निचले वर्ग के लोग ‘कडैसियर’ करते थे।
एनियर शिकारियों की जाति थी। मुरगन यकी यवन लोगों के निवास स्थान को कहते थे।
संगम काल में चोलों की समृद्धि का मुख्य कारण उनका ‘सुविकसित वस्त्रोद्योग ‘था।
आन्ध्रप्रदेश में गोट्टीप्रोलू नामक पुरातात्विक स्थल है जो प्राचीन काल में समुद्री व्यापार का केन्द्र था।
नोट: सर्वप्रथम मानसून की खोज ‘हिप्पोलस’ ने की थी, हिप्पोलस ने मानसूनी हवाओं के सहारे बड़े जहाजों से सीधे समुद्र पार करने की विधि खोजी थी।
राजा की सहायता हेतु नियुक्त अधिकारियों का समूह पाँच परिषदों में विभाजित था। जिन्हें पाँच महासभाओं के नाम से जाना जाता है।
मंत्री अमियचार, पुरोहित पुरोहित्तर, सेना नायक राजदूत – दूतार, गुप्तचर ओर्रार सेनापतियार, दूत या
कल्याणी के चालुक्य कल्याणी के चालुक्य वंश का संस्थापक तैलंग द्वितीय (973-997 ई.) था। तैलंग द्वितीय ने अश्वमत और भुवनैकमल्ल की उपाधि धारण की।
कल्याणी के चालुक्य वंश के प्रमुख शासक हुए-तैलप प्रथम, तैलप द्वितीय, विक्रमादित्य, जयसिंह, सोमेश्वर, सोमेश्वर-II,
विक्रमादित्य-VI, सोमेश्वर-III एवं तैलप तृतीय।
सोमेश्वर प्रथम 1043 ई. में शासक बना, उसने अपनी राजधानी मान्यखेत से कल्याणी
में स्थानान्तरित की।
विक्रमादित्य-VI कल्याणी के चालुक्य वंश का सबसे महानतम् शासक था। उसकी राज्य सभा में ‘विक्रमांकदेवचरित’ के रचयिता विल्हण तथा ‘मिताक्षरा’
के लेखक विज्ञानेश्वर निवास करते थे। विल्हण उसके राजकवि थे। सोमेश्वर तृतीय की विजयों के अपेक्षा शान्ति के कार्यों में अधिक रूचि थी।
इस वंश का अंतिम शासक तैलंग तृतीय का पुत्र सोमेश्वर चतुर्थ था।
बारहवीं शताब्दी में कर्नाटक में एक नवीन आन्दोलन हुआ जिसका नेतृत्व चालुक्य राजा के दरबारी मंत्री बासवन्ना (1106-68) नामक ब्राह्मण ने किया ये जैन धर्म को मानने वाले थे।
वातापी के चालुक्य वंश-दक्षिणापथ पर चालुक्य वंश की (ईसा से छठी-आठवीं शताब्दी के मध्य तक) जिस शाखा का आधिपत्य रहा उसका उत्कर्ष स्थल
बादामी या वातापी (केरल) होने के कारण उसे वातापी चालुक्य कहा जाता है। बादामी के चालुक्य वंश की स्थापना पुलकेशिन प्रथम ने की थी। पहली राजधानी ऐहोल थी। महाकूट अभिलेख में पुलकेशिन प्रथम से पूर्व दो शासकों जयसिंह तथा रणराम के नाम मिलते हैं। पुल्केशिन। ने अश्वमेघ यज्ञ किया था।
कीर्तिवर्मन प्रथम (566-597 ई.) ने बनवासी के कदम्ब, कोंकण के मौर्य तथा वल्लरी-कर्नूल क्षेत्र के नलवंशी शासकों को पराजित कर उनके राज्य को अपने राज्य में मिलाया। वातापी का निर्माणकर्ता कीर्तिवर्मन को माना जाता है।
महाकूट स्तम्भ लेख में कीर्तिवर्मन प्रथम को बहुसुवर्ण अग्निष्टोम यज्ञ करने वाला
कहा गया है।
मंगलेश-वैष्णव धर्मानुयायी था उसे परम भागवत कहा गया है, उसने बादामी के गुहा मंदिरों का निर्माण पूरा कराया जिसका प्रारम्भ कीर्तिवर्मन के समय हुआ था। पुलकेशिन द्वितीय चालुक्य वंश के शासकों में सर्वाधिक योग्य तथा शक्तिशाली शासक था। उसने अपने चाचा मंगलेश तथा उनके समर्थकों की हत्या कर 609-10 ई. में बादामी के चालुक्य वंश की गद्दी पर बैठा। पुलकेशिन द्वितीय का हर्ष से नर्मदा नदी के तट पर युद्ध हुआ। इस युद्ध में पुलकेशिन द्वितीय ने 618 ई. में हर्ष को पराजित किया।
हर्षवर्धन को हराने के बाद ‘परमेश्वर’ की उपाधि धारण की। ऐहोल अभिलेख पुलकेशिन द्वितीय का है, यह लेख एक प्रशस्ति के रूप में है तथा
इसकी भाषा संस्कृत है। लिपि दक्षिणी ब्राह्मी हैं, इस लेख की रचना रवि कीर्ति ने की। अजन्ता के एक गुहाचित्र में फारसी दूत-मंडल को स्वागत करते हुए पुलकेशिन-।। को दिखाया गया है। पल्लव-चालुक्य संघर्ष का सूत्रपात इसी के शासन काल से शुरू होता है। पल्लव वंश का शासक इस समय महेन्द्र वर्मन था। 642 ई. में पल्लव वंश के शासक नरसिंह वर्मन प्रथम ने पुलकेशिन द्वितीय को कांची आक्रमण के युद्ध में पराजित किया और उसकी राजधानी बादामी पर अधिकार कर लिया। इस युद्ध में उसे लंका नरेश मानवर्मन से सहायता मिली थी। इसी युद्ध के बाद नरसिंह वर्मन ने ‘वातापिकोड’ की उपाधि धारण की थी।
मालवा को जीतने के बाद विनयादित्य ने सकलोतरपथनाथ की उपाधि धारण की। चालुक्य नरेश विक्रमादित्य द्वितीय ने पल्लव नरेश नन्दिवर्मा द्वितीय को पराजित करके कांचीकोण्डा की उपाधि धारण की।
त्रेलोकेश्वर मंदिर का निर्माण त्रैलोक्य महादेवी ने करवाया।
पट्टदकल के विरूपाक्षमहादेव मंदिर का निर्माण लोकमहादेवी ने करवाया। इस वंश का अंतिम शासक कीर्तिवर्मन द्वितीय था। इसे इसके सामंत दन्तिदुर्गा ने परास्त कर नये वंश (राष्ट्रकूट वंश) की स्थापना की।
वेंगी (आन्ध्र) के पूर्वी चालुक्य-पूर्वी चालुक्य (वेंगी) वंश की स्थापना पुलकेशिन द्वितीय के भाई विष्णुवर्द्धन ने की थी। विष्णुवर्द्धन ने 615 ई. से 633 ई. तक शासन किया। विष्णुवर्द्धन भागवत धर्म का अनुयायी था। वेंगी के चालुक्य वंश की राजधानी वेंगी (आंध्र प्रदेश) थी। इस वंश का सबसे प्रतापी शासक विजयादित्य तृतीय था। राष्ट्रकूट, पल्लवों एवं पाण्ड्यों को विजयादित्य ने पराजित किया।
राष्ट्रकूट वंश-दक्षिण में राष्ट्रकूटों का शासन पाल और प्रतिहार वंशों के शासन के समकालीन था।
राष्ट्रकूटों के अभिलेख में उनका मूल निवास स्थान लट्टलूर (आधुनिक लाटूर जिला वीदर) माना गया है। किन्तु बाद में एलिचपुर में इस वंश का राज्य स्थापित हुआ।
राष्ट्रकूट बादामी के चालुक्यों के सामन्त थे।
राष्ट्रकूट साम्राज्य का संस्थापक दन्तिवर्मन या दन्तिदुर्ग था, जिसने आठवीं शताब्दी के मध्य (752 ई.) चालुक्य शासक कीर्तिवर्मन को पराजित करके स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। उसने अपनी राजधानी मान्यखेत या मालखेत बनाई।
दन्तिवर्मन के बाद उसका चाचा कृष्ण प्रथम 756 ई. में शासक बना।
कृष्ण प्रथम विजेता होने के साथ-साथ एक निर्माता भी था उसने एलोरा के प्रसिद्ध कैलाश मंदिर (गुहा मंदिर) का निर्माण करवाया। चट्टानों को काटकर मन्दिर निर्माण करने का श्रेय राष्ट्र कूट वंश को दिया जाता है। गोविन्द द्वितीय के पश्चात् उसका पुत्र ध्रुव (धारावर्ष) 780 ई. में शासक बना।
ध्रुव प्रथम राष्ट्रकूट शासक था जिसने उत्तरी भारत के आधिपत्य के लिए चलाए जा रहे त्रिसत्तात्मक संघर्ष में दृढ़तापूर्वक हस्तक्षेप किया तथा प्रतिहार नरेश वत्सराज एवं पाल शासक धर्मपाल को पराजित किया।
संजन ताम्रपत्र के अनुसार गोविन्द तृतीय ने हिमालय तक सैनिक अभियान किया और मालवा, कोशल, कलिंग, वंग डाहल तथा प्रक को जीता। गोविन्द तृतीय ने पल्लव, पाण्ड्य, केरल तथा गंग राजाओं द्वारा बनाए गए संघ को ध्वस्त कर दिया। इसका काल राष्ट्रकूट शक्ति का चरमोत्कर्ष काल था। गोविन्द III ने पाल शासक धर्मपाल तथा प्रतिहार शासक नागभट्ट द्वितीय को पराजित किया। गोविन्द का अल्पवयस्क उत्तराधिकारी अमोघवर्ष (814-876 ई.) कर्क के संरक्षण में शासक हुआ। अमोघवर्ष का धर्म एवं साहित्य की ओर अतिशय रूझान था। अमोघवर्ष जैन मतानुयायी था। अमोघवर्ष विद्या और कला का उदार संरक्षक था। उसने ‘कविराज मार्ग’ नामक कन्नड़ भाषा में एक काव्य ग्रंथ की रचना की। उसने अपनी राजसभा में अनेक विद्वानों को आश्रय प्रदान किया। इनमें आदि पुराण के लेखक जिनसेन तथा गणितसार संग्रह के लेखक महावीराचार्य एवं स्वयंभू प्रमुख है। अमोघवर्ष ने
तुंगभद्रा नदी में जल-समाधि लेकर अपने जीवन का अंत किया। राष्ट्रकूटों के सर्वश्रेष्ठ शासक इन्द्र तृतीय (915-927 ई.) और कृष्ण तृतीय (939-965 ई.)
इन्द्र तृतीय अपने समय का अत्यन्त शक्तिशाली राजा हुआ। इन्द्र तृतीय के समय भारत भ्रमण पर आये हुए अरब यात्री अलमसूदी के अनुसार राष्ट्रकूट राजा बलहारा या बल्भराज भारत का सर्वश्रेष्ठ राजा था। राष्ट्रकूट वंश का अंतिम महान शासक कृष्ण तृतीय था।
कृष्ण तृतीय ने रामेश्वरम् में कृष्णेश्वर तथा गण्डमार्तण्डादित्य के मंदिर बनवाये। उसकी राजसभा में कन्नड़ भाषा का कवि पोन्न निवास करता था। जिसने शान्ति पुराण की रचना की थी।
एलोरा एवं एलिफेंटा (महाराष्ट्र) गुहामंदिरों का निर्माण राष्ट्रकूट शासकों के समय में ही हुआ।
राष्ट्रकूटों ने अपने राज्यों में मुसलमान व्यापारियों को बसने तथा इस्लाम के प्रचार की स्वीकृति दी थी।
974-75 ई. में चालुक्य राजा तैलप द्वितीय ने राष्ट्रकूट वंश के अंतिम शासक कर्क द्वितीय को पराजित किया और राष्ट्रकूट राज्य पर अधिकार कर लिया तथा कल्याणी के चालुक्य वंशीय राज्य की स्थापना की।
कोलथुनाडू, वल्लूनाड और थेक्कुमकूर प्राचीनकाल के अल्पकालीन राज्य-केरल
यादव वंश (देवगिरि)
देवगिरि के यादव वंश की स्थापना भिल्लम पंचम ने की। भिल्लम चालुक्य शासक सोमेश्वर चतुर्थ का सामंत था। इसने अपनी राजधानी देवगिरि में बनाई। उसने 1187-1191 ई. तक शासन किया। यादव वंश का सबसे शक्तिशाली राजा सिंघन था। उसने 1210 ई. से 1247 ई. तक शासन किया। सारंगदेव का संगीत रत्नाकर सिंघन के दरबार में लिखा गया। देवगिरि को 1309 ई. में अलाउद्दीन खिलजी द्वारा विजित कर लिया गया। यादव वंश का अंतिम स्वतंत्र शासक रामचन्द्र था।
द्वार समुद्र के होयसल वंश-होयसलों का मूल क्षेत्र मैसूर में गंगवाड़ी के पहाड़ी क्षेत्र में था। होयसल राज्य का वास्तविक संस्थापक विष्णुवर्द्धन था। होयसल यादव वंश से संबंधित थे, क्योंकि अपने को चन्द्रवंशी मानते थे। वेल्लूर में चेन्ना केशव मंदिर का निर्माण विष्णुवर्द्धन ने करवाया था। होयसल वंश का अंतिम शासक वीर बल्लाल तृतीय था। बल्लाल तृतीय ने अलाउद्दीन को वार्षिक कर देना स्वीकार कर लिया।
होयसलों की राजधानी द्वार द्वार समुद्र का आधुनिक नाम हलेविड (कर्नाटक) है। वह 1339 ई. तक अलाउद्दीन के ‘करद‘ के रूप में शासन करता रहा।
कदम्ब राजवंश-कदम्ब राजवंश की स्थापना मयूर शर्मन ने की थी। कदम्ब शासकों की राजधानी बनवासी थी। इनकी दूसरी राजधानी का नाम वालासिका था। कदम्बवंशी शासकों की वंशावली हमें एकमात्र ‘लाल गुण्ड स्तम्भलेख’ से ज्ञात होती है।
वारंगल के काकतीय राजवंश काकतीय राजवंश का संस्थापक बीटा प्रथम था।
काकतीय शासक पश्चिमी चालुक्यों के सामंत थे। बीटा प्रथम ने नलगाँडा (हैदराबाद) में एक छोटे से राज्य का गठन किया तथा उसकी राजधानी अर्मकोण्ड को बनाया। काकतीय वंश का सबसे शक्तिशाली राजा गणपतिदेव था। जिसने अपनी राजधानी वारंगल में स्थापित की। ओरूगाललु (आधुनिक वारंगल) नामक तथा शहर रूद्रदेव
ने बसाया। इस राजवंश का अंतिम शासक प्रतापरूद्र (1295-1323 ई.) था।
रुद्रमा देवी/रुद्राम्बदेवी गणपतिदेव की पुत्री थी तथा गणपति देव के बाद सदाम्ना काकतीय राज्य की शासिका बनी। काकतीय राज में पाशपुत तथा कालामुख धर्म प्रचलित था।
गंग वंश-गंग वंश की स्थापना बजहस्त पंचम ने की।
अभिलेखों के अनुसार गंगवंश के प्रथम शासक कोंकणी वर्मा (लगभग 400 ई.) था। गंग वंश का शासन आधुनिक मैसूर के दक्षिण गंगवाडि क्षेत्र में था।
गंगों की प्रारम्भिक राजधानी कुवलाल (कोलर) में थी जो बाद में तलकाड़ हो गई।
गंग शासक श्रीपुरुष ने अपनी राजधानी मान्यपुर में बनाई। श्रीपुरुष का 728-788 ई. तक शासन रहा। माधव प्रथम ने दत्तक सूत्र पर टीका लिखी थी।
मैसूर के गंग शासक चामुण्डराय ने श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) में बाहुबलि की मूर्ति का निर्माण कराया।